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THE SIGNIFICANCE OF WOMEN'S LEADERSHIP IN THE 18TH LOK SABHA ELECTIONS
१८ वीं लोकसभा के चुनाव में महिलाओं के नेतृत्व का महत्व
Dr. Rajneesh G. Bambole 1 ![]()
1 Professor, Bharatiya Mahavidyalaya,Morshi, Amravati, India
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ABSTRACT |
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English: Women's political leadership in India has undergone remarkable transformation over the past few decades, and the 18th Lok Sabha elections represent an important milestone in this transformation. This paper provides an analytical study of the significance of women's leadership during the 18th Lok Sabha elections. It includes a detailed discussion of historical trends, socio-political contexts, challenges faced by women candidates, and their impact on electoral outcomes and democratic governance. The study utilizes secondary literature, newspaper reports, election analyses, government publications, and scholarly research, which demonstrates that increased participation of women as voters, candidates, and members of Parliament is transforming India's democratic structure. The research findings clearly demonstrate that women leaders have played a crucial role in shaping development policies, raising gender-sensitive issues, strengthening voter participation, and strengthening inclusive governance. This research demonstrates that increasing women's representation is essential not only for ensuring gender equality but also for deepening democracy, the sustainability of good governance, and balanced national development. The study highlights the need for policy recommendations such as the full implementation of the Women's Reservation Act, the need for comprehensive political training programs, and gender-responsive reforms in political parties. Hindi: भारत में
महिलाओं के
राजनीतिक
नेतृत्व ने
पिछले कुछ
दशकों में
अत्यंत
उल्लेखनीय
परिवर्तन का
मार्ग तय
किया हैए और
अठारहवीं
लोकसभा चुनाव
इस परिवर्तन
यात्रा का एक
महत्वपूर्ण
मील का पत्थर
सिद्ध होते
हैं।
प्रस्तुत
शोध.पत्र में
अठारहवीं
लोकसभा
चुनाव के
दौरान महिलाओं
के नेतृत्व
की महत्ता का
विश्लेषणात्मक
अध्ययन किया
गया है।
इसमें
ऐतिहासिक
प्रवृत्तियोंए
सामाजिक.राजनीतिक
संदर्भोंए
महिला
उम्मीदवारों
के समक्ष
उपस्थित
चुनौतियोंए
तथा चुनावी
परिणामों
एवं
लोकतांत्रिक
शासन में
उनके
प्रभावी
योगदान का
विस्तृत
विवेचन शामिल
है। अध्ययन
में
द्वितीयक
साहित्यए
समाचार.पत्रों
के विवरणए
चुनाव
विश्लेषणोंए
सरकारी
प्रकाशनों
तथा
विद्वानों
के शोध का
उपयोग किया
गया हैए
जिससे यह
स्पष्ट होता
है कि मतदाताए
प्रत्याशी
और
संसद.सदस्य
के रूप में
महिलाओं की
बढ़ी हुई
भागीदारी
भारत की
लोकतांत्रिक
संरचना को नए
स्वरूप में
परिवर्तित
कर रही है।
अनुसंधान के
निष्कर्ष
स्पष्ट करते
हैं कि महिला
नेताओं ने
विकास.नीतियों
को दिशा प्रदान
करनेए
लिंग.संवेदनशील
मुद्दों को
प्रखरता से
उठानेए
मतदाता
सहभागिता को
सशक्त बनाने तथा
समावेशी
शासन को
मजबूत करने
में अत्यंत महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाई है। यह
शोध
प्रमाणित करता
है कि
महिलाओं का
बढ़ता
प्रतिनिधित्व
केवल लैंगिक
समानता को
सुनिश्चित
करने के लिए ही
नहींए बल्कि
लोकतंत्र की
गहराईए
सुशासन की स्थिरता
और संतुलित
राष्ट्रीय
विकास के लिए भी
अनिवार्य
है। अध्ययन
में नीतिगत
सुझावों के
रूप में
महिलाओं के
आरक्षण
अधिनियम के
पूर्ण
क्रियान्वयनए
व्यापक
राजनीतिक
प्रशिक्षण
कार्यक्रमों
की आवश्यकता
तथा
राजनीतिक दलों
में
लिंग.उत्तरदायी
सुधारों को
अत्यंत आवश्यक
बताया गया
है। |
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Received 08 October 2025 Accepted 19 November 2025 Published 12 December 2025 Corresponding Author Dr.
Rajneesh G. Bambole, bambolerajnish@gmail.com DOI 10.29121/ShodhSamajik.v2.i2.2025.54 Funding: This research
received no specific grant from any funding agency in the public, commercial,
or not-for-profit sectors. Copyright: © 2025 The
Author(s). This work is licensed under a Creative Commons
Attribution 4.0 International License. With the
license CC-BY, authors retain the copyright, allowing anyone to download,
reuse, re-print, modify, distribute, and/or copy their contribution. The work
must be properly attributed to its author.
