THE HISTORY OF THE RAM TEMPLE AND 21ST-CENTURY POLITICS: A SOCIO-POLITICAL ANALYSIS OF THE TEMPLE MOVEMENT

THE HISTORY OF THE RAM TEMPLE AND 21ST-CENTURY POLITICS: A SOCIO-POLITICAL ANALYSIS OF THE TEMPLE MOVEMENT

राम मंदिर का इतिहास और 21वीं सदी की राजनीति: मंदिर आंदोलन का सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण

Dr. Bablu Kumar Jayswal 1

 

1 Department of History, School Lecturer, Upgraded Higher Secondary School, Nawada, Jalalpur, Saran, Bihar, India

 

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ABSTRACT

English: This paper presents an in-depth analysis of the historical development of the Ram Temple movement and its far-reaching socio-political impact on 21st-century Indian politics. The primary objective of this study is to examine how a regional and religious issue transformed into a successful religious nationalist movement that fundamentally challenged the traditional definition of Indian secularism and reshaped the country's electoral landscape.

Methodologically, this research uses a Historical Institutional Approach, which involves a qualitative analysis of primary sources (judicial judgments, political manifestos) and secondary academic literature (works on identity politics and Hindutva).

The findings demonstrate that the temple movement was not merely a legal or religious dispute, but rather a powerful vehicle for the rise of cultural nationalism, catalyzing the polarization of political parties in the 1990s. In the 21st century, particularly after the 2019 Supreme Court verdict, the movement has cemented a lasting electoral foundation for the Bharatiya Janata Party (BJP), further establishing religion-based identity politics within the Indian political mainstream. This paper argues that the resolution of the Ram Temple issue not only marks the end of a historical chapter but also signals the emergence of a neo-secular state, where majority religious identities have gained unprecedented legitimacy in political discourse.

 

Hindi: यह शोध पत्र राम मंदिर आंदोलन के ऐतिहासिक विकास और 21वीं सदी की भारतीय राजनीति पर इसके दूरगामी सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों का एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन का प्राथमिक उद्देश्य यह जाँच करना है कि कैसे एक क्षेत्रीय और धार्मिक मुद्दा एक सफल धार्मिक राष्ट्रवादी आंदोलन में परिवर्तित हुआ, जिसने भारतीय धर्मनिरपेक्षता की पारंपरिक परिभाषा को मौलिक रूप से चुनौती दी और देश के चुनावी परिदृश्य को नया आकार दिया।

पद्धतिगत रूप से, यह शोध ऐतिहासिक संस्थागत दृष्टिकोण (Historical Institutional Approach) का उपयोग करता है, जिसमें प्राथमिक स्रोतों (न्यायिक निर्णय, राजनीतिक घोषणापत्र) और द्वितीयक अकादमिक साहित्य (पहचान की राजनीति और हिंदुत्व पर कार्य) का गुणात्मक विश्लेषण शामिल है।

निष्कर्ष दर्शाते हैं कि मंदिर आंदोलन सिर्फ एक कानूनी या धार्मिक विवाद नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उदय का एक शक्तिशाली माध्यम था, जिसने 1990 के दशक में राजनीतिक दलों के ध्रुवीकरण को उत्प्रेरित किया। 21वीं सदी में, विशेष रूप से 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद, इस आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए एक स्थायी चुनावी नींव को मजबूत किया है, जिससे धर्म-आधारित पहचान की राजनीति भारतीय राजनीतिक मुख्यधारा में और अधिक स्थापित हुई है। यह पत्र तर्क देता है कि राम मंदिर का समाधान न केवल एक ऐतिहासिक अध्याय का अंत है, बल्कि यह नव-धर्मनिरपेक्ष राज्य (Neo-Secular State) के उद्भव का संकेत है, जहाँ बहुसंख्यक धार्मिक पहचान को राजनीतिक विमर्श में अभूतपूर्व वैधता मिली है।

Received 18 September 2025

Accepted 09 October 2025

Published 14 November 2025

Corresponding Author

Dr. Bablu Kumar Jayswal, bablujaiswal805@gmail.com

DOI 10.29121/ShodhSamajik.v2.i2.2025.45  

Funding: This research received no specific grant from any funding agency in the public, commercial, or not-for-profit sectors.

Copyright: © 2025 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.

With the license CC-BY, authors retain the copyright, allowing anyone to download, reuse, re-print, modify, distribute, and/or copy their contribution. The work must be properly attributed to its author.

 

 

 

 

 

 

Keywords: Ram Temple, Hindutva, Religious Nationalism, Identity Politics, Indian Politics, Secularism, Electoral Polarization राम मंदिर, हिंदुत्व, धार्मिक राष्ट्रवाद, पहचान की राजनीति, भारतीय राजनीति, धर्मनिरपेक्षता, चुनावी ध्रुवीकरण

 


1.  प्रस्तावना

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद भारतीय इतिहास और राजनीति में एक केंद्रीय और भावनात्मक रूप से आवेशित मुद्दा रहा है, जिसकी जड़ें सदियों पुरानी हैं, लेकिन जिसने 20वीं सदी के उत्तरार्ध में अभूतपूर्व राजनीतिक और सामाजिक विखंडन को जन्म दिया। यह विवाद अयोध्या में एक पवित्र माने जाने वाले स्थान पर निर्मित संरचना से जुड़ा है, जिसे हिंदू भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता है और जहाँ 16वीं शताब्दी में मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर एक मस्जिद (बाबरी मस्जिद) का निर्माण किया गया था। यह शोध इस ऐतिहासिक विवाद के सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण पर केंद्रित है, विशेष रूप से यह जाँच करता है कि कैसे इस आंदोलन ने 21वीं सदी की भारतीय राजनीति, पहचान की राजनीति, और धर्मनिरपेक्षता की प्रकृति को स्थायी रूप से आकार दिया है।

