AN ANALYSIS OF ETHNIC MUSAHAR WOMEN WITHIN THE FRAMEWORK OF CULTURAL CONSTRUCTIVISM

An analysis of ethnic Musahar women within the framework of cultural constructivism

सांस्कृतिक संरचनावाद के दायरे में मुसहर जातीय महिलाओं का विश्लेषण

Sheela Yadav 1 

 

1 Assistant Professor, Department of Economics, Lalit Narayan Mithila University, Darbhanga, Bihar, India

 

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ABSTRACT

English: The living standards of Indian women depend on their social structure. Indian society is divided on the basis of caste, in which women are also assigned a hierarchical position. The division between upper and lower castes has also influenced the lifestyle of women through cultural structuralism. The lives of Musahar caste women, who are marginalized in society and included in the constitutionally recognized Scheduled Castes, are an example of intense suffering and endless struggles. The root causes of this are economic deprivation, social neglect, and a severe lack of democratic or institutional participation.  Their personal lifestyle also contributes to their tragic existence. This paper compares Musahar caste women with women from other communities, discussing their living conditions, food habits, and the specific challenges they face. Their lives are marked by the pain of displacement in their pursuit of education, health, and livelihood. A ground-level analysis of all these points has been presented in this article.

 

Hindi: भारतीय स्त्रियों का जीवन स्तर उनकी सामाजिक संरचना पर निर्भर करता है। भारतीय समाज जातिगत आधार पर विभाजित है, जिसमें महिलाओं को भी श्रेणी क्रम में स्थान निर्धारित है। उच्च व निम्न जाति  विभाजन ने सांस्कृतिक संरचनावाद के द्वारा महिलाओं के जीवन शैली को भी प्रभावित किया है। समाज में हाशिए पर पड़े तथा संवैधानिक रूप से अनुसूचित जाति  में शामिल मुसहर जाति की  महिलाओं का जीवन एक उत्कट व्यथा और अनंत संघर्षों का दृष्टांत है, जिसका मूल कारण आर्थिक विपन्नता, सामाजिक उपेक्षा और लोकतांत्रिक या संस्थागत भागीदारी का घोर अभाव आदि तो है ही, साथ ही उनका निजी जीवन शैली भी कारुणिक जीवन के लिए उत्तरदायी है। प्रस्तुत पत्र में मुसहर जातीय महिलाओं की अन्य समाज की स्त्रियों से तुलना, रहन सहन, खान पान के साथ ही उनके जीवन की विशिष्ट चुनौतियों का उल्लेख भी किया गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजी-रोटी के लिए उनका जीवन विस्थापन की पीड़ा से गुजरता जाता है। इन समस्त बिंदुओं का एक जमीनी विश्लेषण इस आलेख में किया गया है।

 

Received 30 October 2025

Accepted 02 November 2025

Published 31 December 2025

Corresponding Author

Sheela Yadav, sheelaeconomics@gmail.com  

DOI 10.29121/ShodhSamajik.v2.i2.2025.56  

Funding: This research received no specific grant from any funding agency in the public, commercial, or not-for-profit sectors.

Copyright: © 2025 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.

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Keywords: Musahar Caste, Women, Cultural Constructivism, मुसहर जाति, स्त्रियां, सांस्कृतिक संरचनावाद

 