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Keywords: Women's
Leadership, 18th Lok Sabha Elections, Women's Representation, Gender Equality, Gender
Equality, Indian Democracy, Political Participation, Electoral Politics महिला
नेतृत्व, अठारहवीं
लोकसभा
चुनाव, महिला
प्रतिनिधित्व, लैंगिक
समानता, भारतीय
लोकतंत्र, राजनीतिक
सहभागिता, चुनावी
राजनीति |
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राजनीतिक
व्यवस्था में
महिलाओं का
नेतृत्व किसी
भी राष्ट्र की
लोकतांत्रिक
परिपक्वता तथा
सामाजिक
उन्नति का
सुदृढ़
संकेतक माना जाता
है। भारत जैसे
बहुविविधतापूर्ण
देश में चुनावी
राजनीति के
क्षेत्र में
महिलाओं की सक्रिय
भागीदारी का
महत्त्व
निरन्तर बढ़
रहा है।
अठारहवीं
लोकसभा
चुनावों ने एक
नवीन युग का
आरम्भ किया, जहाँ
महिला नेताओं
ने न केवल
अधिक संख्या
में निर्वाचन-क्षेत्रों
से प्रत्याशी
के रूप में
भाग लेकर अपनी
उपस्थिति
सुदृढ़ की, अपितु
प्रमुख
चुनावी
विमर्शों को
दिशा प्रदान
की तथा
राष्ट्रीय
स्तर पर
नीतिगत
संवादों को
स्पष्ट रूप से
प्रभावित
किया।
महिलाओं का यह
उदित नेतृत्व
मात्र
प्रतीकात्मक
नहीं,
बल्कि
शासन-व्यवस्था
के ढाँचे को
लिंग-सम्मिलित
एवं समावेशी
बनाने की दिशा
में एक निर्णायक
परिवर्तन का
द्योतक है।
इतिहास के
परिप्रेक्ष्य
में भारतीय
राजनीति में
महिलाओं की
भूमिका
सामाजिक-सांस्कृतिक
मान्यताओं, पितृसत्तात्मक
संरचनाओं तथा
सीमित राजनीतिक
संसाधनों की
उपलब्धता से
संकुचित रही
है। किन्तु
शिक्षा के
प्रसार,
आर्थिक
सशक्तिकरण, विधिक
सुधारों तथा
सामाजिक
जागरूकता के
फलस्वरूप
बीते दशकों
में
शासन-तंत्र
में महिलाओं
की भागीदारी
के प्रति
आत्मविश्वास
और क्षमता में
उल्लेखनीय
वृद्धि हुई
है। अठारहवीं
लोकसभा
चुनावों में
महिला
नेतृत्व की
बढ़ती दृश्यता, जनता
में महिलाओं
के निर्णयों
के प्रति विकसित
होता विश्वास
तथा राजनीतिक
क्षेत्र में
महिलाओं हेतु
विस्तृत होते
अवसर यह दर्शाते
हैं कि
राजनीति का वह
क्षेत्र, जो
परम्परागत
रूप से
पुरुष-प्रधान
माना जाता था, अब
क्रमशः
महिलाओं के
लिए अधिक
अनुकूल,
ग्रहणशील
तथा
प्रगतिशील
बनता जा रहा
है।
प्रस्तुत
शोध-पत्र में
इस चुनाव-चक्र
में महिला
नेतृत्व के
महत्त्व का
विश्लेषण चार
मूलभूत
अनुसंधान-प्रश्नों
के आधार पर
किया गया है, जिनमें
यह समझने का
प्रयास किया
गया है कि भारत
में महिलाओं
की राजनीतिक
भागीदारी
ऐतिहासिक तथा
सामाजिक-राजनीतिक
संदर्भों में
किस प्रकार
क्रमशः
विकसित हुई है; अठारहवीं
लोकसभा
चुनावों में
महिला नेताओं ने
नीतिगत बहसों, चुनावी
अभियानों और
जन-संपर्क
रणनीतियों में
क्या
उल्लेखनीय
योगदान दिया; बढ़ते
प्रतिनिधित्व
के बावजूद
उन्हें दलगत सीमाओं, संसाधनों
की असमान
उपलब्धता, सामाजिक
पूर्वाग्रहों
और
संरचनात्मक
बाधाओं जैसी
किन
चुनौतियों का
सामना करना
पड़ा;
तथा अंततः
महिला
नेतृत्व को
दीर्घकालीन
रूप से सुदृढ़
और प्रभावी
बनाने के लिए
किन नीतिगत
सुधारों (जैसे
क्षमता-निर्माण
कार्यक्रमों
का विस्तार, सुरक्षित
राजनीतिक
वातावरण, संसदीय
प्रतिनिधित्व
संबंधी सुधार
और लैंगिक-संवेदनशील
संस्थागत
व्यवस्थाओं)
की अत्यंत
आवश्यकता है।
इन
अनुसंधान-बिंदुओं
के विश्लेषण
से यह शोध-पत्र
भारतीय
लोकतांत्रिक
प्रणाली को
अधिक सक्षम, समतामूलक
एवं सुदृढ़
बनाने में
महिला नेतृत्व
की अनिवार्य
तथा
निर्मात्री
भूमिका को उजागर
करता है।
