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THE OVERALL CONDITION OF BILASPUR DISTRICT DURING THE MARATHA PERIOD
मराठा कालीन बिलासपुर जिले की सर्वांगीण दशा
Dr. Jeevan Lal Jaiswal 1
1 Department of
History, India
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ABSTRACT |
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English: Bimbaji Bhonsle was the first Maratha ruler of Ratanpur State. He exercised direct rule in Ratanpur. During his reign, administrative functions continued to operate in accordance with the Kalchuri system of governance. There were no major changes in governance. After Bimbaji Bhonsle's death, Vyankoji Bhonsle became the ruler of Chhattisgarh. He decided to rule from Nagpur and appointed his representative in Ratanpur. This marked the beginning of the Subedari system. The Subedari system had become synonymous with plunder in Chhattisgarh. The Subedar was the supreme authority in the administration. Due to the distance from Nagpur and the poor means of transportation, a vacuum was visible between the Nagpur ruler and Ratanpur. This vacuum was exploited by the appointed Subedar. Administrative changes were carried out by the second Subedar, Vitthalrao Dinkar. He introduced the Pargana system. The old administrative strongholds were converted and divided into Parganas. The Marathas established a total of 27 Parganas. Hindi: बिम्बाजी
भोंसले रतनपुर
राज्य का प्रथम
मराठा शासक हुये।
उन्होने रतनपुर
में प्रत्यक्ष
शासन किया। इनके
काल में प्रशासनिक
काम काज कल्चुरी
शासन के व्यवस्था
के अनुरूप ही चलता
रहा। शासन प्रशासन
में बड़ा बदलाव
नही आया। बिम्बाजी
भोंसले की मृत्यु
के पश्चात छत्तीसगढ़
में व्यंकोजी
भोंसले शासक हुए
उसने नागपुर में
रहकर ही शासन करने
का निर्णय लिया
तथा उसने रतनपुर
में अपना प्रतिनीधि
नियुक्त किया।
यही से सूबेदारी
प्रथा का प्रारंभ
हुआ। सूबेदारी
प्रथा छत्तीसगढ़
में लूट का पर्याय
बन चुका था सूबेदार
ही शासन का सर्वोच्च
होता था। नागपुर
से रतनपुर की दूरी
एवं आवागमन के
निम्न साधन के
कारण नागपुर शासक
एवं रतनपुर के
बीच खालीपन का
अंतराल दिखाई
पड़ता था इस खालीपन
दुरूपयोग नियुक्त
सूबेदार द्वारा
किया जाता रहा।
प्रशासनिक फेरबदल
दूसरे सूबेदार
विठ्ठलराव दिनकर
द्वारा किया गया
उसने परगना पद्धति
की सुरूआत की।
पुराने प्रशासनिक
गढ़ों को परिवर्तित
कर परगनों में
विभाजित किया
गया। मराठों द्वारा
कुल 27 परगनों को
गठन किया। |
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Received 28 August 2025 Accepted 29 September 2025 Published 06 October 2025 DOI 10.29121/ShodhSamajik.v2.i2.2025.33 Funding: This research