1.  प्रस्तावना

भारतीय महिलाओं की आर्थिक स्थिति व मजबूती का पैमाना लगभग उनकी जातियों द्वारा निर्धारित होता है। वह जातियां जिसमें वे पैदा होती हैं, प्रायः विवाह से लेकर मृत्युपर्यंत वही उनकी जाति और जीवन जीने की नियति भी होती है। समाज में उच्चतर से निम्नतर का विभाजन है, जो स्पष्टतः दो रूपों में है। प्रथम समाज उन स्त्रियों का है जो घरों से बाहर नहीं निकलती हैं या यदि निकलती है तो उनकी परिवार की प्रतिष्ठा के अनुकूल कार्य होने पर ही। जैसे कोई घर के भीतर से ही यदि सरपंच चुन ली गई हो, और उसे अपने 'पुरुष संरक्षक’ के निर्देशन में शपथ ग्रहण या हस्ताक्षर करने हेतु जाना हो या कोई अन्य कार्य जो उक्त जाति विशेष में पुरुषों के नजरिए से 'सम्मानजनक' हो। यह स्त्रियां समाज के लिए 'सम्मान और आदर्श' का मानदंड होती हैं।क्योंकि विवाह के 20 वर्ष बाद तक भी उनके गांव के पुरुष उनका मुंह नहीं देखें रहते हैं। इनके द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कार्य सुशील गृहणी व आदर्श स्त्री का प्रतीक होता है। समस्त सामाजिक धार्मिक व सांस्कृतिक परंपराओं को चलायमान रखकर परिवार की विशेष इज्जत में योगदान करती हैं। पुरुषों की बातों को मानना व‌  उनके लिए जीवन का न्योछावर कर सतीत्व की परीक्षा में पास होने की चेष्टा अनवरत जारी रहती है। जिससे कि अवसर आने पर यह भी अपने पति की प्राण रक्षा यमराज तक से सावित्री की भांति कर सकें। इनका संसार बहुत सीमित सांस्कृतिक दायरे तक रहता है।गुणवत्ता की पहचान उनके सौंदर्य के प्रतिमान से की जाती है। बाल कितने लंबे है,उनका अवगुंठन कैसा है, हाथों में चूड़ियां, पैरों में पायल, अंगुली में बिछिया, कमर में कटिबंध, गले में मंगलसूत्र व हाथों में अंगूठी, मस्तक पर सिंदूर की सजी मांग, लिपस्टिक काजल आदि से लैस साड़ी का पल्लू सिर के ऊपर लगभग घूंघट की अवस्था में होना तथा वाणी का स्तर मध्यम होना व आवाज का केवल वार्तालाप तक ही मुश्किल से सुनाई देना श्रेष्ठ माना जाता है। इन स्त्रियों से इतर भी  ' एक और स्त्री है' जिसकी अलग दुनिया है। प्रथम प्रकार की स्त्रियों की दृष्टि में यह नान्ह जातीय स्त्रियां मूर्ख व गंवार और कभी-कभी बेचारी या दया की पात्र होती हैं। प्रायः ये नान्ह  स्त्रियां सामाजिक रुप से निचले जातीय समूह की होती हैं। जिनको भारतीय समाज ने आजादी के बाद से अन्य पिछड़ा अनुसूचित की श्रेणी में वर्गीकृत कर दिया है।  स्त्रियों के इस वर्गीकरण में जातियों का स्तरीकरण दमदार भूमिका निभाता है। स्त्री यदि ऐसी जाति की है जो निम्न जाति होने के साथ-साथ अछूत की श्रेणी में भी आती है। यदि उनका अपना किसी भी प्रकार का परंपरागत स्थाई व्यवसाय नहीं है और वे जीवन यापन के लिए अन्य पर निर्भर हैं तो उन्हें मनुष्य होना तो दूर की बात स्त्री होने का भी आजीवन अनुभव नहीं हो पाता है।

द्वितीय प्रकार की महिलाएं जीवन को पशुवत या उससे भी बुरी दशा में जीने के लिए अभिशप्त है। यह महिलाएं प्रथम प्रकार की महिलाओं से भिन्न जीवन व्यतीत करती हैं।  इनकी  प्रमुख आवश्यकता में भोजन और अंतिम आवश्यकता भी भोजन ही होता है। यह उनके परिवार का भी लक्ष्य होता है, किंतु यहां पुरुष लाभ की स्थिति में आ जाता है क्योंकि वह पुरुष है और आय पर प्रथम हक उसी का होता है। प्रायः इन स्त्रियों का जीवन प्रथम प्रकार के महिलाओं के विलासिता पूर्ण जीवन के करीब पहुंच जाने का होता है, जो संभवतः कभी पूरा नहीं होता है। त्योहार संस्कृति संरक्षण उल्लास के मायने घर में भरपूर भोजन व पुरुष के लिए देसी शराब का होना है। इनका विश्लेषणात्मक अध्ययन पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जातीय समूह मूसहर को केंद्रित करके किया गया है जिससे सामाजिक व आर्थिक अवस्थाओं का एक स्वरूप अंकन का प्रयास संभाव्य दिखता है।

 