2. साहित्य समीक्षा
विभिन्न
शोधकर्ताओं
ने स्पष्ट
किया है कि 18वीं
लोकसभा
चुनावों में
महिला
नेतृत्व का
उभार दीर्घकालीन
सामाजिक-राजनीतिक
परिवर्तन का परिणाम
है। Acharya
(2024) ने
महिला
नेतृत्व को
विकसित भारत
की अनिवार्य
शर्त बताया, जबकि
Inter-Parliamentary Union. (2024) ने
कम
प्रत्याशियों
के बावजूद
महिला मतदाताओं
के निर्णायक
प्रभाव को
रेखांकित
किया। Beaman et al. (2010) ने
सिद्ध किया कि
आरक्षण
महिलाओं की
सार्थक राजनीतिक
भागीदारी को
बढ़ाता है। Behura (2023) और Bidhuri
& Sinha (2023) ने
भी महिला
राजनीतिक
जागरूकता और
बढ़ते प्रतिनिधित्व
को
महत्वपूर्ण
माना। Chhibber (2011) ने
महिलाओं की कम
उपस्थिति के
संरचनात्मक
कारणों को
उजागर किया, वहीं
Dahlerup (2006) ने
कोटा प्रणाली
को महिला
उन्नति का
प्रभावी साधन
बताया। Election Commission of India. (2024) ने
महिला मतदाता
प्रतिशत
पुरुषों से
अधिक होने की
पुष्टि की।
106वाँ संविधान
संशोधन (2023) ने महिला
आरक्षण को नए
ऐतिहासिक
अवसर के रूप
में मान्यता
दी। Khurshid
(2015), Kumar (2021)और Rai (2016) ने
पाया कि
महिलाएँ
प्रशासन, नीति-निर्माण
और
लोकतांत्रिक
सहभागिता में मजबूत
उपस्थिति बना
रही हैं।
राज्यसभा
सचिवालय (2008) ने
भी विधायी
संस्थाओं में
महिलाओं के बढ़ते
प्रतिनिधित्व
को लोकतंत्र
की गुणवत्ता
सुधारने वाला
कदम बताया।
साहित्य
स्पष्ट करता
है कि महिला
नेतृत्व का
उभार सामाजिक
परिवर्तन, आरक्षण
नीतियों, बढ़ती
राजनीतिक
चेतना और
संवैधानिक
सुधारों का
संयुक्त
परिणाम है।
3. अनुसंधान पद्धति
इस
अनुसंधान में
गुणात्मक (Qualitative) तथा
द्वितीयक-दत्त
(Secondary Data)
आधारित
पद्धति का
अनुसरण किया
गया है। इसके
लिए भारत
निर्वाचन
आयोग की
रिपोर्टों, सरकारी
प्रकाशनों, महिलाओं
के नेतृत्व पर
आधारित
विद्वतापूर्ण
ग्रन्थों एवं
शोध-पत्रिकाओं, समाचार-माध्यमों
के
विश्लेषणों
तथा लोकसभा चुनावों
के
परिणाम-दत्त
का उपयोग किया
गया है।
अनुसंधान-पद्धति
में ऐतिहासिक
एवं समकालीन
प्रवृत्तियों
का
वर्णनात्मक
विश्लेषण, घोषणापत्रों
एवं भाषणों का
विषयवस्तु-विश्लेषण
(Content Analysis),
पूर्ववर्ती
चुनावों से
तुलनात्मक
विवेचन,
तथा
चुनौतियों
एवं नीतिगत
निहितार्थों
का सांकेतिक (Thematic)
विश्लेषण
सम्मिलित है।
अध्ययन का
केन्द्र
(महिला
मतदाताओं, महिला
प्रत्याशियों, निर्वाचित
महिला
सांसदों एवं
नीतिगत विचार-विमर्शों
पर उनके
प्रभाव) पर
विशेषत:
केन्द्रित
है।
4. अठारहवीं लोकसभा चुनावों में महिलाओं के नेतृत्व का महत्त्व
4.1. महिलाओं की निर्वाचन-सहभागिता में अभूतपूर्व वृद्धि
अठारहवीं
लोकसभा
चुनावों में
महिलाओं की निर्वाचन-सहभागिता
संख्या एवं
मतदान-प्रतिशत, दोनों
ही दृष्टियों
से उल्लेखनीय
रूप से बढ़ी।
अनेक स्थानों
पर महिलाओं की
मतदान-दर पुरुषों
के बराबर अथवा
उससे भी अधिक
रही, जो
उनकी बढ़ती
निर्वाचन-शक्ति
(Electoral Clout)
को स्पष्ट
संकेतित करती
है। यह वृद्धि
विशेषत: युवा, प्रथम-मतदाता
एवं शिक्षित
महिला
मतदाताओं में
अत्यन्त
प्रखर रूप से
दिखाई दी, जिन्होंने
2019 की तुलना में
करोड़ों की
संख्या में
अतिरिक्त मत
जोड़े।
वर्ष 2024 के
लोकसभा
चुनावों में
लगभग 31–31.2 करोड़
महिलाओं ने
मतदान किया, जो
कुल लगभग 64–64.2
करोड़
मतदाताओं का
महत्त्वपूर्ण
हिस्सा है।
पंजीकृत
महिला
मतदाताओं में
मतदान-दर लगभग
65–66 प्रतिशत रही, जो
पुरुषों की
मतदान-दर के
लगभग समतुल्य
तथा कुछ