1980 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुए राम मंदिर आंदोलन ने, जिसका नेतृत्व विश्व हिंदू परिषद (VHP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने किया, एक कानूनी और स्थानीय विवाद को एक व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक परियोजना में बदल दिया Roy (2004)। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस इस आंदोलन की सबसे निर्णायक घटना थी, जिसने भारतीय गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर एक गहरा आघात किया। 21वीं सदी में इस मुद्दे का अंत 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के साथ हुआ, जिसने विवादित भूमि को मंदिर निर्माण के लिए सौंप दिया। यह घटना भारतीय राजनीति के एक नए युग का प्रतीक है।

यह शोध मंदिर आंदोलन को केवल एक धार्मिक उथल-पुथल के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद और राज्य-समाज संबंधों में एक संरचनात्मक बदलाव के रूप में देखता है। यह समझने का प्रयास करता है कि धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिकरण कैसे किया गया और इस प्रक्रिया में, भारतीय राजनीति में हिंदुत्व की वैचारिक केंद्रीयता को कैसे स्थापित किया गया।

 

2.  साहित्य समीक्षा (Literature Review)

राम मंदिर आंदोलन पर अकादमिक साहित्य व्यापक है और इसे मोटे तौर पर तीन मुख्य विषयों में वर्गीकृत किया जा सकता है: धार्मिक राष्ट्रवाद का उदय, पहचान और चुनावी राजनीति, और धर्मनिरपेक्षता पर संकट।

धार्मिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का उदय: कई विद्वानों ने राम मंदिर आंदोलन को भारत में धार्मिक राष्ट्रवाद के उदय के लिए एक प्रयोगशाला के रूप में देखा है। क्रिस्टोफ़ जैफ्रेलॉट Jaffrelot (1996) ने तर्क दिया है कि आंदोलन ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक रूप को बढ़ावा दिया, जिसने भारतीय जनता पार्टी (BJP) को चुनावी सफलता के लिए एक प्रभावी रणनीति प्रदान की। थॉमस ब्लॉम हैनसेन Hansen (1999) ने हिंदुत्व को एक "सार्वजनिक भाषा" और "सामूहिक कल्पना" के रूप में विश्लेषित किया है, जिसे मंदिर के प्रतीक के माध्यम से सफलतापूर्वक जुटाया गया। यह साहित्य जोर देता है कि कैसे आंदोलन ने हिंदू एकता की एक कृत्रिम भावना पैदा करने के लिए इतिहास और मिथक का राजनीतिक उपयोग किया, जिससे धार्मिक राष्ट्रवाद को राज्य की संस्थाओं में वैधता मिली।

पहचान और चुनावी राजनीति का विश्लेषण: मंदिर आंदोलन ने चुनावी राजनीति को कैसे पुनर्गठित किया, इस पर काफी ध्यान दिया गया है। योगेंद्र यादव और अन्य Yadav (1996) ने अपने अध्ययनों में दिखाया है कि राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दों ने भारत में जाति-आधारित मतदान को अस्थायी रूप से दरकिनार कर धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर रुख किया। यह आंदोलन 'पहचान की राजनीति' का एक प्रमुख उदाहरण बन गया, जहाँ हिंदू पहचान को एक चुनावी ब्लॉक के रूप में मजबूत किया गया। 21वीं सदी के संदर्भ में, यह देखना महत्वपूर्ण है कि 2014 के बाद मंदिर मुद्दे को कैसे पुनर्जीवित किया गया और इसे शासन और विकास के विमर्श के साथ कैसे जोड़ा गया, जिससे BJP की चुनावी सफलता को बल मिला Gurcharan (2021)

धर्मनिरपेक्षता पर संकट और न्यायिक हस्तक्षेप: तीसरा महत्वपूर्ण साहित्य खंड भारतीय धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप पर आंदोलन के प्रभाव से संबंधित है। अशीष नंदी Nandy (1998) जैसे विद्वानों ने तर्क दिया है कि आंदोलन ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता की कमजोरियों को उजागर किया, जिसने राज्य को धार्मिक समुदायों के बीच एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में कार्य करने से रोक दिया। 2019 का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एक नया अकादमिक फोकस प्रदान करता है; यह फैसला एक ओर कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से एक विवादास्पद मुद्दे को हल करता है, लेकिन दूसरी ओर यह ऐतिहासिक अन्याय की भावना को वैध बनाने में धार्मिक भावनाओं की भूमिका पर सवाल उठाता है। इस संदर्भ में, शोध यह जाँच करेगा कि क्या यह फैसला 'धर्मनिरपेक्षता' की एक नई परिभाषा को स्थापित करता है, जहाँ बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism) की आवाज को अधिक स्थान मिलता है Bhargava (2019)

साहित्य में अंतर (Gap In Literature): जबकि अधिकांश साहित्य 1992 तक के आंदोलन पर केंद्रित है, 21वीं सदी की राजनीति और 2019 के फैसले के दीर्घकालिक, संस्थागत और वैचारिक परिणाम पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। यह शोध इस अंतर को भरने का प्रयास करेगा कि कैसे एक ऐतिहासिक संघर्ष का न्यायिक समाधान नव-धर्मनिरपेक्ष भारतीय राज्य और उसके चुनावी गतिशीलता पर स्थायी प्रभाव डालता है।

 

3.  शोध का उद्देश्य (Objectives)

इस शोध पत्र के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

·        मंदिर आंदोलन के ऐतिहासिक विकास और 1980 के दशक से 2019 तक इसके प्रमुख चरणों की, प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक शक्तियों की भूमिका पर विशेष ध्यान देते हुए, आलोचनात्मक जाँच करना।

·        21वीं सदी की भारतीय राजनीति पर मंदिर मुद्दे के चुनावी, वैचारिक और संस्थागत प्रभावों का गहन विश्लेषण करना।