received no specific grant from any funding agency in the public, commercial,
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Keywords: Maratha, Bilaspur, मराठा,
बिलासपुर |
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बिम्बाजी भोंसले
रतनपुर राज्य का
प्रथम मराठा शासक
हुये। उन्होने
रतनपुर में प्रत्यक्ष
शासन किया। इनके
काल में प्रशासनिक
काम काज कल्चुरी
शासन के व्यवस्था
के अनुरूप ही चलता
रहा। शासन प्रशासन
में बड़ा बदलाव
नही आया। बिम्बाजी
भोंसले की मृत्यु
के पश्चात छत्तीसगढ़
में व्यंकोजी भोंसले
शासक हुए उसने
नागपुर में रहकर
ही शासन करने का
निर्णय लिया तथा
उसने रतनपुर में
अपना प्रतिनीधि
नियुक्त किया।
यही से सूबेदारी
प्रथा का प्रारंभ
हुआ। सूबेदारी
प्रथा छत्तीसगढ़
में लूट का पर्याय
बन चुका था सूबेदार
ही शासन का सर्वोच्च
होता था। नागपुर
से रतनपुर की दूरी
एवं आवागमन के
निम्न साधन के
कारण नागपुर शासक
एवं रतनपुर के
बीच खालीपन का
अंतराल दिखाई पड़ता
था इस खालीपन दुरूपयोग
नियुक्त सूबेदार
द्वारा किया जाता
रहा। प्रशासनिक
फेरबदल दूसरे सूबेदार
विठ्ठलराव दिनकर
द्वारा किया गया
उसने परगना पद्धति
की सुरूआत की।
पुराने प्रशासनिक
गढ़ों को परिवर्तित
कर परगनों में
विभाजित किया गया।
मराठों द्वारा
कुल 27 परगनों को
गठन किया।
मराठो ने प्रशासन
को दो भागों में
विभाजित किया खालसा
क्षेत्र एवं जमींदारी
क्षेत्र खालसा
क्षेत्र मराठों
ने अपना प्रत्यक्ष
शासन स्थापित किया
जबकि जमींदार अपने
क्षेत्र में स्वयं
नियंत्रण रखते
थे। जमींदार प्रतिवर्ष
मराठों द्वारा
निर्धारित वार्षिक
टकोली जमा करते
थे इस प्रकार जमींदारी
क्षेत्र से मराठा
शासकों को टकोली
के रूप में एक निश्चित
आय प्राप्त होती
थी। प्रशासन में
सहयोग हेतु महत्वपूर्ण
अधिकारी थे:-
2.
सूबेदार
सूबेदार की
नियुक्ति सबसे
अधिक बोली लगाने
वालों को ठेके
प्रणाली के आधार
पर दी जाती थी।
इसका कोई अलग वेतनमान
नहीं दिया जाता
था सभी प्रकार
के सैन्य असैन्य
एवं राजस्व संबंधी
मामलों का प्रमुख
होता था रतनपुर
में कुल 09 सूबेदारों
ने शासन किया।
सूबेदार भोंसला
राजकुमार के प्रतिनीधि
के रूप में खालसा
एवं जमींदारी दोनो
क्षेत्रों का प्रत्यक्ष
एवं अप्रत्यक्ष
रूप से शासन करता
था।
3.
कमाविंसदार
यह अपने परगने
का प्रमुख अधिकारी
होता था जो कि सूबेदार
के प्रति उत्तरदायित्व
होता था। परगने
से संबंधित सैन्य-असैन्य
एवं राजस्व संबंधी
दायित्व का निर्वहन
करता था। कमाविंसदार
को दो सौ से पांच
सौ रूपये वार्षिक
वेतन के रूप में
दिया जाता था।
4.
पटेल
पटेल का पद
मराठा काल में
सृजन किया गया
था, इसका मुख्य
कार्य गांव में
राजस्व वसूल किया
जाता था। राजस्व
किये गए राशि का
एक रूपये में एक
आना पटेल कमीशन
के रूप में निर्धारित
होता था, पटेल का
पद वंशानुगत नहीं
था और न ही इसे किसी
दूसरे के पास बेचा
जा सकता था। मुख्यतः
महाराष्ट्रीयन
ब्राम्हणों को
यह पद दिया जाता
था।
5.