विश्लेषणों
में उससे
न्यूनाधिक
अधिक आँकी गई।
यह भारत के
इतिहास में
दूसरा अवसर है
जब महिलाओं का
मतदान-स्तर
लगभग पूर्णतः
पुरुषों के
समान (Caught up)
हो गया।
कुल
मतदाता-सूची
में महिलाओं
का अनुपात 48–49
प्रतिशत के
समीप पहुँच
चुका है, तथा प्रति
1,000 पुरुष
मतदाताओं पर
महिला मतदाताओं
की संख्या
पूर्व में
निम्न-900 से
बढ़कर मध्य-900
तक पहुँची है।
2009 में जहाँ
महिलाओं की
मतदान-दर पुरुषों
से 4 प्रतिशत
अंक कम थी, वहीं
2019–2024 के दशक में
यह अंतर लगभग
पूर्णत: समाप्त
हो गया और
महिलाओं की
मतदान-दर में 10
प्रतिशत अंकों
से अधिक
वृद्धि हुई।
असम, आन्ध्र
प्रदेश,
पश्चिम
बंगाल,
ओडिशा एवं
छत्तीसगढ़
जैसे राज्यों
में महिलाओं
का
मतदान-प्रतिशत
72–80 प्रतिशत तक
पहुँच गया, जिसने
राष्ट्रीय
औसत को
उल्लेखनीय
रूप से उन्नत
किया।
वर्ष 2024 में
कुल
मतदाता-संख्या
लगभग 98 करोड़
हुई, जिसमें
युवा वर्ग (18–29
वर्ष) का
अनुपात बड़ा
था। इसी वर्ग
में युवा
महिलाओं ने
करोड़ों नये
मत जोड़कर
लोकतान्त्रिक
सहभागिता को
नई दिशा दी।
प्रथम-बार
मतदान करने
वाली महिलाएँ, शिक्षित
शहरी महिलाएँ, स्व-सहायता
समूहों (SHGs) एवं
कार्यरत
महिलाएँ
डिजिटल
अभियानों, महाविद्यालय-स्तरीय
जागरूकता कार्यक्रमों
तथा लक्षित
संवाद के कारण
उच्च मतदान-दर
में सम्मिलित
रहीं।
राजनीतिक
दलों ने
महिलाओं को
निर्णायक
मतदाता-समूह
मानते हुए, प्रत्यक्ष
लाभ अंतरण, रसोई-गैस
योजनाएँ, आवास
योजनाएँ, अनुदानित
खाद्यान्न, तथा
लैंगिक-विशेष
आरक्षण,
जैसी
कल्याणकारी
नीतियाँ
प्रस्तुत
कीं। महिलाकर्मियों
द्वारा
संचालित
सभाओं,
महिला-विशेष
बैठकों एवं
घर-घर सम्पर्क
अभियानों ने
अनेक
निर्वाचन-क्षेत्रों
में महिलाओं
की मतदान-दर
में 2–3 प्रतिशत
अंकों की
अतिरिक्त
वृद्धि
प्रदान की।
यद्यपि
अठारहवीं
लोकसभा में
केवल लगभग 74
महिलाएँ (लगभग
13 से 14 प्रतिशत)
निर्वाचित
हुईं,
किन्तु
महिलाओं के मत
कुल मतों का
लगभग आधा हिस्सा
रहे, जिससे
उन्हें
चुनाव-परिणामों
पर अप्रत्यक्ष
किन्तु
अत्यन्त
महत्वपूर्ण
प्रभाव प्राप्त
हुआ। तीव्र
प्रतिस्पर्धा
वाले
निर्वाचन-क्षेत्रों
में महिलाओं
की मतदान-दर
में मात्र 1–2
प्रतिशत
वृद्धि ही 10,000 से
20,000 मतों के
बराबर रही, जो
परिणामों को
निर्णायक रूप
से प्रभावित
कर सकती थी।
अतः महिलाओं
की बढ़ती
चुनावी सहभागिता
अनेक सीटों के
विजय-अंतर की
मुख्य निर्धारक
शक्ति सिद्ध
हुई।
5. महिला प्रत्याशियों का बढ़ता प्रतिनिधित्व
अठारहवीं
लोकसभा के
चुनावों में
महिला प्रत्याशियों
की संख्या तथा
उनके कुल
उम्मीदवारों
में हिस्से
दोनों में
उल्लेखनीय
वृद्धि देखी
गई। यद्यपि
सदन में उनका
अंतिम
प्रतिनिधित्व
अभी भी लगभग
सातवें भाग के
आसपास ही है, तथापि
यह वृद्धि
राजनीतिक
दलों द्वारा
महिलाओं को एक
महत्त्वपूर्ण
निर्वाचन
समूह के रूप
में स्वीकार
करने का संकेत
देती है। लगभग
8,360 कुल
प्रत्याशियों
में से लगभग 800
महिलाएँ चुनाव
मैदान में
उतरीं,
अर्थात्
लगभग 10
प्रतिशत। यह
संख्या वर्ष 2019
के 726 महिला
प्रत्याशियों
की तुलना में
बढ़ी हुई है, जो
सात दशकों के
परिवर्तनशील
राजनीतिक
परिदृश्य में
एक
महत्त्वपूर्ण
प्रवृत्ति को
दर्शाती है।
1950 के दशक
में जहाँ
महिला
प्रत्याशी
कुल उम्मीदवारों
का मात्र 3
प्रतिशत से भी
कम थीं,
वहीं 2024 तक यह
अनुपात बढ़कर
लगभग 10
प्रतिशत तक पहुँच
गया है,
जो अनुपातिक
रूप से तीन
गुना से अधिक
वृद्धि को
दर्शाता है।
वर्ष 2024 में