·        मंदिर आंदोलन द्वारा भारतीय धर्मनिरपेक्षता की पारंपरिक समझ को दी गई चुनौतियों और 2019 के फैसले के बाद उभर रहे नए राज्य-समाज संबंधों का मूल्यांकन करना।

·        यह समझना कि कैसे धार्मिक प्रतीकों और इतिहास का उपयोग पहचान की राजनीति को बढ़ावा देने और एक स्थायी चुनावी ध्रुवीकरण को बनाए रखने के लिए किया गया।

 

4.  सैद्धांतिक और कार्यप्रणाली की रूपरेखा (Theoretical and Methodological Framework)

यह खंड राम मंदिर आंदोलन के सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण के लिए चयनित वैचारिक उपकरणों और शोध विधियों को स्पष्ट करता है, जिससे अध्ययन की विश्वसनीयता और तार्किक आधार सुनिश्चित होता है।

 

4.1.      सैद्धांतिक ढाँचा (Theoretical Framework)

इस शोध में दो प्रमुख सैद्धांतिक दृष्टिकोणों का उपयोग किया जाएगा ताकि मंदिर आंदोलन की बहुआयामी प्रकृति को समझा जा सके: ऐतिहासिक संस्थागतवाद (Historical Institutionalism) और संसाधन जुटाव सिद्धांत (Resource Mobilization Theory)

 

 

 

 

 

4.2.      ऐतिहासिक संस्थागतवाद (Historical Institutionalism)

यह दृष्टिकोण राजनीतिक प्रक्रियाओं और परिणामों को आकार देने में संस्थाओं (जैसे, राज्य, न्यायपालिका, और राजनीतिक दल) और पथ निर्भरता (Path Dependency) की भूमिका पर ज़ोर देता है।

·        अनुप्रयोग: मंदिर आंदोलन को एक पथ-निर्भर प्रक्रिया के रूप में देखा जाएगा, जहाँ प्रारंभिक कानूनी और राजनीतिक निर्णय (जैसे, 1949 में मूर्ति की स्थापना) ने बाद के राजनीतिक विकल्पों को सीमित किया। यह सिद्धांत 21वीं सदी में सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिक्रिया और उनके फैसलों के दीर्घकालिक राजनीतिक निहितार्थों का विश्लेषण करने में मदद करेगा, यह दर्शाते हुए कि कैसे संस्थाएँ धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों को वैध या अवैध बनाती हैं।

 

4.3.      संसाधन जुटाव सिद्धांत (Resource Mobilization Theory - RMT)

सामाजिक आंदोलनों के अध्ययन में RMT यह तर्क देता है कि आंदोलनों का उदय आवश्यक संसाधनों (जैसे, वित्त, मानव शक्ति, संगठनात्मक संरचना और प्रतीकात्मक वैधता) की सफल लामबंदी पर निर्भर करता है, न कि केवल सामूहिक असंतोष पर।

·        अनुप्रयोग: यह सिद्धांत यह विश्लेषण करने के लिए महत्वपूर्ण है कि कैसे VHP और RSS जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने राम मंदिर के लिए बड़े पैमाने पर समर्थन जुटाने हेतु प्रतीकात्मक संसाधनों (राम का प्रतीक, इतिहास का उपयोग) और संगठनात्मक संसाधनों (रथ यात्रा, कार सेवा) का प्रभावी ढंग से उपयोग किया। 21वीं सदी में, यह विश्लेषण करेगा कि कैसे BJP ने इस आंदोलन से प्राप्त राजनीतिक पूंजी को अपने चुनावी एजेंडे में सफलतापूर्वक शामिल किया।

 

5.  प्रमुख अवधारणाओं की परिभाषाएँ

·        हिंदुत्व: यह हिंदू धर्म से भिन्न एक राजनीतिक विचारधारा है, जिसका उद्देश्य भारत को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करना है। यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक रूप है जो 'हिंदू' पहचान को राष्ट्रीय पहचान का प्राथमिक निर्धारक मानता है Jaffrelot (1996)

·        धर्मनिरपेक्षता: भारतीय संदर्भ में, धर्मनिरपेक्षता को राज्य द्वारा सभी धर्मों के प्रति समान दूरी बनाए रखने (Principle of Equidistance) और सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान (Sarva Dharma Sambhava) के रूप में समझा जाता है। शोध 2019 के बाद इस अवधारणा के क्षरण या पुन:परिभाषा की जाँच करेगा।

·        पहचान की राजनीति: राजनीतिक लामबंदी का वह रूप जो किसी साझा धार्मिक, जातीय या जातिगत पहचान पर आधारित होता है। राम मंदिर आंदोलन ने धार्मिक पहचान को चुनावी ध्रुवीकरण का मुख्य आधार बनाया।

 

6.  कार्यप्रणाली (Methodology)

यह शोध गुणात्मक (Qualitative) अनुसंधान पद्धति पर आधारित है, जो घटना की गहराई और जटिलता को समझने के लिए सबसे उपयुक्त है।

शोध डिज़ाइन: ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

अध्ययन ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण का अनुसरण करेगा, जिसमें प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं, राजनीतिक परिवर्तनों और कानूनी फैसलों का कालक्रमानुसार विश्लेषण किया जाएगा ताकि कार्य-कारण संबंधों को स्थापित किया जा सके।

डेटा संग्रह (Data Collection)

डेटा संग्रह मुख्य रूप से प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों पर निर्भर करेगा:

1)     प्राथमिक स्रोत:

·        न्यायिक दस्तावेज़: अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय और भारत के सर्वोच्च न्यायालय (2019) के महत्वपूर्ण फैसलों के कानूनी तर्क और निहितार्थों का विश्लेषण।

·        राजनीतिक दस्तावेज़: BJP, कांग्रेस और अन्य प्रासंगिक दलों के घोषणापत्र और प्रमुख नेताओं के आंदोलन-संबंधी भाषणों और बयानों का तुलनात्मक अध्ययन।

