AUTONOMY AND PERFORMANCE OF DEMOCRATIC INSTITUTIONS IN INDIA A COMPARATIVE ASSESSMENT OF CONGRESS VS. NON-CONGRESS RULE

AUTONOMY AND PERFORMANCE OF DEMOCRATIC INSTITUTIONS IN INDIA A COMPARATIVE ASSESSMENT OF CONGRESS VS. NON-CONGRESS RULE

भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और प्रदर्शन कांग्रेसी बनाम गैरकांग्रेसी शासनकाल का तुलनात्मक मूल्यांकन

Preeti Kumari 1 Icon

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1 Research Scholar, Department of History, Malwanchal University, Indore, M.P., India

 

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ABSTRACT

English: This research paper presents a comparative assessment of the efforts made by Congress and non-Congress governments in establishing and preserving democratic values ​​in Indian politics. Within the context of India's complex democratic journey, this study examines the fundamental question of whether the nature of the ruling party (a long-dominant single party versus short-lived coalition parties) has shaped the trajectory of the country's democratic institutions, federalism, civil liberties, and social justice.

The research aims to conduct a historical-comparative analysis of major periods of governance from the 1950s to the present, utilizing primary and secondary data on constitutional amendments, center-state relations (particularly the use of Article 356), and civil liberties cases.

Preliminary findings suggest that while Congress rule often prioritized stability and centralized development, events like the Emergency represented a nadir in the erosion of civil liberties. On the other hand, non-Congress or coalition governments often placed greater emphasis on federal diversity and electoral reforms, but their policies sometimes exhibited risks of ideological polarization and institutional instability.

This research sheds light on the evolutionary patterns of Indian democracy and concludes that the establishment of democratic values ​​is not the sole domain of any single party, but rather a result of the changing nature of governance priorities and political accountability over time. This study will make a significant contribution to policymakers and scholars in understanding the future trajectory of Indian governance.

 

Hindi: यह शोध पत्र भारतीय राजनीति में कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना और संरक्षण के प्रयासों का एक तुलनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। भारतीय लोकतंत्र की जटिल यात्रा के संदर्भ में, यह अध्ययन इस मौलिक प्रश्न की जाँच करता है कि क्या शासक दल की प्रकृति (एक लंबे समय तक प्रभुत्व रखने वाली एकल पार्टी बनाम गठबंधन की छोटी अवधि की पार्टियां) ने देश के लोकतांत्रिक संस्थानों, संघवाद, नागरिक स्वतंत्रताओं और सामाजिक न्याय की दिशा को निर्धारित किया है।
शोध का उद्देश्य 1950 के दशक से वर्तमान तक की प्रमुख शासन अवधियों का ऐतिहासिक-तुलनात्मक विश्लेषण करना है, जिसके लिए संवैधानिक संशोधनों, केंद्र-राज्य संबंधों (विशेषकर अनुच्छेद 356 के उपयोग), और नागरिक स्वतंत्रता के मामलों पर प्राथमिक और द्वितीयक डेटा का उपयोग किया गया है।
प्रारंभिक निष्कर्ष बताते हैं कि जहाँ कांग्रेसी शासन ने अक्सर स्थिरता और केन्द्रीकृत विकास को प्राथमिकता दी, वहीं आपातकाल जैसी घटनाएँ नागरिक स्वतंत्रता के क्षरण का चरम बिंदु रहीं। दूसरी ओर, गैर-कांग्रेसी या गठबंधन सरकारों ने अक्सर संघीय विविधता और चुनावी सुधारों को अधिक महत्व दिया, लेकिन कई बार उनकी नीतियों में विचारधारात्मक ध्रुवीकरण और संस्थागत अस्थिरता के जोखिम भी देखे गए।
यह शोध भारतीय लोकतंत्र के विकासवादी पैटर्न पर प्रकाश डालता है और निष्कर्ष निकालता है कि लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना किसी एक दल के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, बल्कि यह समय के साथ शासन की प्राथमिकताओं और राजनीतिक जवाबदेही की बदलती प्रकृति का परिणाम है। यह अध्ययन नीति निर्माताओं और विद्वानों के लिए भारतीय शासन के भविष्य के प्रक्षेपवक्र को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

 

Received 28 October 2024

Accepted 29 November 2024

Published 31 December 2024

Corresponding Author

Preeti Kumari, kpreetib.ed88@gmail.com

DOI 10.29121/ShodhSamajik.v1.i1.2024.55  

Funding: This research received no specific grant from any funding agency in the public, commercial, or not-for-profit sectors.

Copyright: © 2024 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.

With the license CC-BY, authors retain the copyright, allowing anyone to download, reuse, re-print, modify, distribute, and/or copy their contribution. The work must be properly attributed to its author.

 

Keywords: Democratic Values, Congress, Non-Congress, Comparative Assessment, Indian Politics, Federalism, Secularism, Civil Liberties, लोकतांत्रिक मूल्य, कांग्रेस, गैर-कांग्रेस, तुलनात्मक मूल्यांकन, भारतीय राजनीति, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, नागरिक स्वतंत्रता

 

 


1.  प्रस्तावना

भारत का राजनीतिक इतिहास 1947 में स्वतंत्रता की प्राप्ति के साथ एक संवैधानिक लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने के महत्वाकांक्षी प्रयास का साक्षी रहा है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित लोकतांत्रिक मूल्य—जिनमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और संप्रभुता जैसे आदर्श शामिल हैं, इन्हें राष्ट्र की आधारशिला के रूप में परिभाषित किया गया Basu (2016) इन मूल्यों की संस्थापना और क्रियान्वयन भारतीय राज्य के प्राथमिक दायित्व रहे हैं।

स्वतंत्रता के पश्चात, भारतीय राजनीति एक विशिष्ट राजनीतिक प्रतिमान के इर्द-गिर्द विकसित हुई जिसे प्रख्यात राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी ने 'कांग्रेस प्रणाली' ('The Congress System') के रूप में वर्णित किया था Kothari (1970)। इस प्रणाली की विशेषता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का केंद्र और अधिकांश राज्यों में लगभग तीन दशकों तक अटूट प्रभुत्व था। इस अवधि को राजनीतिक स्थिरता, संस्थागत निर्माण और केंद्रीकृत योजना के युग के रूप में देखा जाता है।

तथापि, 1970 के दशक के मध्य में हुई आंतरिक आपातकाल (1975-77) की घटना, जिसमें नागरिक स्वतंत्रताओं का व्यापक रूप से दमन किया गया था, ने लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण की प्रवृत्ति को उजागर किया और कांग्रेस प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाया Hasan (2005)। इस घटना के परिणामस्वरूप, 1977 में पहली बार केंद्र में एक गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार (जनता पार्टी) की स्थापना हुई, जिसने भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात किया।

इसके पश्चात, भारतीय राजनीतिक पटल में एक ढांचागत परिवर्तन आया, जिसे गठबंधन की राजनीति (Coalition Politics), क्षेत्रीय दलों के उदय और केंद्र में विभिन्न गैर-कांग्रेसी दलों द्वारा नेतृत्व की गई सरकारों की क्रमिक स्थापना से चिन्हित किया जाता है Jaffrelot (2019)। ये नए राजनीतिक अभिकर्ता (Actors) अक्सर संघवाद (Federalism) को बढ़ावा देने, सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देने (जैसे मंडल आयोग की सिफ़ारिशों का क्रियान्वयन), और बहुलवादी समाज के हितों को प्रतिबिंबित करने का दावा करते हैं।

यह द्विभाजन (dichotomy) शासन की प्रकृति और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के प्रति राज्य के दृष्टिकोण में मौलिक अंतरों को रेखांकित करता है।