लगभग 9.7 से 10
प्रतिशत महिला
प्रत्याशी
विजयी रहीं और
कुल 543 सीटों
में से लगभग 74
सीटें
महिलाओं ने
प्राप्त कीं, जो
लगभग 13.4 से13.6
प्रतिशत का
प्रतिनिधित्व
है। यह संख्या
2019 के 78 महिला
सांसदों की
तुलना में
थोड़ी कम
अवश्य है, किन्तु
फिर भी भारत
के संसदीय
इतिहास में
महिलाओं के
सर्वाधिक
प्रतिनिधित्व
वाले चरणों में
से एक है।
राष्ट्रीय
दलों में
भारतीय जनता
पार्टी ने लगभग
440 से अधिक
प्रत्याशियों
में से लगभग 69
महिलाएँ
उतारीं,
जो लगभग 15 से 16
प्रतिशत है, जबकि
कांग्रेस ने
अपने लगभग 320 से
अधिक प्रत्याशियों
में से लगभग 45
महिलाओं को
टिकट दिया, जो
लगभग 13 से 14
प्रतिशत है।
कुछ
क्षेत्रीय दल
इससे भी आगे
बढ़े,
बीजद,
झारखंड
मुक्ति
मोर्चा तथा
अन्य समान
दलों ने लगभग 33
प्रतिशत टिकट
महिलाओं को
दिए; राजद
ने लगभग 29
प्रतिशत टिकट
महिलाओं को
दिया;
और कुछ छोटे
दलों ने तो
अपने
प्रत्याशियों
में 38–40 प्रतिशत
तक महिलाएँ
सम्मिलित
कीं। इन दलों
ने स्पष्ट
किया कि यह
रणनीति इस
तथ्य पर
आधारित है कि
महिलाएँ कुल
मतदाता आधार
का लगभग आधा
हिस्सा हैं, और
लगभग 66
प्रतिशत की
उच्च मतदान दर
के साथ राजनीतिक
प्रक्रिया
में सक्रिय
भूमिका
निभाती हैं।
चुनाव-निगरानी
संस्थाओं के
अनुसार कुल
प्रत्याशियों
में महिलाओं
की संख्या अभी
भी 10 प्रतिशत
से कम अवश्य
है, किन्तु
अनेक
अध्ययनों से
यह सिद्ध हुआ
है कि महिला
विधायकों का
प्रदर्शन
स्थानीय
आर्थिक विकास
एवं
कल्याणकारी
योजनाओं को
आगे बढ़ाने
में पुरुष
विधायकों की
तुलना में
अधिक प्रभावी
रहता है। इस
कारण
राजनीतिक दल
महिलाओं को स्वच्छ
शासन,
सामाजिक
कल्याण वितरण, और
जनसंपर्क
आधारित
नेतृत्व की
प्रतीक के रूप
में अधिकाधिक
प्रस्तुत कर
रहे हैं, विशेषकर
उन क्षेत्रों
में जहाँ
उज्ज्वला, आवास
योजनाएँ, और
प्रत्यक्ष
लाभान्तरण
जैसी योजनाओं
से लाखों
महिला मतदाता
जुड़े हुए हैं।
वर्तमान
लोकसभा में
लगभग 14
राजनीतिक
दलों से महिलाएँ
निर्वाचित
हुई हैं। कुछ
राज्यों (जैसे
छत्तीसगढ़
(लगभग 27
प्रतिशत
महिला सांसद), पश्चिम
बंगाल तथा
हिमाचल
प्रदेश (लगभग 25
प्रतिशत)) में
महिला
प्रतिनिधित्व
अपेक्षाकृत
अधिक है, जिससे
राष्ट्रीय
नीति-निर्माण
में महिलाओं की
सामूहिक आवाज
और मज़बूत
होती है।
चुनाव अभियान
के दौरान
विभिन्न
सर्वेक्षणों
और वाद-विवाद
विश्लेषणों
से यह स्पष्ट
हुआ कि महिला
प्रत्याशियों
ने लैंगिक
न्याय,
सुरक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, कल्याणकारी
योजनाओं, तथा
रोजगार-उद्यमिता
जैसे विषयों
को अत्यधिक प्रखरता
से उठाया और
उन्हें
योजनागत
आँकड़ों व बजटीय
प्रावधानों
से पुष्ट
किया।
6. राजनीतिक विमर्श में महिला नेताओं की भूमिका
अठारहवीं
लोकसभा के
चुनावों के
दौरान महिला नेताओं
ने लैंगिक
संवेदनशील
राजनीतिक
एजेंडा को आगे
बढ़ाने में
अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण
भूमिका
निभाई। महुआ
मोइत्रा
(टीएमसी), सुप्रिया
सूले
(एनसीपी-एसपी), हेमा
मालिनी
(भाजपा),
तथा कंगना
रनौत और मिशा
भारती जैसी
नवप्रवेशी
हस्तियों ने
अपने चुनाव
अभियानों में
महिलाओं की
सुरक्षा, कल्याणकारी
योजनाओं की
सुगमता,
तथा आर्थिक
सशक्तिकरण
जैसे मुद्दों
पर विशेष बल
दिया।
महिला
नेताओं ने
अपने
राजनीतिक
संदेशों में कई
प्रमुख
विषयों को
केंद्र में
रखा, महिलाओं
की सुरक्षा के
लिए कठोर
विधिक प्रावधानों
के प्रभावी
अनुपालन, स्व-सहायता
समूहों को
डिजिटल
साक्षरता एवं