·        सरकारी रिपोर्ट: 1992 की घटनाओं से संबंधित लिब्रहान आयोग जैसी जाँच आयोगों की रिपोर्ट के प्रासंगिक अंश।

2)     द्वितीयक स्रोत:

·        शैक्षणिक साहित्य: राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और इतिहास की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं (जैसे Economic and Political Weekly, Seminar) में प्रकाशित लेख, और राम मंदिर व हिंदुत्व पर केंद्रित मानक पुस्तकें।

·        विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टें: आंदोलन के प्रमुख चरणों (1990, 1992, 2019) की घटनाओं के समकालीन और खोजी विश्लेषण।

 

7.  विश्लेषण की तकनीक (Analysis Technique)

एक बार डेटा एकत्र हो जाने पर, इसका विश्लेषण विषयगत विश्लेषण (Thematic Analysis) और आख्यान विश्लेषण (Narrative Analysis) का उपयोग करके किया जाएगा:

·        विषयगत विश्लेषण: राजनीतिक प्रवचनों, न्यायिक तर्कों और मीडिया कवरेज में बार-बार आने वाले प्रमुख विषयों (जैसे, 'न्याय', 'अधिकार', 'विश्वास बनाम कानून', 'राष्ट्रीय सम्मान') की पहचान करना और उनका व्यवस्थित वर्गीकरण करना।

·        आख्यान विश्लेषण: यह समझना कि कैसे हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने 'उत्पीड़ित हिंदू' और 'ऐतिहासिक अन्याय' का एक शक्तिशाली आख्यान (Narrative) गढ़ा और सफलतापूर्वक प्रचारित किया, और 21वीं सदी की राजनीति में यह आख्यान कैसे रूपांतरित हुआ है।

यह कार्यप्रणाली सुनिश्चित करेगी कि शोध केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करता है, बल्कि मंदिर आंदोलन के पीछे के संरचनात्मक और वैचारिक कारकों की गहराई से जाँच करता है।

 

7.1.      राम मंदिर आंदोलन का ऐतिहासिक विकास और सामाजिक आधार

यह खंड राम मंदिर आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ों, इसके विभिन्न चरणों और वह सामाजिक आधार जिसने इसे एक शक्तिशाली राष्ट्रीय राजनीतिक परियोजना में बदल दिया, की विस्तार से जाँच करता है।

पूर्व-1980 के दशक की जड़ें: स्थानीय विवाद से कानूनी मुद्दा: राम मंदिर विवाद की जड़ें औपनिवेशिक काल से जुड़ी हैं, जब अयोध्या में इस स्थल पर पहला संगठित संघर्ष दर्ज किया गया। यद्यपि मस्जिद का निर्माण 16वीं शताब्दी में मुगल शासक बाबर के काल में हुआ था, 19वीं शताब्दी तक यहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदायों द्वारा संयुक्त पूजा और इबादत की प्रथा रही Mirazuddin (2012)

·        औपनिवेशिक हस्तक्षेप: 1853 में हुए एक संघर्ष के बाद, ब्रिटिश प्रशासन ने 1859 में स्थल को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया—बाहरी प्रांगण (जहाँ हिंदू पूजा करते थे) और भीतरी प्रांगण (जहाँ मस्जिद थी)। यह विभाजन विवाद के संस्थागतकरण का पहला चरण था।

·        1949 की घटना: विवाद को राष्ट्रीय राजनीतिक केंद्र में लाने वाली निर्णायक घटना 22-23 दिसंबर 1949 की रात को हुई, जब बाबरी मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे राम लला की मूर्तियों को रहस्यमय तरीके से स्थापित कर दिया गया। सरकार ने इसे 'विवादित ढांचा' घोषित करते हुए स्थल को कुर्क कर दिया और पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन मूर्तियों को नहीं हटाया गया। इसने मामले को स्थायी रूप से कानूनी और धार्मिक गतिरोध में बदल दिया।

 

8.  मंदिर आंदोलन का उदय: 1980 का दशक - प्रतीकों का राजनीतिकरण

1980 का दशक राम मंदिर मुद्दे के राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन में रूपांतरण का गवाह बना। इस चरण में, प्रमुख हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने संसाधनों और प्रतीकों का रणनीतिक उपयोग करके विवाद को व्यापक रूप दिया।

 

8.1.      हिंदुत्व परिवार की संगठनात्मक भूमिका

·        विश्व हिंदू परिषद (VHP) की स्थापना: 1964 में स्थापित VHP ने 1980 के दशक की शुरुआत में इस मुद्दे को प्रमुखता दी। VHP ने आंदोलन के लिए धार्मिक संसाधनों (साधु-संतों, पुजारियों की लामबंदी) और आर्थिक संसाधनों (चंदा जुटाना) की व्यवस्था की।

·        भारतीय जनता पार्टी (BJP) की भागीदारी: BJP ने 1989 में पालमपुर प्रस्ताव के माध्यम से औपचारिक रूप से राम मंदिर आंदोलन को अपनाया [जैफ्रेलॉट, 1996]। यह पार्टी के लिए राजनीतिक पुनरुत्थान की एक रणनीति थी, जो इसे अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि से अलग करके एक स्पष्ट हिंदू पहचान प्रदान कर रही थी।

 

8.2.      प्रतीकात्मक लामबंदी: रामशिला पूजन

आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने में 'रामशिला पूजन' (राम मंदिर की नींव के लिए ईंटों का अभिषेक) कार्यक्रम अत्यंत सफल रहा।

·        1989 में शुरू हुए इस कार्यक्रम में, देश भर के लाखों गाँवों से पूजित ईंटें अयोध्या लाई गईं।

·        सामाजिक आधार का विस्तार: इस रणनीति ने आंदोलन को केवल अयोध्या तक सीमित न रखकर, इसे भारत के प्रत्येक गाँव और घर से भावनात्मक रूप से जोड़ दिया। इसने निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को जुटाया और मंदिर के विचार को एक सामूहिक कल्पना (Collective Imagination) में बदल दिया।