इस संदर्भ में, यह तुलनात्मक मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है कि क्या राजनीतिक दल की प्रकृति—चाहे वह एक प्रभुत्वशाली केंद्रीकृत इकाई हो या विविध हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक गठबंधन ने वास्तव में भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मज़बूती, जवाबदेही, और नागरिकों की स्वतंत्रता को भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रभावित किया है। यह शोध इसी महत्वपूर्ण राजनीतिक और अकादमिक अंतराल को भरने का प्रयास करता है।

 

2.  साहित्य समीक्षा (Review of Literature)

साहित्य समीक्षा का उद्देश्य कांग्रेसी एवं गैर-कांग्रेसी सरकारों के तहत भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के विषय पर उपलब्ध अकादमिक संवाद को स्थापित करना है। यह समीक्षा दो मुख्य वैचारिक धाराओं पर केंद्रित है: कांग्रेस प्रणाली का संस्थागत प्रभुत्व और गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा लाए गए परिवर्तनकारी प्रभाव।

1)     कांग्रेस प्रणाली और संस्थागत प्रभुत्व पर साहित्य

स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों पर केंद्रित साहित्य मुख्य रूप से जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के प्रभुत्व वाले युग के संस्थागत निर्माण की प्रशंसा करता है।

·        Kothari (1970): रजनी कोठारी के seminal कार्य "Politics in India" ने 'कांग्रेस सिस्टम' की अवधारणा प्रस्तुत की। यह मॉडल दर्शाता है कि कांग्रेस एक विस्तृत छत्र-संगठन (Catch-all Party) के रूप में कार्य करती थी, जो विभिन्न सामाजिक और वैचारिक गुटों को समायोजित करके राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करती थी, जिससे लोकतंत्र के प्रारंभिक संस्थानों को जड़ें जमाने का अवसर मिला।

·        Frankel (1990): विद्वानों ने तर्क दिया कि कांग्रेस के शासनकाल में, विशेष रूप से नेहरूवादी युग में, संवैधानिक मर्यादाओं और धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों को प्रमुखता दी गई, हालाँकि केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों पर नियंत्रण की प्रवृत्ति भी स्पष्ट थी।

·        आपत्तिकर्ताओं के विचार: इन सकारात्मक आकलनों के बावजूद, कई विद्वान इंदिरा गांधी के काल को लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण का समय मानते हैं। संजय बारू और तारीक कुरैशी जैसे लेखकों ने 1975 के आपातकाल को संस्थागत स्वतंत्रता, विशेष रूप से न्यायपालिका और प्रेस की स्वतंत्रता, पर सीधा हमला बताया है Baru (2017)। यह विमर्श कांग्रेस के शासन के तहत "संस्थागत सुदृढ़ीकरण" और "व्यक्तिवादी विमुद्रीकरण" के बीच के विरोधाभास को उजागर करता है।

2)     गैर-कांग्रेसी युग, संघवाद और बहुलवाद पर साहित्य

1977 के बाद भारतीय राजनीति में आए महत्वपूर्ण बदलावों का विश्लेषण करने वाले साहित्य ने गैर-कांग्रेसी शासन के प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया।

·        Jaffrelot (2019): क्रिस्टोफ़ ज्याफ्रेलॉट जैसे विद्वानों ने क्षेत्रीय दलों और गठबंधन की राजनीति के उदय को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक विकास के रूप में देखा। उनका तर्क है कि गैर-कांग्रेसी सरकारें संघवाद को मजबूत करने के लिए बाध्य थीं, जिससे केंद्र-राज्य संबंधों में सत्ता का अधिक विकेंद्रीकरण हुआ।

·        सामाजिक न्याय का विमर्श: मंडल आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन ने गैर-कांग्रेसी सरकारों के तहत समावेशी लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की धारणाओं को आगे बढ़ाया Shah (2004)। यह दर्शाता है कि इन सरकारों ने पारंपरिक उच्च-वर्गीय प्रभुत्व को चुनौती दी और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को विस्तृत किया।

·        नव-उदारवाद और अर्थव्यवस्था: मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 1991 के आर्थिक सुधारों से शुरू होकर, गैर-कांग्रेसी सरकारों (जैसे वाजपेयी शासन और हालिया मोदी शासन) ने आर्थिक नीति में बदलाव किया है, जिसका प्रभाव आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक-आर्थिक असमानता पर पड़ा है Bhagwati and Panagariya (2012)

3)     तुलनात्मक शासन और लोकतांत्रिक मानदंडों पर साहित्य

दोनों शासन अवधियों की सीधी तुलना करने वाले साहित्य की मात्रा सीमित है, लेकिन कुछ अध्ययनों ने विशिष्ट क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया है:

·        विशिष्ट सुधारों का तुलनात्मक अध्ययन: कुछ कार्य यह तुलना करते हैं कि सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम और विभिन्न नियामक निकायों की स्थापना का समर्थन किस प्रकार दोनों प्रकार की सरकारों द्वारा किया गया था। ये तुलनाएँ अक्सर जवाबदेही और पारदर्शिता के प्रति दोनों मॉडलों की प्रतिबद्धता में अंतर दिखाती हैं।

·        धर्मनिरपेक्षता पर बहस: धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों पर दोनों शासन अवधियों के प्रदर्शन की आलोचनात्मक तुलना एक प्रमुख बहस का विषय है, जिसमें बाबरी मस्जिद विवाद से लेकर हालिया नागरिकता कानूनों तक की घटनाओं का विश्लेषण किया गया है, यह दर्शाता है कि यह मूल्य राजनीतिक नेतृत्व के आधार पर कितना परिवर्तनशील रहा है Gopal (2019)

4)     शोध अंतराल (Research Gap) का निर्धारण

उपलब्ध साहित्य विभिन्न शासन अवधियों की विशेषताओं को विस्तार से बताता है। हालाँकि, एक समग्र, व्यवस्थित और मापनीय तुलना का अभाव है जो निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दे सके:

·        व्यवस्थित मूल्यांकन: ऐसा कोई एकीकृत ढाँचा नहीं है जो चुनिंदा लोकतांत्रिक संकेतकों (जैसे, प्रेस की स्वतंत्रता सूचकांक, संघवाद सूचकांक, मानवाधिकार रिकॉर्ड) के आधार पर कांग्रेस और गैर-कांग्रेसी सरकारों के प्रदर्शन की मात्रात्मक तुलना करता हो।

·        मूलभूत प्राथमिकताएं: साहित्य यह स्पष्ट रूप से रेखांकित नहीं करता है कि क्या दोनों शासन मॉडलों ने जानबूझकर विभिन्न लोकतांत्रिक मूल्यों को अलग-अलग प्राथमिकताएं दी हैं (जैसे, कांग्रेस ने 'राष्ट्रीय एकता' को प्राथमिकता दी हो, जबकि गैर-कांग्रेसी सरकारों ने 'क्षेत्रीय स्वायत्तता' को)।

·        दीर्घकालिक प्रभाव: दोनों प्रकार की सरकारों के संवैधानिक संशोधनों और संस्थागत सुधारों का लोकतांत्रिक मूल्यों पर दीर्घकालिक प्रभाव क्या रहा है, इसकी आलोचनात्मक और तुलनात्मक गहराई में जाँच की आवश्यकता है।

यह शोध इस अंतराल को भरता है, क्योंकि यह एक एकीकृत विश्लेषणात्मक ढाँचे का उपयोग करके कांग्रेस और गैर-कांग्रेसी सरकारों के तहत लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना का एक प्रत्यक्ष और व्यवस्थित तुलनात्मक मूल्यांकन प्रदान करता है।

 

3.  शोध के उद्देश्य (Objectives of the Study)

किसी भी अकादमिक शोध की सफलता उसके स्पष्ट और प्राप्त किए जा सकने वाले उद्देश्यों पर निर्भर करती है। प्रस्तुत शोध का केंद्रीय लक्ष्य कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी शासन के तहत भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के तुलनात्मक पैटर्न की व्यवस्थित रूप से जाँच करना है।

इस शोध के विशिष्ट उद्देश्य (Specific Objectives) निम्नलिखित हैं:

1)     संस्थागत प्रभाव का मूल्यांकन: कांग्रेसी शासन (विशेष रूप से 1950-70 के दशक और आपातकाल के दौरान) के तहत प्रमुख लोकतांत्रिक संस्थानों (न्यायपालिका, संसद, कार्यपालिका) की स्वायत्तता और उनकी मज़बूती पर पड़े प्रभावों का गहन विश्लेषण करना।

2)     वैकल्पिक शासन का अध्ययन: केंद्र में सत्तासीन हुए प्रमुख गैर-कांग्रेसी सरकारों (जैसे जनता पार्टी, राष्ट्रीय मोर्चा, एनडीए, यूपीए, इत्यादि) द्वारा संघीय ढाँचे और जवाबदेही के मूल्यों को बढ़ावा देने या प्रतिबंधित करने के विशिष्ट प्रयासों का दस्तावेज़ीकरण करना।

3)     मूल्यों का तुलनात्मक संकेतक विकास: दोनों शासन अवधियों में नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties), प्रेस की स्वतंत्रता, भ्रष्टाचार विरोधी उपायों, और राजनीतिक भागीदारी जैसे प्रमुख लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रदर्शन को मापने के लिए एक तुलनात्मक विश्लेषणात्मक ढाँचा (Analytical Framework) विकसित करना।

4)     संघवाद की जाँच: केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में अनुच्छेद 356 के उपयोग और अंतर-राज्य विवादों को हल करने की पद्धति में दोनों प्रकार की सरकारों के व्यवहार और प्राथमिकता की तुलना करना।

5)     दीर्घकालिक निष्कर्ष: इन दोनों शासन मॉडलों द्वारा स्थापित नीतियों और प्रथाओं का भारतीय लोकतंत्र के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और स्थिरता पर पड़े समग्र प्रभाव को रेखांकित करना।

 

4.  शोध प्रश्न (Research Questions)

शोध के उद्देश्य विशिष्ट कार्रवाइयों को परिभाषित करते हैं, जबकि शोध प्रश्न वह आधारभूत जिज्ञासा हैं जिनका उत्तर प्राप्त करने के लिए संपूर्ण अनुसंधान डिज़ाइन किया गया है।

प्रस्तुत शोध निम्नलिखित केंद्रीय और उप-प्रश्न (Central and Sub-Questions) पर केंद्रित होगा:

 

5.  केंद्रीय प्रश्न (Central Question)

प्रश्न 1: कांग्रेसी एवं गैर-कांग्रेसी सरकारों के शासनकाल के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना और संरक्षण के पैटर्न में क्या महत्वपूर्ण और व्यवस्थित अंतर हैं, और इन अंतरों के संस्थागत और वैचारिक कारण क्या हैं?

उप-प्रश्न (Sub-Questions)

प्रश्न 2: नागरिक स्वतंत्रता और आपातकालीन शक्तियाँ क्या गैर-कांग्रेसी सरकारों ने नागरिक स्वतंत्रताओं और व्यक्तिगत अधिकारों का सम्मान करने के मामले में कांग्रेसी सरकारों (विशेष रूप से आपातकाल के संदर्भ को छोड़कर) की तुलना में अधिक सुसंगत या बेहतर रिकॉर्ड प्रदर्शित किया है?

प्रश्न 3: संस्थागत स्वायत्तता और मज़बूती दोनों प्रकार की सरकारों ने चुनावी संस्थाओं (Election Commission), न्यायपालिका (Judiciary) और संसदीय समितियों जैसे लोकतांत्रिक संस्थानों की स्वायत्तता और वित्तीय स्वतंत्रता को किस प्रकार प्रभावित किया है?

प्रश्न 4: संघवाद और विकेंद्रीकरण की प्रकृति क्या क्षेत्रीय दलों पर आधारित गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकारों ने कांग्रेसी शासन की तुलना में संघवाद के मूल्यों को अधिक मज़बूत किया है, विशेष रूप से संसाधनों के वितरण और राज्य की नीति निर्धारण में स्वायत्तता के संदर्भ में?

प्रश्न 5: वैचारिक प्राथमिकताएँ और सामाजिक न्याय किस हद तक, दोनों शासन मॉडलों की आधारभूत विचारधारा (कांग्रेस का 'समावेशी राष्ट्रवाद' बनाम गैर-कांग्रेसी/क्षेत्रीय दलों का 'पहचान की राजनीति' या 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद') ने समानता, सामाजिक न्याय और बहुलवाद जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों के क्रियान्वयन की प्राथमिकता को प्रभावित किया है?

 

6.  कार्यप्रणाली (Methodology)

यह खंड इस शोध पत्र की अनुसंधान अभिकल्पना (Research Design) को विस्तार से प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य कांग्रेसी एवं गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के तुलनात्मक मूल्यांकन को प्राप्त करना है।

 

6.1.      अनुसंधान दृष्टिकोण (Research Approach)

प्रस्तुत अध्ययन एक गुणात्मक (Qualitative) और ऐतिहासिक-तुलनात्मक (Historical-Comparative) अनुसंधान दृष्टिकोण अपनाता है।

1)     गुणात्मक विश्लेषण का चयन: इस दृष्टिकोण को इसलिए चुना गया है क्योंकि लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में राजनीतिक निर्णय, संस्थागत व्यवहार और विचारधारात्मक प्रभाव जैसे गहन और व्याख्यात्मक तत्वों की समझ आवश्यक है, जिसे मात्र मात्रात्मक डेटा से प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

2)     ऐतिहासिक-तुलनात्मक विधि: यह विधि तुलना के आधार पर निष्कर्ष निकालने पर केंद्रित है। इसके तहत भारतीय राजनीति के दो विशिष्ट राजनीतिक प्रतिमानों (कांग्रेसी प्रभुत्व बनाम गैर-कांग्रेसी/गठबंधन शासन) के बीच कारण और प्रभाव (Causality) संबंधों की जाँच की जाएगी।

 

6.2.      डेटा के स्रोत और प्रकार (Sources and Types of Data)

अनुसंधान को पुष्ट करने के लिए प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार के डेटा स्रोतों का उपयोग किया जाएगा:

1)     प्राथमिक स्रोत (Primary Sources):

·        संवैधानिक और विधायी दस्तावेज: विभिन्न शासन अवधियों के दौरान किए गए महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों (जैसे 42वाँ और 44वाँ संशोधन) के आधिकारिक पाठ।

·        सरकारी आयोग की रिपोर्ट: सरकारीया आयोग (केंद्र-राज्य संबंध), मंडल आयोग और विभिन्न चुनावी सुधार समितियों की रिपोर्टें, जो सरकारों की आधिकारिक प्राथमिकताओं को दर्शाती हैं।

·        संसदीय रिकॉर्ड: लोकतंत्र के प्रमुख मुद्दों (जैसे न्यायिक नियुक्तियाँ, आपातकालीन शक्तियाँ, नागरिक स्वतंत्रताएँ) पर कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी सरकारों के दौरान हुई संसदीय बहसें और वक्तव्य।

·        आँकड़े: विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (जैसे इकॉनोमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट, फ्रीडम हाउस) द्वारा प्रकाशित 'डेमोक्रेसी इंडेक्स' और 'प्रेस फ्रीडम इंडेक्स' के चुनिंदा मात्रात्मक डेटा का गुणात्मक व्याख्या के लिए उपयोग।

2)     द्वितीयक स्रोत (Secondary Sources):

·        शैक्षणिक पुस्तकें और शोध पत्र: भारतीय राजनीति, संवैधानिक कानून, और राजनीतिक सिद्धांत के क्षेत्र में प्रख्यात विद्वानों द्वारा लिखित आलोचनात्मक साहित्य (साहित्य समीक्षा में संदर्भित)।

·        जवाबदेही संस्थानों की रिपोर्ट: मानवाधिकार संगठनों, चुनाव आयोग और CAG जैसे संवैधानिक निकायों द्वारा जारी वार्षिक रिपोर्टें।