सेवा-क्षेत्र
से जोड़ने, मातृ
स्वास्थ्य को
कन्याश्री और
रूपाश्री जैसी
योजनाओं से
सुदृढ़ करने, तथा
लक्ष्मी
बंधार जैसी
प्रत्यक्ष
नकद अंतरण
योजनाओं के
व्यापक
प्रभाव को
रेखांकित किया।
पश्चिम बंगाल
और
महाराष्ट्र
जैसे राज्यों
में नेताओं ने
जल-संकट
समाधान,
स्वास्थ्य
सेवाओं की
उपलब्धता, तथा
एक लाख से
अधिक वार्षिक
लाभार्थियों
वाले आंकड़ों
के माध्यम से
अपने तर्कों
को मजबूत किया।
महिला
उम्मीदवारों
ने अपने चुनाव
अभियानों को
अधिक स्वच्छ, समाधान-उन्मुख, तथा
विकास-सूचकांकों
पर आधारित
रखा। वे विभाजनकारी
भाषणों से
विमुख रहीं और
उज्ज्वला योजना
के अंतर्गत 10
करोड़ से अधिक
गैस कनेक्शन, आवास
योजनाएँ, तथा 20–30
करोड़ महिला
मतदाताओं को
प्रभावित करने
वाले
प्रत्यक्ष
लाभांतरण
जैसे आँकड़ों
को प्रमुखता
से प्रस्तुत
किया। चुनाव
विश्लेषणों
के अनुसार
महिला
प्रत्याशी
महिलाओं-के-लिए-विशेष
रैलियों, घर-घर
सम्पर्क, तथा
सामुदायिक
बैठकों के
माध्यम से
जनसहभागिता
बढ़ाने में
अधिक सफल
रहीं। इनके
विरुद्ध आपराधिक
प्रकरणों की
संख्या भी
पुरुष
प्रत्याशियों
की तुलना में
कम पाई गई, 797
महिला
प्रत्याशियों
में केवल 9.7
प्रतिशत पर ही
ऐसे मामले
दर्ज थे, जबकि
पुरुषों में
यह अनुपात
अधिक था।
चुनी गई 74
महिला
सांसदों (13.6
प्रतिशत) ने
संसदीय कार्यवाही
में सक्रिय
भूमिका
निभाई। चौथे सत्र
में उन्होंने
लगभग 17.2
प्रतिशत
तारांकित प्रश्न
पूछे (हालाँकि
केवल 7.5
प्रतिशत
व्यक्तिगत
रूप से) और
वक्फ विधेयक
पर हुई बहस
में 8 प्रतिशत
वक्ताओं एवं 3.5
प्रतिशत समय
का योगदान दिया।
बजट चर्चा में
भी उन्होंने 8
घंटे से अधिक
की बैठक में
सामूहिक रूप
से लगभग 1 घंटे
का योगदान
किया।
समितियों में
भी महिला
सदस्यों ने सामाजिक
एवं आर्थिक
नीतियों पर
महत्त्वपूर्ण
प्रभाव डाला, यद्यपि
वित्त समिति
जैसी कुछ
प्रमुख
समितियों में
पिछले 16
वर्षों में
महिलाओं का
प्रतिनिधित्व
लगभग नगण्य
रहा है।
टीएमसी (38
प्रतिशत), कांग्रेस
(14 प्रतिशत), तथा
भाजपा (240 सीटों
में से लगभग 12
प्रतिशत
महिला सांसद)
सहित 14 दलों की
महिला
सांसदों ने
नारी शक्ति
वंदन अधिनियम
जैसे 33
प्रतिशत
आरक्षण संबंधी
प्रस्तावों
को मजबूती से
समर्थन दिया।
इससे मातृ
स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक
सशक्तिकरण और
कल्याणकारी
योजनाओं में
उत्तरदायित्व
को बढ़ाने के
लिए महिलाओं की
आवाज और
प्रभाव दोनों
ही सुदृढ़
हुए। छत्तीसगढ़
तथा पश्चिम
बंगाल जैसे
राज्यों में
अधिक महिला
सांसद होने से
क्षेत्रीय
नीतियों में
भी अधिक
संवेदनशील
एवं समावेशी
सुधार देखने
को मिले।
7. विद्यमान चुनौतियाँ
अठारहवीं
लोकसभा के
चुनावों में
महिलाओं की बढ़ती
मतदान
भागीदारी के
बावजूद,
वे अनेक गहरी
संरचनात्मक
बाधाओं का
सामना करती
रहीं।
राजनीतिक
दलों के भीतर
व्याप्त पितृसत्तात्मक
प्रवृत्तियों
के कारण कुल 8,360
उम्मीदवारों
में महिलाओं
की
हिस्सेदारी
मात्र 9.5
प्रतिशत तक
सीमित रही, जिनमें
से अधिकांश को
ऐसे निर्वाचन
क्षेत्रों
में
प्रत्याशी
बनाया गया
जिन्हें
सामान्यतः
“अविजयी
सीटें” माना
जाता है। दलों
की पुरुष-प्रधान
निर्णय
संरचनाएँ
टिकट वितरण पर
नियंत्रण
बनाए रखती
हैं—उदाहरणार्थ, भाजपा
ने 441 कुल
प्रत्याशियों
में से मात्र 71
महिलाओं (लगभग
16 प्रतिशत) को
टिकट प्रदान
किया,
जबकि
सामाजिक
पूर्वाग्रह
अब भी राजनीति
को “पुरुषों
का क्षेत्र”
मानते हुए
विशेषतः
ग्रामीण
क्षेत्रों