 

 

 

 

 

9.  1990 का दशक: आंदोलन का चरमोत्कर्ष और सामाजिक आधार का ध्रुवीकरण

यह दशक आंदोलन के सबसे ज्वलंत और निर्णायक घटनाक्रमों को चिह्नित करता है, जिसने भारतीय सामाजिक और राजनीतिक विन्यास में ध्रुवीकरण को चरम पर पहुँचा दिया।

लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा (1990)

·        रणनीतिक प्रभाव: लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा शुरू की गई 'रथ यात्रा' ने राजनीतिक संचार के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। गुजरात के सोमनाथ से शुरू होकर अयोध्या तक जाने वाली इस यात्रा ने हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने के लिए एक चलते-फिरते प्रतीक (रथ) का इस्तेमाल किया।

·        सामाजिक विभाजन: रथ यात्रा ने सीधे तौर पर पहचान की राजनीति को बढ़ावा दिया, जिससे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच धार्मिक विभाजन को हवा मिली, जिसके परिणामस्वरूप कई स्थानों पर सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। इसने स्पष्ट रूप से धर्म को चुनावी राजनीति का केंद्रीय विषय बना दिया।

सामाजिक आधार में विविधता और लामबंदी

·        जातिगत आधार: शुरुआती चरण में यह आंदोलन उच्च जाति और शहरी मध्यवर्ग के प्रभुत्व वाला माना जाता था। हालांकि, कार सेवा और रथ यात्रा जैसी लामबंदियों के माध्यम से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) और यहाँ तक कि कुछ दलित समूहों की भागीदारी भी सुनिश्चित की गई, विशेषकर VHP के विभिन्न अनुषंगी संगठनों के माध्यम से Jaffrelot (2010)। यह आंदोलन मंडल (जाति की राजनीति) के खिलाफ कमंडल (धर्म की राजनीति) को एकीकरण का आधार प्रदान करने का प्रयास था।

·        महिलाएँ और युवा: दुर्गा वाहिनी (VHP की महिला शाखा) जैसी संस्थाओं के माध्यम से महिलाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई, जिससे आंदोलन का सामाजिक आधार और मजबूत हुआ। युवाओं को राम के गौरवशाली इतिहास और हिंदू पुनरुत्थान के आह्वान के माध्यम से आकर्षित किया गया।

 

 

 

इस चित्र में राम मंदिर आंदोलन के सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण से संबंधित चार मुख्य प्रकार के आरेख शामिल हैं:

1)     समयरेखा और चुनावी चार्ट: यह आंदोलन के ऐतिहासिक विकास और 21वीं सदी में चुनावी वृद्धि के बीच के संबंध को दर्शाता है।

2)     वैचारिक मॉडल (फ्लोचार्ट): यह राम मंदिर मुद्दे, BJP की रणनीति, न्यायिक प्रक्रिया, और अंततः हिंदुत्व के वैचारिक प्रभुत्व के बीच के जटिल राजनीतिक अंतर्संबंध को स्पष्ट करता है।

3)     पाई चार्ट्स (तीन): ये चार्ट राम मंदिर आंदोलन के सामाजिक आधार का अनुमानित चित्रण करते हैं, जो आंदोलन में जाति समूहों (Caste Groups), सामाजिक-आर्थिक वर्ग (Class), और लिंग/आयु के आधार पर भागीदारी के विभाजन को दर्शाते हैं।

संक्षेप में, यह चित्र आंदोलन के इतिहास, राजनीतिक रणनीति, और सामाजिक समर्थन को एक साथ दृश्य रूप में प्रस्तुत करता है।

6 दिसंबर 1992: विध्वंस और राष्ट्रीय संकट

·        सामूहिक कार्रवाई का परिणाम: बाबरी मस्जिद का विध्वंस केवल एक विध्वंसक घटना नहीं थी, बल्कि यह आंदोलन की वर्षों की संगठित लामबंदी, राजनीतिक शक्ति के संचय और धार्मिक उत्साह का चरम परिणाम था।

·        दीर्घकालिक सामाजिक परिणाम: इस घटना ने भारतीय समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को स्थायी बना दिया। इसने अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना को गहराई से मजबूत किया और भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विश्वसनीयता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया।

21वीं सदी की निरंतरता: संस्थागत वैधता की खोज

21वीं सदी में आंदोलन का चरित्र सड़क पर विरोध से न्यायिक और राजनीतिक वैधता की ओर स्थानांतरित हो गया।

·        न्यायिकरण का युग: 2000 के दशक में ध्यान मुख्य रूप से अदालत के फैसलों पर केंद्रित रहा। आंदोलन के नेताओं ने 1992 की घटना के बावजूद, कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की मांग की, जिससे आंदोलन का राजनीतिकरण कम होकर संस्थागतकरण बढ़ गया।

·        2019 का निर्णय: सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले ने न केवल भूमि विवाद को समाप्त किया बल्कि मंदिर निर्माण के लिए कानूनी और संस्थागत वैधता भी प्रदान की। यह घटना हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे की दीर्घकालिक सफलता और 21वीं सदी की राजनीति पर इसके गहरे प्रभाव का एक अकाट्य प्रमाण है। यह सफलता केवल धार्मिक जुनून पर नहीं, बल्कि दशकों की संगठनात्मक दृढ़ता और प्रतीकात्मक संसाधनों के निरंतर राजनीतिक उपयोग पर आधारित थी।

 

10.     टाइमलाइन डायग्राम (Timeline Diagram)

राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख ऐतिहासिक घटनाक्रमों और कानूनी मील के पत्थरों को कालक्रमानुसार।

जानकारी:

·        1853: पहला दर्ज संघर्ष

·        1859: ब्रिटिश प्रशासन द्वारा स्थल का विभाजन

·        1949: मस्जिद के अंदर मूर्तियों की स्थापना और स्थल की कुर्की

·        1986: फैजाबाद जिला अदालत द्वारा ताले खोलने का आदेश

·        1989: रामशिला पूजन और BJP द्वारा आंदोलन का समर्थन

·        1990: लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा

·        1992: बाबरी मस्जिद का विध्वंस

·        2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला

·        2019: सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

·        2020: राम मंदिर निर्माण का भूमि पूजन

यह डायग्राम आंदोलन के विकास की एक स्पष्ट और त्वरित समझ प्रदान करता है।

 

 

11.     21वीं सदी की राजनीति और राम मंदिर

21वीं सदी में राम मंदिर मुद्दा सड़क पर आंदोलन के चरण से आगे बढ़कर, न्यायिक समाधान और संस्थागत राजनीतिक विजय के चरण में प्रवेश कर गया। इस सदी में, राम मंदिर ने केवल एक धार्मिक मांग के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए एक स्थाई चुनावी उपकरण और नव-धर्मनिरपेक्षता की बहस को निर्धारित करने वाले कारक के रूप में कार्य किया।

न्यायिक समाधान और राजनीतिक गतिरोध (2000-2019) : सहस्राब्दी की शुरुआत में, राम मंदिर आंदोलन की ऊर्जा सड़क पर कम होकर न्यायिक और राजनीतिक बातचीत के दायरे में सिमट गई।

 न्यायिकरण और राजनीतिक तटस्थता

·        कानूनी प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित: 2000 के दशक की शुरुआत में, विशेष रूप से वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार के तहत, मंदिर मुद्दे को 'विकास' और 'शासन' के व्यापक एजेंडे के लिए पृष्ठभूमि में रखा गया था [चड्ढा, 2005]। यह रणनीति जानबूझकर मंदिर विवाद को न्यायपालिका के दायरे में धकेलने पर केंद्रित थी।

·        इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला (2010): इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तीन-तरफ़ा विभाजन के फैसले ने कानूनी विवाद को हल करने में राज्य की संस्थागत अक्षमता को दर्शाया, लेकिन साथ ही न्यायिक समाधान की अनिवार्यता को भी स्थापित किया। इस फैसले ने दशकों पुराने दावों और प्रति-दावों को कानूनी जामा पहनाया, जिससे राजनीतिक दलों के लिए इस मुद्दे पर सीधे हस्तक्षेप करना मुश्किल हो गया।

 

2014 के बाद पुनरुत्थान

·        नए संदर्भ में पुनर्संरचना: नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में BJP की भारी जीत के बाद, राम मंदिर का मुद्दा फिर से राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता से उभरा। इस बार, इसे केवल भावनात्मक अपील के रूप में नहीं, बल्कि हिंदुत्व के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता और ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने के एक उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।

·        संस्थागत दबाव: 2017-2019 के बीच, संघ परिवार के विभिन्न घटकों और राजनीतिक नेतृत्व द्वारा मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने या सर्वोच्च न्यायालय पर त्वरित सुनवाई के लिए सार्वजनिक और संस्थागत दबाव बढ़ाया गया। इस दबाव ने संकेत दिया कि राजनीतिक नेतृत्व अब 'न्यायिक प्रक्रिया' की गति को स्वीकार करने को तैयार नहीं था, जिससे यह मुद्दा फिर से कार्रवाई-उन्मुख राजनीति का हिस्सा बन गया।

2019 का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला और राजनीतिक परिणाम

9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय का फैसला 21वीं सदी की भारतीय राजनीति के लिए एक जलविभाजक क्षण (Watershed Moment) था।

फैसले का कानूनी और राजनीतिक महत्त्व

·        कानूनी अंत: सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित भूमि को मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट को सौंप दिया, जबकि मस्जिद के लिए एक वैकल्पिक पाँच एकड़ भूखंड आवंटित किया। इस फैसले ने दशकों पुराने कानूनी संघर्ष को निर्णायक रूप से समाप्त कर दिया।

·        राजनीतिक सहमति: इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक विशेषता यह थी कि इसे सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों दलों द्वारा बड़े पैमाने पर स्वीकार कर लिया गया। यह स्वीकृति इस बात का प्रमाण थी कि राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीतिक विमर्श में हिंदुत्व की विचारधारा के लिए कितनी व्यापक वैधता और शक्ति प्राप्त कर ली थी [भार्गव, 2019]।

हिंदुत्व की वैचारिक पूर्णता

फैसले के बाद, मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को BJP और संघ परिवार द्वारा राष्ट्रीय गौरव और ऐतिहासिक न्याय की पूर्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया।

·        पहचान का सुदृढ़ीकरण: राम मंदिर ने BJP के मुख्य हिंदुत्व एजेंडे को मजबूत किया, इसे केवल एक चुनावी नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की एक सफल परियोजना के रूप में चित्रित किया।

·        'नव-धर्मनिरपेक्षता' का उदय: इस घटना ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता की पारंपरिक नेहरूवादी समझ को प्रभावी ढंग से चुनौती दी। आलोचकों का तर्क है कि यह एक 'नव-धर्मनिरपेक्ष' मॉडल की ओर बदलाव का प्रतीक है, जहाँ राज्य बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक मांगों के प्रति अधिक झुकाव प्रदर्शित करता है Jaffrelot (2020)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

12.     कॉन्सेप्चुअल मॉडल और बार चार्ट : 21वीं सदी की राजनीति और राम मंदिर के बीच के संबंध

 

 

13.     वैचारिक मॉडल (Conceptual Model) व्याख्या: राम मंदिर और 21वीं सदी की राजनीति

यह फ्लोचार्ट (Flowchart) दिखाता है कि कैसे राम मंदिर मुद्दा 21वीं सदी की भारतीय राजनीति में BJP की रणनीति, न्यायिक प्रक्रिया और हिंदुत्व के वैचारिक प्रभुत्व को आपस में जोड़ता है।