·        विश्वसनीय मीडिया विश्लेषण: प्रमुख अकादमिक/राजनीतिक पत्रिकाओं में प्रकाशित गहन खोजी लेख और संपादकीय जो प्रमुख राजनीतिक निर्णयों पर प्रकाश डालते हैं।

 

6.3.      विश्लेषण की अवधि और केस स्टडी (Period and Case Studies)

शोध का विश्लेषण निम्नलिखित चुनिंदा केस स्टडीज़ पर केंद्रित होगा, जो दोनों शासन मॉडलों की प्रतिनिधि अवधि हैं:

अध्ययन की अवधि (Timeline): 1950 (संविधान लागू होने) से वर्तमान तक।

शासन मॉडल

प्रतिनिधि केस स्टडी (उदाहरण)

विश्लेषण का मुख्य फोकस

कांग्रेसी शासन

1. इंदिरा गांधी का शासन (1971-1977)

संस्थागत केंद्रीकरण, आपातकाल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रभाव।

 

2. राजीव गांधी का शासन (1984-1989)

दल-बदल विरोधी कानून, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, धार्मिक स्वतंत्रता पर राज्य का दृष्टिकोण।

गैर-कांग्रेसी शासन

1. जनता पार्टी शासन (1977-1979)

44वाँ संवैधानिक संशोधन, नागरिक स्वतंत्रताओं की पुनर्स्थापना।

 

2. अटल बिहारी वाजपेयी का NDA शासन (1998-2004)

गठबंधन प्रबंधन, संघवाद के प्रति दृष्टिकोण, निजीकरण।

 

3. वर्तमान NDA शासन (2014-वर्तमान)

केंद्र-राज्य संबंध (जीएसटी परिषद), जवाबदेही संस्थाओं पर प्रभाव, नागरिकता संबंधी कानून।

 

 

 

 

 

 

6.4.      डेटा विश्लेषण रणनीति (Data Analysis Strategy)

डेटा विश्लेषण के लिए विषयगत और तुलनात्मक कोडिंग (Thematic and Comparative Coding) तकनीकों का उपयोग किया जाएगा:

1)     विषयगत विश्लेषण (Thematic Analysis): प्राथमिक और द्वितीयक डेटा से लोकतांत्रिक मूल्यों से संबंधित विशिष्ट विषयवस्तु (थीम्स) को निकाला जाएगा। प्रमुख विषयों में 'न्यायिक स्वतंत्रता', 'संघीय सहयोग', 'नागरिकों के अधिकार की सुरक्षा' आदि शामिल होंगे।

2)     क्रॉस-केस तुलना (Cross-Case Comparison): निकाले गए विषयों के आधार पर, कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी शासन अवधियों के बीच व्यवस्थित तुलना की जाएगी। उदाहरण के लिए, "न्यायिक स्वतंत्रता" के मूल्य पर दोनों प्रकार की सरकारों का स्कोर/व्यवहार कैसा रहा, इसकी तुलना की जाएगी।

3)     अंतर की व्याख्या: तुलना के माध्यम से प्राप्त अंतरों को राजनीतिक विचारधारा, नेतृत्व शैली और तात्कालिक राजनीतिक अनिवार्यता के संदर्भ में व्याख्यायित किया जाएगा, जिससे यह स्थापित किया जा सके कि दोनों शासन मॉडलों के तहत लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना किस हद तक भिन्न रही।

 

7.  डेटा विश्लेषण और तुलनात्मक मूल्यांकन (Data Analysis and Comparative Evaluation)

यह खंड कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी सरकारों के शासनकाल के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के संदर्भ में उनके व्यवहार, नीतिगत प्राथमिकताओं और संस्थागत प्रभावों का एक व्यवस्थित तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। विश्लेषण को विशिष्ट लोकतांत्रिक आयामों के आधार पर संरचित किया गया है, जिसकी शुरुआत संस्थागत मज़बूती और जवाबदेही से होती है।

 

7.1.      संस्थागत मज़बूती और जवाबदेही (Institutional Strengthening and Accountability)

संस्थागत मज़बूती एक ऐसा लोकतांत्रिक मूल्य है जहाँ राजनीतिक कार्यपालिका (Executive) संवैधानिक संस्थानों (Judiciary, Legislature, Election Commission) की स्वायत्तता का सम्मान और संरक्षण करती है। जवाबदेही (Accountability) तंत्र की स्थापना सरकार को नागरिकों के प्रति पारदर्शी और उत्तरदायी बनाती है।

1)     न्यायपालिका और नागरिक स्वतंत्रताएं (Judiciary and Civil Liberties)

दोनों शासन मॉडलों के तहत न्यायिक स्वतंत्रता का परीक्षण आवश्यक है, क्योंकि न्यायपालिका लोकतंत्र में अंतिम चेक और बैलेंस का कार्य करती है।

कसौटी

कांग्रेसी शासन (प्रभुत्व काल)

गैर-कांग्रेसी शासन (गठबंधन/वैकल्पिक काल)

तुलनात्मक निष्कर्ष

न्यायिक हस्तक्षेप

सकारात्मक: शुरुआती वर्षों में नेहरू युग में सक्रियतावाद (Judicial Activism) को सीमित स्वीकृति Dhavan (1980)

नकारात्मक: 1970 के दशक में न्यायपालिका पर प्रत्यक्ष दबाव, A.N. रे की नियुक्ति, और एडीएम जबलपुर केस (ADM Jabalpur Case) जिसने नागरिक स्वतंत्रता को निलंबित कर दिया।

सकारात्मक: 1977 के बाद 44वाँ संशोधन लाकर मौलिक अधिकारों की सुरक्षा मज़बूत की गई। RTI(सूचना का अधिकार) जैसे कानून गैर-कांग्रेसी (UPA) शासन में लागू हुए, जिसने जवाबदेही बढ़ाई।

कांग्रेसी शासन में अस्थिरता: कांग्रेस के प्रभुत्व वाले चरण में न्यायिक स्वतंत्रता पर अत्यधिक व्यक्तिगत और राजनीतिक दबाव Hasan (2005) देखा गया। गैर-कांग्रेसी सरकारों ने, दबाव की राजनीति के बावजूद, जवाबदेही बढ़ाने वाले कानूनी सुधारों को प्राथमिकता दी।

सिविल स्वतंत्रताएँ

आपातकाल (1975-77): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता का पूर्ण निलंबन।

विभिन्न दृष्टिकोण: गैर-कांग्रेसी शासन के तहत विशिष्ट राजनीतिक आंदोलनों (जैसे राम जन्मभूमि आंदोलन) और हाल के वर्षों में UAPA जैसे कड़े कानूनों का उपयोग नागरिक स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

मात्रा में अंतर: जबकि कांग्रेसी शासन का विचलन केन्द्रीकृत और एकल घटना (आपातकाल) के रूप में था, गैर-कांग्रेसी शासनों में विचलन अधिक विकेन्द्रीकृत और वैचारिक तनावों से प्रेरित प्रतीत होता है।

 

2)     संवैधानिक संशोधन और कार्यकारी शक्ति का विस्तार

संवैधानिक संशोधन की प्रकृति यह दर्शाती है कि कार्यपालिका लोकतांत्रिक मर्यादाओं का कितना सम्मान करती है।

·        कांग्रेसी प्रभुत्व की विशेषताएँ: कांग्रेस के लंबे कार्यकाल में संवैधानिक संशोधन अक्सर कार्यपालिका की शक्ति को बढ़ाने पर केंद्रित रहे हैं, विशेष रूप से 42वाँ संशोधन (1976) जो संसद की शक्ति को सर्वोच्च बनाते हुए न्यायिक समीक्षा को सीमित करने का एक प्रमुख उदाहरण था। इस संशोधन को 'मिनी-संविधान' भी कहा जाता है (Sood, 2013)।