2.  मुसहर जाति की उत्पत्ति 

पौराणिक कथाओं में मुसहर जाति की उत्पत्ति ब्रह्मा के अभिशाप के कारण मानी गई है, जिसमें उन्होंने एक घोड़े की रचना की और मनुष्य को उस पर सवारी करने के लिए दिया परंतु मुसहर ने उसके नाभि में छेद कर दिया और उसमें अपना पैर जमाने का प्रयास किया। जिससे ब्रह्मा ने  नाखुश होकर चूहाखोर का श्राप दे दिया। परिणाम स्वरूप मुसहर आज भी चूहा ही खाते हैं भारत में सर्वप्रथम मुसहर पर सर्वे 'हरबर्ट होप रिजले'   ने 1881 में किया तथा बताया कि यह आखेटक समूह के लोग छोटा नागपुर का पठार के क्षेत्र में रहते थे तथा भुइया जनजाति से इनका करीबी संबंध था। यह संभवत गंगा के मैदान से 17 वीं शताब्दी के प्रारंभ में वहां गए थे। कुछ आधुनिक अध्ययन इनको ‘मुंडा’ या ‘हो’ जनजाति का बताते हैं क्योंकि यह उनकी परंपराओं का भी पालन करते हैं। वर्तमान में मुसहर मुख्य रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार के कुछ जिलों में पाए जाते हैं। इनको सामाजिक रुप से हिंदू धर्म में माना जाता है इनका अपना कुछ विशेष देवता व पूजा पद्धतियां भी होती हैं प्रायः भूमिहीन कृषक मजदूर के रुप में जीवन व्यतीत  कर रहे,  इस जातीय समूह की स्थिति अनुसूचित जाति मे शामिल  अन्य जातियों  से  भी खराब है।

 

 

 

 

3.  वर्तमान दौर मे मुसहर जातिय नारियां

वर्तमान में चल रहे अनेक नारीवादी आंदोलनों, वैश्वीकरण, डिजिटलाइजेशन, विकास व लोकतांत्रिक मजबूती के नारों में ऐसे कई और भी जातीय समूह हैं जिनको विकास के दायरे में लाने का अभी जनता जनार्दन की चुनी सरकार द्वारा उचित समय नहीं आया है। मुसहर जाति की महिलाओं का जीवन कष्ट का पर्याय होता है। प्रायः उनके रजस्वला होने से पहले ही 10 - 12 वर्ष की उम्र में इनका विवाह,  योग्य वर के साथ कर दिया जाता है। जिसकी उम्र करीब 15 -16 वर्ष की होती है। इन जातीय समूह की एक विशेषता और भी होती है की यह क्लस्टर में बसते रहे हैं। तथा इनका छिटपुट बिखराव ज्यादा रहता है। कुछ वर्षों पूर्व तक जब चकबंदी नहीं हुई थी तब तक लगभग 1990 तक प्रायः यह अपने कुनबे सहित विस्थापित हो जाते थे या प्रवासन कर अन्यत्र बस जाते थे। ऐसे में सूचना क्रांति के पूर्व व अशिक्षा के कारण से अपने रिश्तेदारों से भी संबंध नहीं रख पाते थे। चुंकि ' ग्राम समाज' या परती भूमि जिसका बंदोबस्त नहीं हुआ था वहां ये लोग अपना डेरा लगाकर बस जाते थे। जो प्रायः गांव का डांगर मरे हुए पशुओं को  फेंकने का स्थान या वीरान जैसी जगह होती थी। इस विस्थापन का दुष्परिणाम विवाहित स्त्रियों को झेलना पड़ता था जो अपने जोड़ें या पति से यदि विवाह के समय ही विदाई नहीं होती थी तो सदा के लिए बिछड़ जाती थी। जौनपुर जनपद के एक परिवार ने साक्षात्कार में बताया की उनकी शादी लगभग 50 वर्ष पूर्व अयोध्या के पास कही हुई थी। परंतु जब वह अपनी पत्नी को विदा कराने गए तो पता चला कि वहां से उनकी पत्नी व परिवार विस्थापित होकर अन्यत्र चला गया था।  दूसरे परिवार के सदस्य भी ऐसी स्थिति का सामना किए, जब विवाह हेतु कुशीनगर से आए एक परिवार ने बारात सहित आने का दिन नियत किया था। किंतु जब वर पक्ष विवाह हेतु पहुंचा तो वहां से लोग विस्थापित होकर अन्यत्र चले गए थे। इन सामान्य घटनाओं का दुष्परिणाम यह होने लगा की जहां पहले बाल्यावस्था में कन्या का विवाह हो जाता था परंतु परिपक्व होने पर  गौना (विदाई ) होती थी। अब विवाह के साथ ही जो प्रायःबाल विवाह ही होता है, कन्या को पति के घर भेजा जाने लगा। यद्यपि की अब इनका जीवन पहले 50 सालों की तुलना में अधिक स्थाई हो गया है परंतु बाल विवाह अभी भी जारी है। मुसहर जातीय स्त्रियां अपने जीवन में बड़ा हिस्सा प्रजनन में लगाती हैं प्रायः 14 से 15 वर्ष की उम्र से इनकी संतानोंपत्ति का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है।जो लगभग 35- 40 वर्षों की उम्र तक चलता रहता है। इस दौरान कम से कम 5 से 6 बच्चे पैदा होते जाते हैं।यही समय इनकी जीवन का सबसे कठिन संघर्ष का दौर भी होता है।प्रायः इनकी जीविका का साधन अब कृषि मजदूर या ईट उद्योगों के मजदूर के रुप में ही होता है।