चरण

विवरण

निहितार्थ

प्रारंभिक बिंदु

राम मंदिर मुद्दा और BJP का हिंदुत्व एजेंडा एक प्रारंभिक राजनीतिक शक्ति के रूप में।

विवाद को चुनावी और वैचारिक केंद्र बिंदु बनाना।

मध्यवर्ती चरण

1. न्यायिकरण (Judicialisation): मुद्दा अदालत में केंद्रित रहा (2000-2019)2. रणनीतिक संतुलन: BJP ने इसे पृष्ठभूमि में रखा, पर VHP/RSS के माध्यम से सार्वजनिक दबाव बनाए रखा।

राजनीतिक तनाव को नियंत्रित करना जबकि कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर रहना।

संकट बिंदु

2019 का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला: विवादित भूमि मंदिर निर्माण हेतु सौंप दी गई।

संस्थागत वैधता की प्राप्ति।

परिणाम

1. हिंदुत्व की सफलता: BJP का चुनावी सुदृढ़ीकरण और वैचारिक प्रभुत्व। 2. नव-धर्मनिरपेक्षता का उदय: बहुसंख्यक भावनाओं को राज्य की कार्रवाई में वैधता मिली। 3. विपक्षी दबाव: अन्य दलों का 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की ओर झुकाव।

मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय गौरव और शासन की सफलता के रूप में स्थापित करना।

 

14.     बार चार्ट (Bar Chart) व्याख्या: BJP का चुनावी प्रदर्शन और मंदिर आंदोलन

उपरोक्त बार चार्ट BJP के वोट शेयर या सीटों में हुए परिवर्तन और राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चरणों के बीच संभावित संबंध को दर्शाता है।

1)     X-अक्ष (चुनावी वर्ष): यह 1984 से 2019 तक के प्रमुख चुनावी वर्षों को दिखाता है।

2)     Y-अक्ष (वोट शेयर/सीटें): यह BJP के चुनावी प्रदर्शन के स्तर को मापता है।

3)     मुख्य सहसंबंध बिंदु:

·        1989 (रामशिला पूजन): इस मार्कर के बाद वोट शेयर में तेज वृद्धि दिखती है, जो आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव की शुरुआत को दर्शाता है।

·        1992 (बाबरी विध्वंस): विध्वंस के आस-पास के चुनावों में उच्च वोट शेयर/सीटें दिखाई जाती हैं, जो ध्रुवीकरण के चरम को दर्शाता है।

·        2014 and 2019: मोदी के नेतृत्व और मंदिर मुद्दे के पुनरुत्थान के बाद BJP के वोट शेयर/सीटों में ऐतिहासिक उछाल दिखाई देता है।

निष्कर्ष: चार्ट का उद्देश्य यह दर्शाना है कि राम मंदिर आंदोलन एक चुंबकीय शक्ति के रूप में कार्य करता रहा, जिसने 21वीं सदी में BJP की राजनीतिक और चुनावी सफलता को उत्प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

15.     चुनावी राजनीति पर दीर्घकालिक प्रभाव

राम मंदिर विवाद का समाधान 21वीं सदी में भारत की चुनावी गतिशीलता पर स्थायी प्रभाव डालने वाला है।

मतदान व्यवहार पर प्रभाव

·        हिंदू एकीकरण: मंदिर मुद्दे के सफल 'समाधान' ने हिंदू मतदाताओं के बीच BJP के पक्ष में एक मजबूत धार्मिक एकीकरण (Religious Consolidation) को और गहरा किया है। यह अब केवल एक 'विरोध' का नहीं, बल्कि 'प्राप्ति' का प्रतीक बन गया है, जो पार्टी के प्रति समर्थन की भावना को बढ़ाता है।

·        पहचान और शासन का विलय: BJP ने राम मंदिर की सफलता को अपने शासन मॉडल और राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा है। यह रणनीति धार्मिक पहचान की राजनीति को विकास और राष्ट्रीयता के विमर्श के साथ सफलतापूर्वक विलय कर देती है, जिससे विरोधियों के लिए इसका मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है।

विपक्ष की रणनीति पर दबाव

राम मंदिर के सफल संस्थागत समाधान ने विपक्षी दलों पर गहरा दबाव डाला है।

·        नरम हिंदुत्व की ओर बदलाव: कई विपक्षी दलों, यहाँ तक कि कांग्रेस जैसे दलों ने भी, धार्मिक बहुसंख्यकों को अलग-थलग करने से बचने के लिए 'नरम हिंदुत्व' (Soft Hindutva) की ओर रुख किया है। यह बदलाव भारत की 21वीं सदी की राजनीति में वैचारिक धुरी (Ideological Axis) के BJP की ओर स्थानांतरित होने का स्पष्ट संकेत है [गुरचरण, 2021]।

·        चुनावी ध्रुवीकरण का संस्थागत होना: 1990 के दशक का ध्रुवीकरण अब एक संस्थागत और वैचारिक वास्तविकता बन गया है, जहाँ धार्मिक पहचान भारतीय चुनावी प्रतियोगिता का एक प्राथमिक, यदि अपरिहार्य नहीं, आधार बनी रहेगी।

संक्षेप में, 21वीं सदी में राम मंदिर अब एक विवाद नहीं, बल्कि शक्तिशाली राजनीतिक नियंत्रण और वैचारिक आधिपत्य का प्रतीक है, जिसने भारतीय राजनीति के मूलभूत स्तंभों—न्यायपालिका, धर्मनिरपेक्षता और चुनावी रणनीति—को पुनर्परिभाषित किया है।

 

 

 

 

 

 

16.     निष्कर्ष और भविष्य की दिशा (Conclusion and Future Directions)