गौटिया
इसकी नियुक्ति
कमाविंसदार करता
था यह पटेल के अधीन
होता था यह गांव
का प्रमुख होता
था यह पद पहले वंशानुगत
नही था लेकिन बाद
में इसे वंशानुगत
बना दिया गया।
गौटिया का पद कल्चुरी
शासन से बना था।
गांव में किसानों
की सहायता से भूमि
आबंटन कार्य करता
था। उसे जीवन निर्वाह
के लिए अनेक प्रकार
की सुविधाएं प्राप्त
थी, वह गांव में
जनता का प्रतिनीधि
होता था, किसी भी
प्रकार की समस्या
का निदान करने
में सहयोग करता
था तथा गांव में
वह न्याय एवं पुलिस
संबंधी कार्य भी
करता था। गांव
में उसके सेवा
के बदले उसे लाभांस
प्राप्त होता था।
5.1. कोतवाल
कोतवाल गांव
में पहरा देने
का कार्य करते
थे, चोरी डकैती
से रक्षा करते
थे। प्रत्येक गांव
में कोतवाल की
नियुक्ति की जाती
थी तथा उसके जीवन
के लिए उसे खेत
दिया जाता था।
5.2. बरारपाण्डे
इसके द्वारा
गांव में लगान
संबंधी दस्तावेज
तैयार किया जाता
था, इसके माध्यम
से लगान का निर्धारण
किया जाता था।
5.3. पण्डरीपाण्डे
गांव में मादक
पदार्थों से होने
वाले आय का हिसाब-किताब
रखता था।
5.4. पण्डया एवं अमीन
यह राजस्व
का पद था जो कि अस्थायी
प्रकृति का था,
यह अमीन के अधीन
कार्य करता था।
अमीन का कार्य
परगना में किसी
प्रकार का राजस्व
त्रुटि हो उसके
सुधार का कार्य
करता था।
6.
बड़कर
बड़कर कृषि
क्षेत्र से संबंधित
सूचनाओं जैसे फसल
में गिरावट या
उसकी दशा में परिवर्तन
का सूचना कमाविंसदार
को भेजता था। यह
पद मराठा काल में
कमाविंसदार के
अधीन होता था।
पर्वतों
और पहाड़ों से घिरा
प्राकृतिक वनों
से परिपूर्ण छत्तीसगढ़
एक मिश्रित सभ्यता
का अनुपम उदाहरण
है। मराठा काल
में शासन का प्रमुख
केन्द्र रतनुपर
सामाजिक-सांस्कृतिक
सभ्यता का बेजोड़
उदाहरण प्रस्तुत
करता है। भौगोलिक
दृष्टि से यह प्रदेश
वनों एवं पहाड़ों
से घिरा मैदानी
क्षेत्र था जहां
अधिकांश निवास
करती थी, यहां के
लोग प्रकृति पर
निर्भर थे। खान-पान,
रहन-सहन भी प्रकृति
पर निर्भर था यहां
के लोग सरल स्वभाव
उदार एवं सहिष्णु
होते थे। एगेन्यू
ने यहां निवास
करने वाले परिवारों
का उनके व्यवसाय
अनुसार बताया था
लगभग 24 प्रकार के
व्यवसाय में लोग
लगे थे। कृषि आधारित
समाज था। समाज
में नाई, धोबी, लुहार,
कुम्हार सभी मान्यता
प्राप्त था। देवी
देवताओं में नरबलि
प्रथा का प्रचलन
था। अपहरण एवं
युद्ध बंदियो को
बलि दी जाती थी।
मराठा समाज
समतामूलक समाज
था समाज में स्त्रियों
की स्थिति अच्छी
थी स्त्रियां धार्मिक
एवं आध्यात्मिक
क्रियाकलापों
में बढ़चढ़कर हिस्सा
लेती थी। बाल विवाह
प्रथा का प्रचलन
था छोटी उम्र में
विवाह होने के
कारण तलाक की दर