 

4.  आर्थिक विपन्नता

मुसहर महिलाएं घर पर जो प्रायः कच्ची दीवार पर रखी एक झोपड़ी होती है , सभी कार्य जिसमें भोजन बनाना,  बच्चों का परवरिश करना , व पति की सेवा करती हैं।  महिलाएं घर के काम के उपरांत कृषि मजदूर के रुप में आसपास के खेतों में काम करने जाती हैं जहां उन्हें ₹50 तक की मजदूरी मिल जाती है या कभी कुछ आटा चावल या खाद्य पदार्थ।  कई बार इनको अच्छी मजदूरी  भी मिल जाती है। जब ये कृषि कार्य करती हैं, तो इनके लिए निर्धारित कार्य की मजदूरी से परिवार में कुछ सहयोगात्मक आय हो जाती हैं। यह इनकी खुशी का घोतक होता है। बातचीत से यह बात स्पष्ट हुई कि 'शिक्षा और तर्क तथा सांस्कृतिक परंपराओं ' को  मानने के मामले में यह द्वितीय प्रकार की स्त्रियां प्रथम स्त्रियों के मानकों जैसी ही बातों का अनुगमन करती हैं।  मुसहर पुरुष भी प्रायःखेतिहर मजदूर  भट्टे पर मजदूरी या रिक्शा  चलाकर कुछ कमाई कर लेते हैं, परंतु ज्यादातर आय  शराब या नशे पर खर्च कर देते हैं ।जिस दिन इन मजदूरों को पर्याप्त मजदूरी नहीं मिलती या काम पर नहीं जाते हैं उस दिन के नशे के पैसे के लिए अपनी पत्नियों पर आश्रित होते हैं।यदि कुछ स्त्रियां पैसे देने से मना कर देती हैं, तो पुरुष इनको पीटते हैं।कुशीनगर जनपद के एक गांव देहरी पट्टी की रिपोर्ट 4 मई 2013 को डेक्कन हेराल्ड इंग्लिश न्यूज़ पेपर में छपी, जिसमें यह उल्लेख है कि इन स्त्रियों को सामुदायिक संघर्ष के अलावा पति के अत्याचार का सामना भी करना पड़ता है।गाजीपुर जिले का अध्ययन के दौरान साक्षात्कार में यह भी प्रकाश में आया की कुछ स्त्रियां अपने पतियों को सफलता पूर्वक पीटने में आगे रहीं, तथा कभी-कभी वे भी देसी शराब की घूंट पी लेती हैं।वहीं कुछ स्त्रियां अपने पतियों के द्वारा पीटे जाने को ज्यादा बुरा इसलिए नहीं मानती हैं क्योंकि वह पूरा दिन काम करके थक जाता है तथा शराब पीकर जब वह आराम पाता है तो हल्के रूप में मारपीट देता है जो कि ज्यादा बुरा नहीं है। क्योंकि पति का आरोप होता है कि उसने खाना बेकार बनाया है।‌ और अगली सुबह वह फिर अपनी औरत को प्यार करता है। बिल्कुल सब कुछ भूल कर एक नई शुरुआत के साथ,  इस प्रकार नशे में पति द्वारा पीटा जाना मुसहर महिलाओं के लिए अत्याचार नहीं बल्कि जीवन में प्रायः होने वाले सामान्य घटना है।