इस शोध का उद्देश्य राम मंदिर आंदोलन के ऐतिहासिक विकास और 21वीं सदी की भारतीय राजनीति पर इसके सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण की जाँच करना था। विश्लेषण से निम्नलिखित मुख्य निष्कर्ष सामने आते हैं:

·        ऐतिहासिक-राजनीतिक रूपांतरण: राम मंदिर विवाद एक स्थानीय और कानूनी संघर्ष से एक सफल धार्मिक राष्ट्रवादी आंदोलन में बदल गया। यह रूपांतरण संघ परिवार (RSS, VHP, BJP) द्वारा संसाधन जुटाव सिद्धांत (RMT) के प्रभावी उपयोग, विशेष रूप से प्रतीकों (रथ यात्रा, रामशिला पूजन) के राजनीतिकरण, और एक शक्तिशाली सामूहिक आख्यान (Collective Narrative) के निर्माण के कारण संभव हुआ।

·        चुनावी ध्रुवीकरण का संस्थागतकरण: 21वीं सदी में, राम मंदिर ने BJP के लिए एक स्थायी चुनावी नींव प्रदान की। आंदोलन ने भारत की राजनीति की वैचारिक धुरी को धर्मनिरपेक्षता से हटाकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर स्थानांतरित कर दिया, जिससे पहचान की राजनीति मतदान व्यवहार का एक निर्णायक कारक बन गई।

·        धर्मनिरपेक्षता की पुनर्संरचना: 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने न केवल कानूनी विवाद को समाप्त किया, बल्कि नव-धर्मनिरपेक्षता (Neo-Secularism) के एक नए मॉडल के उद्भव को भी दर्शाया। यह मॉडल बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक मांगों के प्रति राज्य की बढ़ती झुकाव को वैचारिक और संस्थागत वैधता प्रदान करता है, जिससे भारतीय धर्मनिरपेक्षता के 'समान दूरी' के सिद्धांत को चुनौती मिलती है।

संक्षेप में, राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति में एक 'पथ निर्भरता' (Path Dependency) स्थापित की है, जहाँ धार्मिक पहचान और राजनीतिक शक्ति का मिलन भविष्य के शासन और चुनावी रणनीतियों के लिए एक अपरिवर्तनीय आधार बन गया है।

 

17.     सैद्धांतिक योगदान और निहितार्थ

यह शोध मौजूदा साहित्य में दो महत्वपूर्ण योगदान जोड़ता है:

1)     संस्थागत दृष्टिकोण की पुष्टि: ऐतिहासिक संस्थागतवाद के लेंस के माध्यम से, शोध ने प्रदर्शित किया है कि कैसे न्यायपालिका और राजनीतिक दल जैसी संस्थाओं ने राम मंदिर आंदोलन को दशकों तक नियंत्रित और अंततः वैध बनाया। यह साबित करता है कि धार्मिक राष्ट्रवाद की सफलता केवल सड़क पर भीड़ जुटाने पर नहीं, बल्कि राज्य की संस्थाओं के माध्यम से वैचारिक घुसपैठ पर निर्भर करती है।

2)     पहचान की राजनीति का उत्क्रमण: जबकि शुरुआती पहचान की राजनीति जाति (मंडल) पर केंद्रित थी, राम मंदिर ने सफलतापूर्वक इसे धर्म (कमंडल) की ओर मोड़ दिया। इस शोध ने दिखाया है कि 21वीं सदी में, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान अब चुनावी प्रतिस्पर्धा में निर्णायक कारक बन गए हैं, जिससे विपक्षी दलों को भी नरम हिंदुत्व की ओर जाने पर मजबूर होना पड़ा है।

 

18.     अध्ययन की सीमाएँ

इस अध्ययन की कुछ सीमाएँ हैं जिन्हें भविष्य के शोध में संबोधित किया जा सकता है:

·        यह शोध मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक अभिजात वर्ग और न्यायिक फैसलों पर केंद्रित है। इसमें आंदोलन में शामिल निचले स्तर के कार्यकर्ताओं (Grassroots) की व्यक्तिगत प्रेरणाओं और अनुभवों का गहन नृवंशविज्ञान विश्लेषण (Ethnographic Analysis) शामिल नहीं है।

·        शोध का निष्कर्ष मुख्य रूप से उत्तर भारत के राजनीतिक विन्यास पर आधारित है, और इसके निष्कर्षों की सीमाएँ हो सकती हैं जब इसे भारत के उन दक्षिणी और पूर्वी राज्यों पर लागू किया जाता है जहाँ राम मंदिर का प्रभाव कम रहा है।

 

19.     भविष्य के शोध की दिशा (Future Directions)

राम मंदिर आंदोलन के सफलतापूर्वक समाप्त होने के बाद, भविष्य के शोध निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं:

1)     मंदिर का सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था: मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या और आसपास के क्षेत्रों पर आर्थिक और पर्यटन प्रभावों का अध्ययन। साथ ही, यह देखना कि कैसे मंदिर एक सांस्कृतिक और तीर्थयात्रा अर्थव्यवस्था को जन्म देता है।

2)     नीति निर्माण पर प्रभाव: यह जाँच करना कि राम मंदिर की सफलता ने अन्य धार्मिक/सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों (जैसे, समान नागरिक संहिता) पर सरकारी नीति और विधायी कार्रवाई को कैसे प्रभावित किया है।

3)     अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव: विदेशों में भारतीय प्रवासी (Diaspora) और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया पर राम मंदिर और हिंदुत्व की सफलता के भू-राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का मूल्यांकन।

4)     राज्य की सेक्युलर भाषा में बदलाव: 2019 के बाद सरकारी और राजनीतिक प्रवचन में 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द के उपयोग की आवृत्ति और संदर्भों का मात्रात्मक विश्लेषण (Content Analysis) करना।

 

CONFLICT OF INTERESTS

None. 

 

ACKNOWLEDGMENTS

None.

 

REFERENCES

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