अधिक थी। समाज
में बहू विवाह
का प्रचलन था इस
प्रकार समाज में
कुरीतियां भी समाहित
था। इस अंचल में
सती प्रथा का प्रचलन
था बिम्बाजी भोसले
की मृत्यु के पश्चात
उसकी पत्नी उमाबाई
सती हुई थी रतनपुर
में सती चैरा सती
होने के कारण अनुपम
उदाहरण प्रस्तुत
करता है। मनोरंजन
के अवसर के कई साधन
थे समय-समय पर कुश्ती,
कबड्डी दौड़ भाग
एवं रस्सी दौड़
जैसे खेल का आयोजन
किया जाता था।
एगेन्यू के अनुसार
‘‘छत्तीसगढ़‘‘ का खालसा
क्षेत्र अंडाकार
था कम आवश्यकता
के कारण अधिक धन
कमाने की चाह नही
थी। कम परिश्रम
से उपजाऊ भूमि
से पर्याप्त अनाज
मिल जाता था।‘‘ पंडित
शुकलाल प्रसाद
पाण्डेय ने सूबा
शासन का आलोचना
करते हुए लिखा
है-
‘‘सूबाशाही
रही तवाही शाही
क्या ही
थी मनचाही
एक तरह की नादिरशाही
सूबागण हित
रहा न कोई अंकुशधारी
अतः निरंकुश
रे सभी वे स्वेच्छाधारी
सब प्रजा मरे
चाहे जियें नहीं
सोच का नाम था
बस लक्ष्मी
की आराधना करना
इनका काम था।‘‘
छत्तीसगढ़ में
सभी वर्णों के
लोग निवास करते
थे ब्राम्हण, क्षत्रिय,
वैश्य, शूद्र, सभी
में सामंजस्य स्थापित
था अध्ययन-अध्यापन
के लिए ब्राम्हण
प्रमुख होते थे,
उन्हें मंत्री
पद भी दिया जाता
था, एगेन्यू के
रिपोर्ट के अनुसार
ब्राम्हणों को
खालसा भूमि का
तीन प्रतिशत दिया
जाता था ब्राम्हण
शास्त्र विद्या
के साथ-साथ शास्त्र
विद्या में भी
निपुण थे। क्षत्रिय
वर्ण को समाज में
सम्मान प्राप्त
था ये साहसी प्रवृत्ति
के होते थे। इन्हे
युद्ध मैदान में
अधिक सक्रिय देखा
जा सकता थ। समाज
में व्यापार वाणिज्य
के लिए वैश्य प्रमुख
थे वैश्य धन सम्पन्न
होते थे। पंडित
शुकलाल पाण्डेय
ने इस संदर्भ में
लिखा है -
‘‘ अति अल्प व्ययी,
दाता, बड़े चतुर
लोक पालन निरंतर
निज जाति भक्त
पुण्यात्मा वर
वैश्य यहां बसते
सतत।‘‘ डॉ. पी.एल. मिश्रा
ने लिखा है:-
‘‘गंगाजल, महाप्रसाद,
तुलसीदल आदि यह
वह व्यवस्था है
जो अब तक जीवित
है। यह वह प्रथा
थी जिसमे हमेंशा
विभिन्न जातियों
के व्यक्ति आपस
में मित्रता को
दो परिवारों के
रिश्तेदारी में
बदल देते थे एक
दूसरे का नाम न
लेकर गंगाजल, महाप्रसाद,
तुलसीदल, जैसे
संबोधन से पुकारते
है।‘‘
इस प्रकार
छत्तीसगढ़ का सामजिक
दृष्टिकोण से शांति
का द्वीप प्रतीत
होता है, हालांकि
शैक्षणिक स्तर
का अभाव एवं मराठा
शासकों की उपेक्षा
के कारण यहां का
सामाजिक विकास
अवरूद्ध रहा।
मराठा कालीन
छत्तीसगढ़ कृषि
पर आधारित अर्थव्यवस्था
थी यहां के अधिकांश
जनसंख्या कृषि
पर निर्भर थी।
कर राजस्व की अधिकता
एवं कृषि की उपेक्षा
ने रतनपुर राज्य
की आर्थिक व्यवस्था
पर गहरा चोंट किया।
मराठा शासक केवल