 

5.  जीवन शैली

ये स्त्रियां गरीबी के दुष्चक्र से शायद ही कभी आजाद हो पाती हैं। जीवन में आर्थिक मजबूती से तात्पर्य केवल मजदूरी हेतु काम मिलना और उसके बदले में पारिश्रमिक की प्राप्ति का हो जाना ही होता है। सरकारी योजनाओं व सरकार से बहुत दूर यह मजदूर नारियां अपने जीवन में बहुत खुश होती हैं।  जब इनको प्रथम स्त्रियों की पुरानी साड़ियां पहनने को मिल जाए उनका सांस्कृतिक सम्मोहन सदैव इनको भी प्रेरित करता है। बाजार में बिकने वाले सस्ते आभूषण जो प्रायः रोल्ड  गोल्ड व जस्ता के होते हैं इनका श्रृंगार बढ़ाते हैं, क्योंकि स्त्री होना है तो यह आवश्यक उत्पाद हैं, अन्यथा उच्च जातियों की दृष्टि में इनका स्तर और भी गिर जाएगा।

संस्कृतिकरण के संदर्भ में बातचीत के दौरान प्रकाश में आया की मूसहर स्त्रियां सपाट और सीधी हैं। वह केवल सांस्कृतिक परंपराओं का पालन इसलिए करती हैं  कि जिन अमीर कृषकों के घर में यह मजदूरी करने जाते हैं, या उनके समारोहों में परिचारिका बनकर भूमिका निभाती हैं,  ऐसा करते हुए देखे हैं। करवा चौथ का व्रत ये स्त्रियां नहीं रखती हैं, कुछ तीज का व्रत करती हैं। तथा यह नहीं बता पाती  हैं कि यह व्रत क्यों कर रही हैं। प्रायः गीत भी गाती हैं जो प्रथम स्त्रियों से बिल्कुल भिन्न होता है। इनके गीत प्रायः प्रकृति के करीब या रसिया होते हैं। ये महिलाएं अपने पति का गुणगान करती हैं। किंतु उसे देवता के रूप में नहीं आंकती हैं।

सरोजवा (सरोज)गुनगुनाती है "मोर पिया मोर पिया नगीनवां रे आय गयल गरमी क दिनवां रे" मेरा पति नगीना जैसा है और ऊपर से अब गर्मी का दिन भी आ गया है।  गर्मी का मौसम भयानक ठंड और बरसात की तुलना में इनके लिए आरामदायक होता है।  क्योंकि घर व कपड़े का अभाव रहता है। वही दुलरी अपने पुत्र व पति का मजाक उड़ाती है क्योंकि वह आज पहली बार क्लीन शेव दाढ़ी मूंछ के बाल साफ करवा कर घर आया है और गाती है,  " मोर पिया मोरे बेटा बंका जवान, गदहा पर बैठा दा , लगा द निशान" और जोर से ठहाके मारकर हंसती है बिल्कुल अपने प्राकृतिक अंदाज में इसको हंसने गाने या चिल्लाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।इस प्रकार यह स्त्रियां गरीबी और सामाजिक तथा सांस्कृतिक उपेक्षा में जितनी अकड़ी व जकड़ी हुई हैं। तुलनात्मक दृष्टि से स्वतंत्रता का ज्यादा उपभोग कर रही है।