·        गैर-कांग्रेसी सरकारों का योगदान: इसके विपरीत, गैर-कांग्रेसी सरकारों ने अक्सर संवैधानिक मर्यादाओं को बहाल करने पर ध्यान केंद्रित किया। 44वाँ संशोधन (1978), जिसे जनता पार्टी सरकार द्वारा लाया गया, ने 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार' (अनुच्छेद 21) को आपातकाल के दौरान भी निलंबित न किए जाने की गारंटी दी। यह एक स्पष्ट संकेत था कि गैर-कांग्रेसी शासन नागरिक अधिकारों की सुरक्षा को उच्च प्राथमिकता देते हैं।

3)     भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र और पारदर्शिता

जवाबदेही सुनिश्चित करने में भ्रष्टाचार विरोधी तंत्रों का निर्माण महत्वपूर्ण है।

·        जवाबदेही में नवाचार: सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम (2005), जिसे यूपीए सरकार (गैर-कांग्रेसी गठबंधन) के तहत लागू किया गया था, भारतीय लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने वाला सबसे महत्वपूर्ण विधायी कदम माना जाता है। यह कानून नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व को सीधे जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है Goel and Singh (2011)

·        लोकपाल और लोक आयुक्त: भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल की संस्था का विचार हालाँकि दशकों पुराना है, लेकिन इसे लागू करने में दोनों प्रकार की सरकारों ने विलंब किया। कांग्रेसी शासन और बाद की सरकारों ने राजनीतिक हितों के कारण इस संस्था को पूरी तरह स्वायत्त बनाने में हिचकिचाहट दिखाई, जिससे जवाबदेही तंत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रही।

निष्कर्ष: संस्थागत मज़बूती और जवाबदेही

तुलनात्मक डेटा विश्लेषण यह प्रदर्शित करता है कि:

·        कांग्रेस (INC) के प्रभुत्व वाले युग में संस्थागत मज़बूती पर राजनीतिक स्थिरता और केंद्रीकृत शक्ति को प्राथमिकता दी गई, जिसके परिणामस्वरूप कुछ अवधियों में संस्थागत स्वतंत्रता (विशेषकर न्यायपालिका और प्रेस) से समझौता किया गया।

·        गैर-कांग्रेसी (गठबंधन/वैकल्पिक) सरकारों ने, राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद, जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण विधायी सुधारों (जैसे 44वाँ संशोधन, RTI) को लागू करने में अधिक तत्परता दिखाई। यह संभवतः बहुदलीय गठबंधन की राजनीति का परिणाम था, जहाँ विभिन्न साझेदारों के दबाव ने सरकार को अत्यधिक केन्द्रीकरण से रोका।

 

7.2.      संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध (Federalism and Centre-State Relations)

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक मूलभूत स्तंभ इसका संघीय ढाँचा (Federal Structure) है, जिसकी विशेषता केंद्र (Union) और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण है। इस खंड में कांग्रेसी एवं गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा इस संघीय संतुलन को बनाए रखने या उसमें बदलाव लाने के प्रयासों का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है, विशेष रूप से राजनीतिक, प्रशासनिक और वित्तीय आयामों के संदर्भ में।

1)     केंद्र-राज्य शक्ति संतुलन की राजनीतिक गतिशीलता

कांग्रेसी प्रभुत्व (Congress Dominance):

·        केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति: 1950 से 1970 के दशक के दौरान, कांग्रेस के प्रभुत्व वाले युग को 'एकल दल प्रभुत्व' (One-Party Dominance) के कारण राजनीतिक केन्द्रीकरण की प्रबल प्रवृत्ति से चिन्हित किया जाता है Kashyap (2018)। राज्यों में भी प्रायः कांग्रेस की सरकारें होने के कारण, 'उच्च कमान' (High Command) द्वारा लिए गए निर्णयों का सीधा प्रभाव राज्यों पर पड़ता था, जिससे संघीय सिद्धांत के स्थान पर एक अर्ध-संघीय (Quasi-Federal) या एकात्मक झुकाव (Unitary Bias) वाली संरचना मज़बूत हुई।

·        अनुच्छेद 356 का उपयोग: कांग्रेसी सरकारों द्वारा अनुच्छेद 356 (राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन) का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को हटाने के लिए बार-बार और व्यापक रूप से किया गया। इस मनमाने उपयोग को संघीय भावना के सबसे बड़े उल्लंघन के रूप में देखा जाता है Sarkaria Commission. (1988)

गैर-कांग्रेसी शासन (Non-Congress/Coalition Era):

·        संघवाद का सुदृढ़ीकरण: 1989 के बाद गठबंधन की राजनीति के उदय ने संघवाद को एक नई दिशा दी। क्षेत्रीय दलों का केंद्र सरकार में शामिल होना एक अपरिहार्य राजनीतिक आवश्यकता बन गया, जिससे केंद्र को राज्यों के हितों के प्रति अधिक संवेदनशील होना पड़ा Jaffrelot (2019)

·        अनुच्छेद 356 में संयम: गैर-कांग्रेसी सरकारों ने, विशेष रूप से अटल बिहारी वाजपेयी और बाद के गठबंधन शासनों ने, एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के कारण, अनुच्छेद 356 के उपयोग में अधिक संयम दिखाया। यह संयम राजनीतिक मजबूरी और न्यायिक निगरानी दोनों का परिणाम था।

2)     प्रशासनिक और विधायी संबंध

संघीय संतुलन प्रशासनिक उपकरणों के माध्यम से भी परखा जाता है, जैसे कि अखिल भारतीय सेवाएं (All India Services) और अंतर-राज्य परिषदें (Inter-State Councils)।

·        अखिल भारतीय सेवाओं पर प्रभाव: कांग्रेसी शासन के दौरान, अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS) ने केंद्र के एजेंट के रूप में कार्य किया, जिससे केंद्र सरकार की नीतियों को राज्यों पर थोपना आसान हो गया। हालांकि, गैर-कांग्रेसी सरकारों ने भी इन सेवाओं के माध्यम से केंद्र की शक्ति बनाए रखी है, लेकिन क्षेत्रीय राजनीतिक चेतना के कारण राज्य सरकारों का प्रशासनिक नियंत्रण कुछ हद तक बढ़ा है।

·        अंतर-राज्य परिषदों की भूमिका: सरकारिया आयोग की सिफारिश के बावजूद, अंतर-राज्य परिषदों की स्थापना और नियमित बैठकें पहले कांग्रेस और बाद में गैर-कांग्रेसी सरकारों के तहत अव्यवस्थित रही हैं। दोनों शासन मॉडलों ने औपचारिक संघीय तंत्रों के बजाय अनौपचारिक राजनीतिक संवादों पर अधिक भरोसा किया, जिससे संवैधानिक संघवाद कमजोर हुआ।

3)     वित्तीय संघवाद का तुलनात्मक अध्ययन

वित्तीय स्वायत्तता राज्यों के सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण है।

·        कांग्रेस युग में वित्तीय केन्द्रीकरण: कांग्रेसी शासन के दौरान, योजना आयोग (Planning Commission) और वित्त मंत्रालय के माध्यम से वित्तीय शक्तियों का अत्यधिक केन्द्रीकरण किया गया था। राज्यों को केंद्रीय योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes) के लिए केंद्र पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे उनकी वित्तीय स्वायत्तता और नीतिगत स्वतंत्रता गंभीर रूप से बाधित होती थी Rao and Singh (2011)

·        गैर-कांग्रेसी युग में सुधार: गैर-कांग्रेसी सरकारों के तहत, विशेष रूप से वित्त आयोग की सिफारिशों को अधिक महत्व दिया गया। हाल ही में योजना आयोग को नीति आयोग से प्रतिस्थापित करना और वस्तु एवं सेवा कर (GST) परिषद की स्थापना, जिसे एक संघीय निकाय के रूप में संचालित किया जाता है, वित्तीय संघवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संस्थागत नवाचार रहे हैं। हालाँकि, जीएसटी परिषद के भीतर भी केंद्र के पास निर्णय लेने की अधिमान्य शक्ति (preferential power) होने के कारण वित्तीय स्वायत्तता अभी भी बहस का विषय है।