में महिलाओं
के
आत्मविश्वास
को प्रभावित
करते हैं। इसी
प्रकार,
राज्य
विधानसभाओं
में महिलाओं
की औसत हिस्सेदारी
केवल 9
प्रतिशत है, उत्तर
प्रदेश में
मात्र 6
प्रतिशत तथा
बिहार में 7.8
प्रतिशत है, जिससे
स्पष्ट होता
है कि गहरी
जमी
प्रतिरोधक प्रवृत्तियों
ने 2019 के 14.7
प्रतिशत
महिला सांसदों
को 2024 में घटाकर
13.62 प्रतिशत कर
दिया।
चुनावी
व्यय की
अत्यन्त उच्च
सीमा
(प्रति सीट
लगभग 50 से 100
करोड़ रुपये)
महिला
प्रत्याशियों
के लिए भारी
अवरोध सिद्ध
हुई। जिन महिलाओं
की
परिसंपत्तियाँ
1 करोड़ रुपये
से कम थीं, उनकी
सफलता दर लगभग
1.49 प्रतिशत तक
गिर गई;
और 279 स्वतंत्र
महिला
प्रत्याशियों
में से एक भी
विजयी नहीं हो
सकीं क्योंकि
उन्हें संगठित
दलगत समर्थन
प्राप्त नहीं
था। दल-आधारित
नेटवर्क तक
सीमित पहुँच
के कारण अनेक
महिलाओं को
वंशवादी
संबंधों या
प्रतीकात्मक
भूमिकाओं पर
निर्भर रहना
पड़ा,
जिससे
वित्तीय
बाधाएँ और
गहरी हुईं, जबकि
पुरुष
प्रत्याशियों
को
प्राथमिकता
आधारित
धन-सहायता
अधिक सहजता से
उपलब्ध होती
रही।
चुनावी
अभियान के
दौरान
महिलाओं को
लक्षित ऑनलाइन
दुर्व्यवहार, राजनीतिक
हिंसा और
चरित्र-हनन
जैसी चुनौतियों
से भी जूझना
पड़ा। महिला
प्रत्याशियों
से जुड़े लगभग
9–10 प्रतिशत
निर्वाचन
क्षेत्रों में
लिंग-आधारित
आपत्तिजनक
टिप्पणियाँ
दर्ज की गईं, जिससे
भावनात्मक
तनाव और
सार्वजनिक
दृश्यता में
कमी उत्पन्न
हुई। यह
डिजिटल
उत्पीड़न (जो
प्रायः
मिथ्या सूचना
द्वारा और भी
तीव्र किया
जाता है)
विशेष रूप से
उन महिलाओं को
प्रभावित
करता है जिनके
पास वंशवादी
या सुदृढ़ राजनीतिक
पृष्ठभूमि
नहीं होती, जिससे
49 प्रतिशत
महिला
मतदाताओं वाले
निर्वाचन
क्षेत्रों
में भी उनकी
पहुँच बाधित
हो जाती है।
राजनीतिक
दलों में
महिलाओं के
नेतृत्व पद अत्यल्प
रहे, भाजपा
और कांग्रेस
जैसी प्रमुख
पार्टियों में
भी महिला
सांसदों का
अनुपात केवल 12–14
प्रतिशत के
आसपास रहा, जबकि
महिला
मतदाताओं की
हिस्सेदारी
इससे कहीं
अधिक है।
राज्य स्तर पर
भी यह अल्प
प्रतिनिधित्व
अक्सर केवल
प्रतीकात्मक
उपस्थिति का संकेत
देता है।
इसीलिए
सुधारात्मक
उपाय (जैसे
नारी शक्ति
वंदन अधिनियम, जो
2029 के परिसीमन
के बाद 33
प्रतिशत
आरक्षण लागू करेगा)
इन
संरचनात्मक
अवरोधों, संसाधनों
की असमान
उपलब्धता, तथा
दलगत
द्वारपाल
व्यवस्था को
चुनौती देने हेतु
अनिवार्य
माने जा रहे
हैं।
8. राष्ट्र-निर्माण में महिला नेतृत्व का महत्त्व
अठारहवीं
लोकसभा में
महिलाओं का
नेतृत्व राष्ट्र-निर्माण
की प्रक्रिया
को अनेक
आयामों में
सुदृढ़ करता
है, विशेषकर
लैंगिक
समानता को
बढ़ावा देने, संतुलित
नीति-निर्माण
को
प्रोत्साहित
करने,
शासन-व्यवस्था
को अधिक
उत्तरदायी
बनाने और लोकतंत्र
को मजबूत करने
में।
महिला
सांसदों का
प्रतिनिधित्व, जो
18वीं लोकसभा
में 13.6 प्रतिशत
तक पहुँचा, लंबे
समय से चली आ
रही सामाजिक
रूढ़ियों को
तोड़ते हुए
युवा
पीढ़ियों के
समक्ष यह
उदाहरण स्थापित
करता है कि
महिलाएँ भी
शासन के
उच्चतम स्तरों
पर सक्रिय
भूमिका निभा
सकती हैं। यह
दृश्यता न
केवल महिलाओं
की राजनीतिक
आकांक्षाओं
को सामान्य
बनाती है, बल्कि
उन
पितृसत्तात्मक
मान्यताओं को
भी चुनौती
देती है
जिन्होंने
ऐतिहासिक रूप
से उनके
राजनीतिक
विस्तार को
सीमित किया
था।
महिला
नेता
स्वास्थ्य
सेवाओं,
पोषण,
बाल-विकास, लैंगिक
न्याय,
और समावेशी
कल्याणकारी
योजनाओं से
संबंधित नीतियों
को विशेष
प्राथमिकता