 सांस्कृतिक प्रतीकों की अवधारणा से पूर्णतः ये विमुक्त तो नहीं है, परंतु इनका जीवन व विचारधारा उन परंपरागत 'नैतिक मूल्यों' जो जीवन के लिए सर्वोच्च आवश्यकता रूपी आदर्श है,से अलग है। जो इनको संरचनावाद की पीड़ा से मुक्त करने में आंशिक सफलता देता है। साथ ही आर्थिक अवस्था से यह भी निर्धारित होता है कि जीवन में उत्तरजीविता (सर्वाइवल) से बड़ा दायित्व कुछ नहीं है। जिसे निभाने का प्रयास यह स्त्रियां करती हैं। इन नारियों का मुख्य पशुधन सूअर बकरियां या मुर्गे होते हैं।जिनका प्रायः बलि के बाद उपभोग दावत के रूप में किया जाता है जिसमें मुख्य रसोईया स्त्री होती है। पुरुष शराब पीकर नाचते हैं स्त्रियां भी बाद में गाजा या कच्ची शराब पी लेती हैं। इस प्रकार धन उपार्जन कर स्थाई व निश्चित तथा विकासशील शिक्षित और सम्मानजनक जीवन का कभी भी स्वप्न नहीं देखने वाली यह स्त्रियां दिन में बड़े लोगों के घरों में देखकर पाई संस्कृति की शिक्षा को स्वाहा कर सहज जीवन का कुछ पल उस रात के अंधेरे में जी लेती हैं‌, जहां इनको अपने अधिकांशतः सांवली त्वचा या काली त्वचा को ना तो गोरा बनाने का ना ही सजने संवरने  व संस्कृति व सम्मान को बचाकर नारी होने का प्रमाण हो सिद्ध करना पड़ता है।

 

6.  अल्प शिक्षा और संसाधन हीनता 

प्रायः महिलाएं शिक्षा प्राप्ति के विषय में नहीं सोचती थी। इनकी संतान भी अब केवल सरकार के प्राथमिक विद्यालयों में नामांकित हैं जहां पर इनको मध्यान भोजन योजना के तहत कुछ खाने को मिल जाता है।कुछ बालिकाएं जो प्राथमिक कक्षाओं में नामांकित है विद्यालय में केवल भोजन के वक्त जाती हैं। जिसके पश्चात वह घरेलूया मजदूरी के कार्यों में अपनी मां का सहयोग करती हैं विद्यालय से मिलने वाला वस्त्रऔर कुछ छात्रवृत्ति या इनके लिए कुछ सरकारी सहायता की भांति होता है।जो जीवन में सहयोगी होता है सरकार की योजनाओं का उद्देश्य इनकी लिए बस इतना ही है।पां चवी आठवीं की कक्षा तक नामांकन तो रहता है इन बालिकाओं का , परंतु शिक्षा ग्रहण करने हेतु शायद किसी भी दिन नहीं जाने से शैक्षणिक सशक्तिकरण के माध्यम लैंगिक उत्थान व सामाजिक समावेशन के सरकारी प्रयासों को धक्का लगता है। आनियोजित व तर्क विहीन तरीके से लागू सरकारी अनेक योजनाएं इन बालिका मजदूरों की दक्षता को कुशलता में परिवर्तित करने में असफल रहता है। तथा उन्हें भी उनकी माताओं की तरह की जिंदगी जीने की ओर मोड़ देता है। इनकी माताएं भी इस तथ्य से अवगत नहीं होती हैं की शिक्षा का जीवन में क्या भूमिका है। फलत: विद्यालय जाने को समय की बर्बादी मानती हैं तथा अपनी पुत्रियों को अपने साथ रख कर या काम पर ले जाकर जीवन जीने के लिए निपुण स्वयं जैसी मेहनती औरत बनाने का प्रयास करती हैं। प्राय: बालिकाओं के माता- पिता का यह भी मानना होता है की पढ़ाई लिखाई लड़कों के लिए कुछ हद तक तो ठीक है परंतु लड़कियों के लिए आवश्यक नहीं। पढ़ाई लिखाई बड़ा ‘मनई लोग’  बड़े आदमियों के लिए होता है। गाजीपुर जिले के एक गांव कुंवरपुर जहां करीब 4 -5 मुसहर परिवार रहते हैं। मुश्किल से कुछ पुरुष अपना नाम लिख पाते हैं जबकि स्त्रियां तो बिल्कुल ही निरक्षर है। इनका शैक्षणिक प्रतिशत संभवत 100 में से एक दो से अधिक नहीं है। सुधा वर्गीज जो बिहार में मुसहर जाति के उत्थान के लिए पिछले 30 वर्षों से लगी हुई है,वे इनकी वर्तमान स्थिति में अशिक्षा को ही प्रमुख कारण मानते हैं। तथा अनेक मुसहर बालिकाओं को अपने एनजीओ के माध्यम से शारीरिक कार्यों में दक्ष खेलो में भागीदारी को प्रोत्साहित कर रही हैं,  जैसे तीरंदाजी, हांकी, कबड्डी खो-खो आदि खेल इनको एक नई दुनिया से परिचित अवश्य करवा रहे हैं। परंतु उत्तर प्रदेश की मुसहर महिलाओं को अपनी सुधा वर्गीज की आज भी प्रतीक्षा है।