निष्कर्ष: संघीय मूल्यों पर प्रभाव

तुलनात्मक विश्लेषण दर्शाता है कि:

·        कांग्रेसी सरकारों ने राजनीतिक और प्रशासनिक केन्द्रीकरण को बढ़ावा देकर संघीय मूल्यों को अधीनस्थ किया, जिससे भारतीय संघ का चरित्र एकात्मक हो गया।

·        गैर-कांग्रेसी सरकारों ने गठबंधन की राजनीति की मजबूरी और क्षेत्रीय दलों के दबाव के कारण संघवाद के सिद्धांतों को अधिक सम्मान दिया। इन सरकारों ने वित्तीय और राजनीतिक विकेंद्रीकरण की दिशा में कदम उठाए, जिससे संघवाद अधिक सहकारी (Cooperative) और सौदेबाजी-आधारित (Bargaining-based) बन गया। यह परिवर्तन भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में क्षेत्रीय हितों के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।

 

7.3.      चुनावी सुधार और समावेशी राजनीति (Electoral Reforms and Inclusive Politics)

लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में चुनावी सुधार पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करते हैं, जबकि समावेशी राजनीति समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व प्रदान करके समानता के मूल्य को मज़बूत करती है। इस खंड में कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा इन दोनों आयामों के प्रति अपनाए गए तुलनात्मक दृष्टिकोण का विश्लेषण किया गया है।

1)     चुनावी सुधार और संस्थागत स्वायत्तता (Electoral Reforms and Institutional Autonomy)

चुनावी सुधारों के प्रति राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता का आकलन दो पहलुओं पर किया जा सकता है: चुनाव आयोग (Election Commission of India- ECI) की स्वायत्तता और प्रक्रियात्मक पारदर्शिता।

कांग्रेसी शासन का दृष्टिकोण:

·        नियंत्रण और प्रभाव: कांग्रेस के प्रभुत्व वाले शुरुआती दशकों में, चुनाव आयोग को संवैधानिक रूप से स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित किया गया, लेकिन व्यवहार में, इसकी स्वायत्तता और कार्यात्मक स्वतंत्रता पर अक्सर कार्यपालिका का प्रभाव हावी रहा Suri (2011)। टी.एन. शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल से पहले, चुनाव मशीनरी पर केंद्र सरकार का नियंत्रण अधिक स्पष्ट था।

·        पहला प्रमुख सुधार: दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) (52वाँ संशोधन, 1985) राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया था। हालाँकि, यह सुधार मुख्यतः राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया गया था, न कि अनिवार्य रूप से व्यापक प्रक्रियात्मक पारदर्शिता के लिए।

गैर-कांग्रेसी शासन का दृष्टिकोण:

·        स्वायत्तता को मज़बूत करना: गैर-कांग्रेसी सरकारों के युग (विशेषकर वी.पी. सिंह और एन.डी.ए. शासनों) के दौरान, चुनाव आयोग को अभूतपूर्व स्वायत्तता और शक्ति मिली, जिसका श्रेय आंशिक रूप से टी.एन. शेषन की नेतृत्व क्षमता और आंशिक रूप से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दबाव को जाता है। फोटो पहचान पत्र (EPIC) और आचार संहिता को सख्ती से लागू करने जैसे महत्वपूर्ण कदम इसी अवधि में उठे।

·        प्रक्रियात्मक पारदर्शिता: चुनावी बॉन्ड जैसी फंडिंग योजनाएँ, जो पारदर्शिता को कम करने के लिए आलोचना का शिकार हुईं, हाल के वर्षों की गैर-कांग्रेसी सरकार द्वारा पेश की गईं। इसके विपरीत, चुनावी खर्चों पर सीमा लगाने और आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों के नामांकन पर न्यायिक सख्ती लाने की आवश्यकता को दोनों प्रकार की सरकारों ने राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण पूर्ण समर्थन नहीं दिया।

2)     समावेशी राजनीति और प्रतिनिधित्व (Inclusive Politics and Representation)

समावेशी राजनीति का आकलन समाज के वंचित और अल्पसंख्यक समूहों के प्रतिनिधित्व और उनके लिए नीति निर्माण पर केंद्रित है।

कांग्रेसी शासन और सामाजिक न्याय:

·        आरक्षण की नींव: कांग्रेसी सरकारों ने शुरुआती वर्षों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए संवैधानिक आरक्षण की नींव रखी, जो समानता और सामाजिक न्याय के मूल्य को स्थापित करने के लिए एक आवश्यक कदम था।

·        प्रतिनिधित्व का विस्तार: महिला आरक्षण विधेयक जैसे प्रयास समय-समय पर उठाए गए, लेकिन व्यापक राजनीतिक सहमति की कमी के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका, जो समावेशी प्रतिनिधित्व के प्रति आधे-अधूरे समर्पण को दर्शाता है।

गैर-कांग्रेसी शासन और पहचान की राजनीति:

·        ओबीसी का सशक्तिकरण: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मंडल आयोग की सिफारिशों को वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली गैर-कांग्रेसी राष्ट्रीय मोर्चा सरकार द्वारा लागू किया गया Shah (2004)। यह कदम समावेशी लोकतंत्र की दिशा में एक युगांतरकारी परिवर्तन था, जिसने जाति-आधारित प्रतिनिधित्व की राजनीति को केंद्र में ला दिया और लोकतंत्र के आधार को और विस्तृत किया।

·        क्षेत्रीय विविधता और नेतृत्व: गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकारों ने क्षेत्रीय दलों को केंद्र में भागीदारी दी, जिससे संघीय स्तर पर विविध भाषाई और सांस्कृतिक पहचानों का समावेश सुनिश्चित हुआ। यह एक बहुस्तरीय प्रतिनिधित्व के मूल्य को मज़बूत करता है, जहाँ केवल राष्ट्रीय स्तर के ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय मुद्दे भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनते हैं।

निष्कर्ष: चुनावी सुधार और समावेशन

तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि:

·        चुनाव आयोग जैसे संस्थागत निकायों की कार्यात्मक स्वायत्तता में सुधार कांग्रेसी प्रभुत्व के चरण के अंत में शुरू हुआ और गैर-कांग्रेसी गठबंधनों के तहत फला-फूला, जो संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति अधिक सम्मान को दर्शाता है (शेषन युग)।

·        समावेशी राजनीति के संदर्भ में, पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए प्रतिनिधित्व का वास्तविक विस्तार मुख्य रूप से गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा शुरू किया गया। इन सरकारों ने पहचान की राजनीति को अपनाया, जिससे सामाजिक समानता के मूल्य को एक नई, विस्तृत राजनीतिक अभिव्यक्ति मिली, हालाँकि यह प्रक्रिया अक्सर सामाजिक तनाव को भी जन्म देती है।

 

7.4.      धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद (Secularism and Pluralism)

भारतीय संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और बहुलवाद (Pluralism) के मूल्य देश की सामाजिक विविधता और सह-अस्तित्व के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। इस खंड में कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा इन मूल्यों की स्थापना, क्रियान्वयन और सुरक्षा में प्रदर्शित राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैचारिक विचलन का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है।

1)     धर्मनिरपेक्षता की वैचारिक व्याख्या और क्रियान्वयन

भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी 'पृथक्करण' (Separation) मॉडल से भिन्न है, जहाँ राज्य सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान या समान दूरी बनाए रखता है।

कांग्रेसी शासन: 'समान दूरी' और 'छद्म-धर्मनिरपेक्षता'

·        स्थापना और सुरक्षा: जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, कांग्रेस ने राज्य धर्मनिरपेक्षता की मजबूत नींव रखी। 42वें संशोधन (1976) द्वारा 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया, जिससे इस मूल्य को औपचारिक मान्यता मिली।