अपने लाभ के लिए
नीति निर्माण करते
रहे उसका मुख्य
उद्देश्य लूटकर
धनार्जन करना था।
जनहित से संबंधित
नीति निर्माण कार्य
नही किया। कृषि
पर आधारित अर्थव्यवस्था
केवल मानसून पर
निर्भर होता था
कभी कभी कम वर्षा
के कारण सूखे की
संभावना होती थी।
डॉ. पी.एल. मिश्रा
ने लिखा है- धरती
हमारा धान का कटोरा
है, हमारे खेतो
की कृषि उपज व लहलहाते
खेतों को देख ब्रिटिश
यात्री जार्ज फारेस्टर
ने ‘कंगाल का वर्दवान‘
कहा है।‘‘ चांवल
गेहॅू, दाल, चना,
कोदो कुटकी, उगाई
जाती थी। अत्यधिक
उत्पादन के पश्चात
भी कृषक लाभ से
वंचित रह जाता
था क्योंकि यातायात
साधनों का अभाव
था अधिकांश कृषक
मजदूर प्रतिमाह
3 रूपये तथा 5-10 पैसे
प्रतिदिन रोजी
दिया जाता था।
इस अंचल के किसानों
की स्थिति लगातार
कमजोर होती जा
रही थी। साहूकारों
से ऊंची ब्याज
दर पर ऋण लेना पड़ता
था जिसे डेढ़गुना
वापस करना पड़ता
था साहूकारों से
लिया जाने वाला
ऋण ‘‘बाड़ी‘‘ कहलाता
था। इस प्रकार
किसान साहूकारों
के चंगुल में फंसने
जा रहे थे।
किसानों द्वारा
काफी मात्रा में
गन्ना एवं कपास
का उत्पादन किया
जाता था। अंग्रेज
यात्री कोलब्रुक
ने जब इस इलाके
से गुजरा तो उन्हे
दो बार गाड़ी का
काफिला देखने को
मिला जो कपास को
बेचने कटक जा रहे
थे। इसी प्रकार
कैप्टन ब्लंट ने
अपने यात्रा वृत्तांत
में लिखा है कि-
‘गांवो‘ की संख्या
अधिक है, परन्तु
गरीबी भी है यहां
की जनसंख्या कम
है सरकार विकास
कार्यो पर रूचि
नहीं लेती है।‘‘
बिम्बाजी भोसले
के शासनकाल में
लगभग 5-6 लाख रूपये
वार्षिक राजस्व
की वसूली होती
थी, इस प्रकार राज्य
की आमदनी अच्छी
थी किन्तु बाद
के काल में लूटपाट
की स्थिति बनी
रही। यह क्षेत्र
खनिज संपदा का
भंडार क्षेत्र
था खनिज का दोहन
कम मात्रा में
होता था केवल कोयला
एवं पत्थर का उत्खनन
उपयोग के लिए होता
था। कपास उत्पादन
बिलासपुर क्षेत्र
में महत्वपूर्ण
रहा है, यहां कोसा
बनाया जाता था।
जेनकिन्स के रिपोर्ट
के अनुसार छत्तीसगढ़
से बाहर निर्यात
होने वाली वस्तुओं
की मात्रा 13 लाख
मन थी। कपास की
औसत वार्षिक उत्पादन
10 हजार मन थी लेनदेन
के लिए कौड़ियों
का प्रयोग किया
जाता था हालांकि
नागपुरी सिक्के
ने इसका स्थान
ले लिया। मराठा
काल में अधिक आर्थिक
शोषण होने के कारण
सारंगढ़ एवं रायगढ़
रियासत के शासकों
ने ब्रिटिश सत्ता
को स्वीकार लिया
था। रतनपुर में
एकमात्र मवेशी
बाजार था जहां
सभी प्रकार के
पालतू पशु क्रय-विक्रय
हेतु लाते थे।
बिम्बाजी भोंसले
की मृत्यु के बाद
1787 से 1818 ई. तक रतनपुर
राज्य में सूबा
शासन था इस काल
में कृषि उत्पादन
खपत से अधिक होने