 

7.  उत्पीड़न

पूरे मुसहर समाज में शिक्षा का परिणाम यह है कि छोटी-छोटी सरकारी योजना व कार्यक्रमों का लाभ लेने हेतु भी यह दूसरों पर आश्रित हैं।अधिकांश योजनाओं के विषय में इनका ज्ञान लगभग न के ही बराबर है। जौनपुर जिले की महिलाओं में से इक्का- दुक्का ही थींजिनको प्रसव के बाद जननी सुरक्षा योजना का लाभ मिला। क्योंकि इनके पास जरूरी कागजात में केवल आधार कार्ड ही था। सरकारी अमले की पहुंच कभी-कभी इनके गांव में तब होती है जब सरकारी अफसरों को अपनी कुर्सी पर खतरा नजर आता है। उस दिन जलसे जैसा माहौल मुसहर बस्ती में रहता है। पुनः अगले दिन से वही स्थिति स्थापित हो जाती है। अनेकों बार सरकारी मुलाजिम इनका प्रयोग अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मोहरों के रूप में भी करते हैं। कई बार इनकी स्त्रियों का शारीरिक शोषण भी किया जाता है, जो सरकार की नजरियों में  मामूली घटना होती है। ऐसी अवस्था से गुजरती औरत को देख कर भी स्वाभिमानी मुसहर जाति का पुरुष बेचारागी में रह जाता है। कुशीनगर जिले में किए गए एक अध्ययन के अनुसार थानों पर इनकी शिकायतों  कभी कोई तरजीह नहीं दी जाती क्योंकि यह महिलाएं मुसहर की औरत है।

अन्य आर्थिक सशक्तिकरण की योजनाओं में सरकारी प्रयासों के बावजूद भी हिस्सेदारी नहीं मिल पाती है। चकबंदी के उपरांत से इनकी स्थाई बस्ती का निर्धारण तो कर दिया गया है, परंतु वह सरकारी जमीन जो  भूमिहीनों को वितरण करने हेतु निर्धारित की गई है, आज भी मालिक लोगों के कब्जे में हैं। यदि कोई वास्तविक जनसेवक प्रयास करके चिन्हित भूमि पर मुसहरों को कब्जा दिला भी देता है तो मुसहर परिवार इस पर कृषि नहीं कर पाता क्योंकि जैसे ही अधिकारी या प्रतिनिधि उस स्थान से अन्यत्र गया, बाहुबली मालिक उन्हें वहां से खदेड़ कर पुनः उनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। यह स्थिति 2013 तक लगभग कुशीनगर जौनपुर गाजीपुर फैजाबाद व बलिया सभी जिलों में थी जहां मुसहर जाति का विस्तार है। लोकसभा टीवी द्वारा चलाई गई एक रिपोर्ट भी इसकी पुष्टि करती है।

 