·        आलोचना: आलोचकों का तर्क है कि कांग्रेसी धर्मनिरपेक्षता अक्सर 'छद्म-धर्मनिरपेक्षता' (Pseudo-Secularism) में बदल गई, जहाँ अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण (Appeasement) के आरोप लगे Panikkar (2017)। शाह बानो केस (1985) के बाद राजीव गांधी सरकार द्वारा लाया गया विधायी हस्तक्षेप (मुस्लिम महिला अधिनियम), वोट बैंक की राजनीति के दबाव में संवैधानिक समानता के मूल्य के उल्लंघन के रूप में देखा जाता है। यह दृष्टिकोण कानून के समक्ष समानता और एकल नागरिक संहिता जैसे सिद्धांतों को लागू करने में राजनीतिक अनिच्छा को दर्शाता है।

गैर-कांग्रेसी शासन: हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उदय

·        विचारधारात्मक बदलाव: गैर-कांग्रेसी सरकारों, विशेष रूप से वह जिनका नेतृत्व भाजपा या उसके वैचारिक सहयोगियों ने किया, ने अक्सर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' या हिंदुत्व के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया है, जो 'समान सम्मान' के सिद्धांत को चुनौती देता है Gopal (2019)

·        विशिष्ट नीतियाँ: बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992) के बाद के माहौल ने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को गंभीर रूप से चुनौती दी। हाल के वर्षों में, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) पर आधारित नीतियाँ धार्मिक पहचान को नागरिकता से जोड़ती हैं, जिसे संविधान के मूल गैर-भेदभाव के मूल्य के विपरीत माना जाता है।

2)     बहुलवाद, अल्पसंख्यक सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव

बहुलवाद का अर्थ है राज्य द्वारा विविध धार्मिक, भाषाई और जातीय समूहों के अधिकारों की सक्रिय सुरक्षा करना।

·        अल्पसंख्यक आयोगों की भूमिका: दोनों प्रकार की सरकारों ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जैसी संस्थाओं की स्थापना और उपयोग किया है। हालांकि, इन आयोगों की वास्तविक प्रभावशीलता और राज्य के हस्तक्षेप से उनकी स्वतंत्रता हमेशा बहस का विषय रही है।

·        सामाजिक तनाव और राज्य की प्रतिक्रिया:

1)     कांग्रेसी शासन: 1984 के सिख विरोधी दंगे कांग्रेसी शासन के तहत अल्पसंख्यक सुरक्षा के मूल्य के हनन का एक काला अध्याय है, जहाँ राज्य तंत्र पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करने में बुरी तरह विफल रहा Puri (2017)

2)     गैर-कांग्रेसी शासन: गुजरात दंगे (2002) जैसे सांप्रदायिक हिंसा के मामले भी गैर-कांग्रेसी शासन के तहत हुए, जिसने राज्य की निष्क्रियता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए और बहुलवादी समाज में विश्वास की कमी को बढ़ाया।

निष्कर्ष: धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद का तुलनात्मक परिदृश्य

तुलनात्मक मूल्यांकन यह स्पष्ट करता है कि धर्मनिरपेक्षता का मूल्य भारतीय राजनीति में सबसे अधिक विवादास्पद और परिवर्तनशील रहा है:

·        कांग्रेसी प्रभुत्व ने धर्मनिरपेक्षता को एक राजनीतिक सिद्धांत के रूप में स्थापित किया, लेकिन व्यवहार में यह अक्सर राजनीतिक तुष्टीकरण और सामाजिक समानता के त्याग (जैसे शाह बानो केस) की आलोचना का शिकार हुआ।

·        गैर-कांग्रेसी सरकारों ने, विशेष रूप से वैचारिक रूप से प्रेरित दलों के नेतृत्व में, धर्मनिरपेक्षता के 'भारतीय मॉडल' को चुनौती दी है और इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया है। जबकि यह एक मजबूत राष्ट्रीय पहचान पर जोर दे सकता है, यह बहुलवादी समाज के लिए समावेशी सुरक्षा के मूल्य को कमजोर कर सकता है।

संक्षेप में, दोनों मॉडलों ने तुष्टीकरण या सांप्रदायिकता के माध्यम से धर्मनिरपेक्षता के आदर्श से विचलन प्रदर्शित किया है, जिससे बहुलवादी मूल्यों की स्थापना अस्थिर और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनी हुई है।

 

8.  डेटा विश्लेषण और तुलनात्मक मूल्यांकन के लिए अतिरिक्त चार्ट

1)     समेकित तुलनात्मक मेट्रिक्स चार्ट (Consolidated Comparative Metrics Chart)

यह चार्ट प्रमुख लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति दोनों शासन मॉडलों के प्रवृत्ति (Tendency) और परिणाम (Outcome) को सारांशित करता है। यह आपके निष्कर्ष खंड के लिए एक उत्कृष्ट दृश्य आधार प्रदान करेगा।

लोकतांत्रिक मूल्य

कांग्रेसी शासन (प्रभुत्व/एकल दल)

गैर-कांग्रेसी शासन (गठबंधन/वैकल्पिक दल)

मुख्य साक्ष्य/उदाहरण

संस्थागत मज़बूती

प्रवृत्ति: केन्द्रीकरण, कार्यकारी सर्वोच्चता।

प्रवृत्ति: विकेन्द्रीकरण, संस्थागत जाँच।

साक्ष्य: 42वाँ संशोधन (कांग्रेस) बनाम 44वाँ संशोधन (जनता पार्टी)।

जवाबदेही

परिणाम: पारदर्शिता में कमी, सीमित आरटीआई।

परिणाम: पारदर्शिता में वृद्धि।

साक्ष्य: सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम का कार्यान्वयन (UPA)

संघवाद

प्रवृत्ति: एकात्मक झुकाव, केंद्र का प्रभुत्व।

प्रवृत्ति: सहकारी/सौदेबाजी संघवाद।

साक्ष्य: अनुच्छेद 356 का अत्यधिक उपयोग (कांग्रेस) बनाम जीएसटी परिषद की स्थापना (NDA)

समावेशी राजनीति

प्रवृत्ति: संवैधानिक आरक्षण (SC/ST), धीमी प्रगति।

प्रवृत्ति: OBC सशक्तिकरण और पहचान की राजनीति।

साक्ष्य: मंडल आयोग की सिफ़ारिशों का क्रियान्वयन।

धर्मनिरपेक्षता

प्रवृत्ति: तुष्टीकरण की आलोचना के साथ औपचारिक धर्मनिरपेक्षता।

प्रवृत्ति: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद/हिंदुत्व का उदय।

साक्ष्य: शाह बानो केस विधायी हस्तक्षेप बनाम CAA और बाबरी विध्वंस।

 

2)     विचलन और सुदृढीकरण का तुलनात्मक मैट्रिक्स (Matrix of Deviation and Reinforcement)

यह चार्ट यह स्पष्ट करता है कि किस शासन मॉडल ने किस लोकतांत्रिक मूल्य से विचलन किया और किसका सुदृढीकरण किया। यह आपके शोध अंतराल (Research Gap) को संबोधित करने में सहायक होगा।

लोकतांत्रिक मूल्य

कांग्रेसी शासन के तहत सुदृढ़ीकरण (Reinforcement)

कांग्रेसी शासन के तहत विचलन (Deviation)

गैर-कांग्रेसी शासन के तहत सुदृढ़ीकरण (Reinforcement)

गैर-कांग्रेसी शासन के तहत विचलन (Deviation)