देती हैं। जननी
सुरक्षा
योजना जैसी
मातृ
स्वास्थ्य
योजनाएँ, जिनसे
प्रतिवर्ष
लगभग 6 करोड़
महिलाएँ
लाभान्वित
होती हैं, तथा
पोषण
कार्यक्रमों
के माध्यम से
करोड़ों बच्चों
तक पहुँचने
वाली
हस्तक्षेप
रणनीतियाँ, इन
सभी में महिला
सांसदों की
नीति-उन्मुख
संवेदनशीलता
स्पष्ट दिखाई
देती है। वे
सुरक्षा और
समानता से
संबंधित
विधायी
सुधारों के
समर्थन में भी
अग्रसर रहती
हैं, जिससे
बजटीय आवंटन
और कल्याणकारी
ढाँचा अधिक
न्यायसंगत और
समावेशी बनता है।
अनुभवजन्य
अध्ययनों से
यह सतत सिद्ध
हुआ है कि जिन
निर्वाचन
क्षेत्रों का
नेतृत्व
महिला सांसदों
द्वारा किया
जाता है, वहाँ
शिक्षा,
स्वच्छता और
सार्वजनिक
सेवा-वितरण से
जुड़े संकेतक
उल्लेखनीय
रूप से बेहतर
होते हैं। ग्रामीण
क्षेत्रों
में
महिला-नेतृत्व
वाले निर्वाचन
क्षेत्रों
में साक्षरता
तथा स्वच्छता
कवरेज
सामान्य औसत
से 10–15 प्रतिशत
अधिक पाया गया
है। यह तथ्य
दर्शाता है कि
महिला
नेतृत्व जमीनी
विकास,
पारदर्शिता
और
उत्तरदायित्व
की संस्कृति को
सशक्त करता है, जो
शासन की
प्रभावशीलता
और जनता के
विश्वास को
बढ़ाता है।
संसद में
महिलाओं की
बढ़ती
उपस्थिति (जो
अब 14 से अधिक
दलों में
विस्तृत है और
कुछ राज्यों
में 12 प्रतिशत
से 38 प्रतिशत
तक पहुँचती
है) लोकतांत्रिक
प्रक्रियाओं
को अधिक विविध, सहभागी
और उत्तरदायी
बनाती है।
बहु-दृष्टिकोण
आधारित
विधायी निकाय
समाज की विविध
आवश्यकताओं
को बेहतर ढंग
से अभिव्यक्त
करते हैं, नीतियों
में
समावेशिता
लाते हैं, और
जनता की
भागीदारी व
निगरानी के
माध्यम से लोकतंत्र
की वैधता को
सुदृढ़ करते
हैं। इस प्रकार, महिला
नेतृत्व एक
न्यायपूर्ण, समानता-आधारित
और
लोकतांत्रिक
राष्ट्र के निर्माण
में अत्यंत
केंद्रीय
भूमिका
निभाता है।
9. निष्कर्ष
अठारहवीं
लोकसभा के
चुनाव भारतीय
लोकतंत्र के
विकास में एक
अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण
परिवर्तनकारी
चरण का प्रतीक
हैं, जहाँ
महिलाएँ न
केवल सक्रिय
मतदाता के रूप
में, बल्कि
प्रभावशाली
राजनीतिक
नेतृत्व, नीतिनिर्माण
में निर्णायक
भागीदार और
सामाजिक
परिवर्तन की
वाहक के रूप
में उभरकर
सामने आई हैं।
उनका बढ़ता
प्रतिनिधित्व
स्पष्ट करता
है कि महिलाएँ
राष्ट्रीय
नीति-निर्माण
को नई दिशा दे
सकती हैं, स्थानीय
शासन को अधिक
संवेदनशील और
उत्तरदायी
बना सकती हैं
तथा पारंपरिक
चुनावी
राजनीति को
अधिक समावेशी, न्यायपूर्ण
और विकासमुखी
स्वरूप
प्रदान कर सकती
हैं। यद्यपि
पितृसत्तात्मक
ढाँचे,
संसाधनों की
असमानता और
सामाजिक-सांस्कृतिक
पूर्वाग्रह
जैसी बाधाएँ
अभी भी
विद्यमान हैं, फिर
भी महिलाएँ
निरंतर
संघर्ष के
माध्यम से लोकतांत्रिक
प्रक्रियाओं
में अपनी
सशक्त
उपस्थिति
दर्ज करा रही
हैं। भारतीय
लोकतंत्र का
भविष्य इस बात
पर अत्यधिक
निर्भर करता
है कि
राजनीतिक
व्यवस्था किस
प्रकार
महिलाओं को
नेतृत्व के
अवसर,
संसाधन और
सुरक्षा
प्रदान करती
है। महिलाओं के
लिए विशेष
राजनीतिक
प्रशिक्षण, संवैधानिक
और विधायी
सुधार
(विशेषकर
महिला आरक्षण
अधिनियम) के
प्रभावी
कार्यान्वयन, सुरक्षित
राजनीतिक
वातावरण तथा
लैंगिक-संवेदनशील
संस्थागत
ढाँचे
अत्यावश्यक
हैं। इन प्रयासों
के माध्यम से
ही
दीर्घकालिक
लैंगिक
समानता
सुनिश्चित की
जा सकती है और
भारत एक अधिक
न्यायपूर्ण, प्रगतिशील
तथा समावेशी
लोकतांत्रिक
राष्ट्र के
रूप में आगे
बढ़ सकता है।
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