8.  निष्कर्ष

संपूर्ण मुसहर जाति जहां एक भूमिहीन कृषि मजदूर का जीवन यापन करने को विवश है वहीं इनकी स्त्रियां दोहरा शोषण झेलती हैं। गांव के उच्च वर्गीय या मालिकारो के शारीरिक शोषण के अतिरिक्त इनको कार्यस्थल पर भी शोषण का सामना करना पड़ता है। जौनपुर जनपद में एक भोजपुरी फिल्म की शूटिंग के दौरान अनेक मुसहर लड़कियों को सहायक नर्तकी के लिए बुलाया गया जहां उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से ₹500 और अच्छा खाना प्राप्त हुआ। लगभग 10- 12 वर्षीय बालिकाएं जब अपने घरों को लौटीं तो उच्च जाति या अन्य जातीय पुरुष इनसे बहुत अधिक छेड़छाड़ किए तथा कामुकता हेतु उपयुक्त साधन बताएं, क्योंकि इन लोगों ने फिल्मों में काम किया था। इस प्रकार केवल मुसहर जाति स्त्री होना तब तक ही वैधता प्राप्त है जब तक की सकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण से सम्मान देने की बात हो अन्यथा उपभोगवादी पुरुषवादी तथा जातिगत वर्चस्व के ढांचे में यदि देखा जाए तो यह स्त्रियां भी केवल वस्तुएं हैं। बिल्कुल भी अछूत नहीं और ना ही मुसहर केवल विलास की वस्तु स्त्री जो ना तो फूहड़ है, ना ही निम्न जातीय।

इस प्रकार की मुसहर जातीय महिलाएं उच्च सामाजिक मर्यादा वाली सम्मानित महिलाओं की दृष्टि में दुष्ट और दुष्ट चरित तथा कुलक्षिणी है, जो इनके घर के भोले पुरुषों को आर्थिक लाभ उठाने के लिए फंसा लेती है।यह सामाजिक विवशता का जीवन मूसहर स्त्री के लिए आर्थिक पंगुपन व अनंत गरीबी का परिणाम है। अन्यथा तार्किक दृष्टि से देखा जाए तो सांस्कृतिक संरचनावाद के साए से अमूमन बाहर मनुष्य होने की स्वतंत्रता का लाभ उठाने वाली यह स्त्री पूर्णतः उन महिलाओं से अधिक अधिकारों का उपभोग निजी जीवन में करती हैं ।जहां शिक्षा गरीबी व पिछड़ापन तथा असभ्य व अशिष्ट होना केवल इनके आर्थिक दुर्दशा के कारण मात्र है ना कि इनकी जीवन जीने के निर्धारक। अधिक बुजुर्ग और वृद्ध महिलाएं इस बात को साफ कहती हैं कि साहब टीवी आने से पहले हम सुखी थे वृक्षों से हमें लगभग सब जरूरतें पूरी हो जाती थी। यह महिलाएं बड़े गर्व से बताती हैं कि इनके बनाए हुए वृक्षों की कलाकारी दोना पत्तल झोले आदि बड़े साहब लोग इज्जत के साथ मंगवाते थे तथा उचित पारितोषिक के साथ हमें विदा भी करते थे। कोई भी अपमानित या प्रताड़ित करने के आजकल के तरीके नहीं अपनाता था, और ना ही बहुत हेय दृष्टि से देखता था। हां यह सही है कि हमारा पूरा जीवन उनकी सामाजिक व्यवस्था से अलग था। यह इस बात को स्पष्ट करता है कि खेतिहर मजदूर के अपने वर्तमान आर्थिक व्यवसाय से इनका जीवन दुष्कर हो गया , जो कि नए बाजारवादी व्यवस्था वाले नए आर्थिक समाज से तालमेल बैठाने के और असहज या लगभग असमर्थ हो रहे हैं। क्योंकि यह सब मल्लिक लोगों की तरह चालाक नहीं हैं। मुसहर जातीय महिलाओं का जीवन जितना सामाजिक व सांस्कृतिक उपेक्षा से ग्रसित नहीं हुआ, उससे ज्यादा आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु नवीन प्रयासों वसंघर्षों से प्रभावित हुआ। पुरुषवादी वर्चस्व का घरेलू तांडव जितना नहीं रहा उतना बाह्य शोषण रहा। रंग ,जाति,  धर्म की बेड़ी से लगभग  मानसिक रूप से युक्त यह स्त्री नवीन स्त्रियों के सम्मानपूर्ण जीवन से व्यक्तिगत रूप में व अपने व्यक्तित्व में अधिक 'सम्मानित' ' मजबूत' 'स्वाभिमानी'  है जो जीवन जीने के लिए आर्थिक मोर्चों पर संघर्ष करते हुए अपने निजी जीवन पद्धतियों को धीरे धीरे महिलाकरण करते हुए परित्याग करती जा रही हैं। जो उनके स्त्री जीवन का सबसे महंगा मोल होगा।

 

संदर्भ सूची

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