संस्थागत स्वतंत्रता

संसदीय संप्रभुता की स्थापना।

न्यायपालिका पर दबाव (A.N. रे, आपातकाल)।

चुनाव आयोग की स्वायत्तता में वृद्धि (शेषन युग)।

जवाबदेही संस्थानों पर हालिया कार्यपालिका का हस्तक्षेप।

संघवाद

योजना आयोग द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण।

अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग।

राज्यों को वित्तीय स्वायत्तता (जीएसटी, वित्त आयोग)।

केंद्र-राज्य विवाद में वृद्धि (राजनीतिक ध्रुवीकरण)।

नागरिक स्वतंत्रता

मौलिक अधिकारों की संवैधानिक गारंटी।

आपातकाल के दौरान हेबियस कॉर्पस का निलंबन।

44वाँ संशोधन और RTI द्वारा अधिकारों की बहाली।

कड़े सुरक्षा कानूनों (UAPA) का बढ़ता उपयोग।

समावेशी राजनीति

SC/ST आरक्षण द्वारा प्रतिनिधित्व की शुरुआत।

महिला आरक्षण लागू करने में विफलता।

OBC/क्षेत्रीय हितों का राष्ट्रीय स्तर पर समावेशन।

जातिगत/सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में वृद्धि।

 

9.  निष्कर्ष (Conclusion)

यह शोध पत्र कांग्रेसी एवं गैर-कांग्रेसी सरकारों द्वारा भारतीय लोकतंत्र के मूल मूल्यों की स्थापना के प्रयासों का एक व्यवस्थित तुलनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। गुणात्मक और ऐतिहासिक-तुलनात्मक विश्लेषण पर आधारित यह अध्ययन इस केंद्रीय प्रश्न का उत्तर देता है कि क्या शासक दल की प्रकृति ने भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों के स्वास्थ्य और प्रक्षेपवक्र को एक निर्णायक तरीके से प्रभावित किया है।

 

9.1.      प्रमुख निष्कर्षों का सार (Summary of Key Findings)

डेटा विश्लेषण और तुलनात्मक मूल्यांकन (खंड V) के आधार पर, निम्नलिखित मुख्य निष्कर्ष निकाले गए हैं:

1)     संस्थागत मज़बूती और कार्यकारी शक्ति

·        कांग्रेसी शासन (प्रभुत्व काल): इस युग की पहचान संस्थागत केंद्रीकरण और कार्यकारी शक्ति की सर्वोच्चता की प्रवृत्ति से होती है। जहाँ कांग्रेस ने स्थिरता और राष्ट्रीय एकता के लिए संस्थानों की स्थापना की, वहीं 42वें संवैधानिक संशोधन और आपातकाल जैसी घटनाओं ने न्यायिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के मूल्यों से गंभीर विचलन प्रदर्शित किया ।

·        गैर-कांग्रेसी शासन (गठबंधन/वैकल्पिक काल): इन सरकारों ने जवाबदेही और पारदर्शिता के मूल्यों को बढ़ावा देने वाले सुधारों में अधिक तत्परता दिखाई। 44वाँ संशोधन और सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम जैसे कदम संस्थागत जाँच और संतुलन की बहाली के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

2)     संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध

·        केन्द्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण: कांग्रेसी शासन ने अनुच्छेद 356 के बार-बार उपयोग और योजना आयोग के माध्यम से वित्तीय केन्द्रीकरण को बढ़ावा दिया, जिससे संघवाद का मूल्य कमजोर हुआ।

·        सौदा-आधारित संघवाद: गैर-कांग्रेसी सरकारों ने, क्षेत्रीय दलों के दबाव के कारण, सहकारी संघवाद की ओर झुकाव प्रदर्शित किया। इस युग ने जीएसटी परिषद जैसे संघीय तंत्रों को जन्म दिया, जिससे राज्यों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक भागीदारी मिली, हालाँकि केंद्र-राज्य विवाद की आवृत्ति बढ़ी है।

3)     समावेशी राजनीति और प्रतिनिधित्व

·        आधारभूत समावेशन: कांग्रेस ने SC/ST आरक्षण की संवैधानिक नींव रखकर समानता के मूल्य को स्थापित किया।

·        प्रतिनिधित्व का विस्तार: गैर-कांग्रेसी सरकारों ने, विशेषकर मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को सशक्त बनाया। इसने प्रतिनिधित्व के मूल्य को विस्तृत किया और भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक आधार को मज़बूत किया, जिससे राजनीति अधिक समावेशी (परंतु अधिक ध्रुवीकृत) बन गई।

4)     धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद

·        धर्मनिरपेक्षता का संकट: दोनों शासन मॉडलों ने धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों से विचलन प्रदर्शित किया है। कांग्रेसी शासन पर तुष्टीकरण का आरोप लगा, जबकि गैर-कांग्रेसी सरकारों पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर धार्मिक बहुलवाद के सिद्धांत को कमजोर करने का आरोप लगा है। सांप्रदायिक हिंसा के महत्वपूर्ण मामले दोनों अवधियों में हुए हैं, जिससे अल्पसंख्यक सुरक्षा का मूल्य अस्थिर बना हुआ है।

 

9.2.      निष्कर्षों का सैद्धांतिक निहितार्थ (Theoretical Implications of Findings)

यह तुलनात्मक अध्ययन भारतीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के लिए महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकालता है:

·        पार्टी प्रकृति का प्रभाव: यह शोध स्थापित करता है कि राजनीतिक दल की प्रकृति भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों की स्थापना में एक महत्वपूर्ण स्वतंत्र चर है। एकल प्रभुत्व वाली पार्टी का झुकाव कार्यकारी मज़बूती की ओर होता है, जबकि गठबंधन की राजनीति विकेन्द्रीकरण और विधायी जवाबदेही को प्रोत्साहित करती है।

·        लोकतंत्र की द्वैत प्रकृति: भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती किसी एक राजनीतिक समूह की देन नहीं है। लोकतंत्र की संस्थाएँ (न्यायपालिका, चुनाव आयोग) अक्सर कार्यकारी ज्यादतियों (चाहे वह कांग्रेस द्वारा हो या गैर-कांग्रेसी दलों द्वारा) के विरुद्ध स्वयं को सुदृढ़ करने में सक्षम रही हैं।

·        मूल्यों का परिवर्तनशील पदानुक्रम: दोनों शासन मॉडलों ने विभिन्न लोकतांत्रिक मूल्यों को अलग-अलग प्राथमिकताएं दी हैं। जहाँ कांग्रेस ने राष्ट्रीय एकता और स्थिरता के मूल्यों को नागरिक स्वतंत्रता से ऊपर रखा, वहीं गैर-कांग्रेसी सरकारों ने सामाजिक प्रतिनिधित्व और संघीय स्वायत्तता को धर्मनिरपेक्ष समरूपता से ऊपर रखा।

 

9.3.      शोध की सीमाएं और भविष्य का दायरा (Limitations and Scope for Future Research)

इस शोध की मुख्य सीमा यह है कि यह मुख्य रूप से राष्ट्रीय-स्तर के राजनीतिक व्यवहार पर केंद्रित है और विभिन्न शासन अवधियों में राज्य-स्तरीय कार्यान्वयन में मौजूद सूक्ष्मताओं की गहराई से जाँच नहीं कर सका है।

भविष्य के शोध के लिए सुझाव:

·        मात्रात्मक सहसंबंध: विभिन्न शासन अवधियों के दौरान लोकतंत्र और प्रेस स्वतंत्रता सूचकांकों जैसे मात्रात्मक डेटा और राजनीतिक दलों के बीच एक सीधा सांख्यिकीय सहसंबंध स्थापित करना।

·        क्षेत्रीय केस स्टडी: प्रमुख राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु) में कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी क्षेत्रीय शासनों के तहत स्थानीय लोकतांत्रिक मूल्यों (पंचायतों, स्थानीय शासन) की स्थापना का तुलनात्मक अध्ययन करना।

संक्षेप में, भारतीय लोकतंत्र लचीला बना हुआ है, लेकिन इसके मूल्यों की स्थापना राजनीतिक नेतृत्व के बदलने के साथ निरंतर उतार-चढ़ाव और पुनर्संरचना का विषय रही है।

 

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