के कारण वस्तुओं
का बाहर निर्यात
किया जाता था, निर्यात,
आयात से अधिक होने
के कारण व्यापार
संतुलन छत्तीसगढ़
के पक्ष में था।
रिचर्ड टेम्पल
ने 1862 में लिखा- छत्तीसगढ़
का पठार सबसे बेहतर
है पहाड़ों एवं
वनों के निकट होने
के कारण वर्षा
पर्याप्त मात्रा
में होती है फसल
केवल वर्षा जल
से सिंचित हो जाती
है गन्ना के फसल
के लिए सिंचाई
की अलग से आवश्यकता
नहीं होती। गेहूं
के साथ धान का फसल
भी होती है इस पठार
में कृषि योग्य
जमीन लगभग 20,000 वर्ग
मील है।
जिले में धार्मिक
एवं सांस्कृतिक
सौहार्द्र का वातावरण
था यहां सभी धर्मो
हिन्दू, मुस्लिम,
सिक्ख, ईसाई, फारसी,
के लोग निर्वास
करते थे, आपस में
भाईचारों की स्थिति
थी। यहां जनजातीय
समुदाय के लोग
भी निवास करते
थे उनका अपना धार्मिक
आचरण व्यवहार रहा
है। ग्रामीण जनसंख्या
अधिक थी लोग गांव
में निवास करते
थे ग्राम में खुशी
बनी रहे इसके लिए
गांव के प्रमुख
देवता ठाकुरदेव
होता था वैवाहिक
एवं अन्य कार्यक्रमों
में गांव के लोग
ठाकुरदेव की पूजा
अर्चना करते थे।
बूढादेव भी एक
प्रमुख देवता था
गोड़ समुदाय के
लोग अपना ईष्टदेव
के रूप में मानते
थे, न केवल बिलासपुर
जिला क्षेत्र में
बल्कि संपूर्ण
छत्तीसगढ़ में गोड़
जनजाति का जनसंख्या
अधिक रहा। गोड़
जनजाति के अलावा
बैगा, कमार, एवं
कोरवा, जनजाति
के लोग भी इस अंचल
में निवास करते
थे। यहां शक्ति
पूजा की प्रथा
प्रचलित थी आदिवासी
समुदाय में साक्त
पूजा किया जाता
था। सभी धर्मो
के लोगों में समरूपता
था यहां निर्गुण
एवं सगुण दोनो
ही ही ईश्वर की
उपासना करते थे।
इस अंचल में आर्य-अनार्य
सभ्यता के लोग
निवासरत थे इसलिये
यहां मिली-जुली
संस्कृति का विकास
दिखता है। बिम्बाजी
भोंसले धार्मिक
प्रवृत्ति के शासक
थे उन्होने रतनपुर
की पहाड़ी में राम
मंदिर का निर्माण
कराया जिसे रामटेकरी
के नाम से जाना
जाता है यह मंदिर
उनके धार्मिक सदभावना
के प्रतीक के रूप
में जाना जाता
है, सांस्कृतिक
एकरूपता का परिचय
मराठा काल में
देखा जा सकता है,
इस काल में महाराष्ट्र
से आये सैनिक अधिकारीगण
का छत्तीसगढ़ की
संस्कृति में मिल
जुल गया। इस प्रकार
मराठा कालीन बिलासपुर
अंचल में सांस्कृतिक
एकरूपता धार्मिक
सदभावना के लिये
जाना जाता है।
references
Banerjee, S.,
& Shikha, D. (2024). Chhattisgarh History, Art and Culture. Vaibhav
Prakashan.
Behar, R.
(2018). History of Chhattisgarh. Chhattisgarh Hindi Granth Academy.
Bilaspur
District Gazetteer. (1993). Bilaspur district gazetteer (p. 77).
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