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A CRITICAL ANALYSIS OF THE MOUNTBATTEN PLAN AND ITS IMMEDIATE CONSEQUENCES ON THE INDIAN SUBCONTINENT
माउंटबेटन योजना का आलोचनात्मक विश्लेषण और भारतीय उपमहाद्वीप पर इसके तात्कालिक परिणाम
Dr. Sandeep Kumar 1 ![]()
1 Department of
History, Jay Prakash University Chapra, Bihar, India
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ABSTRACT |
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English: This
research paper provides an in-depth analysis of the plan presented by Lord
Mountbatten on June 3, 1947, which permanently altered the political destiny
of the Indian subcontinent. The primary objective of this research is to
explore the circumstances under which the British government advanced the
predetermined deadline of June 1948 to August 1947. The paper critically
evaluates whether this "undue haste" in the transfer of power was
responsible for the unprecedented violence and human tragedy that unfolded
during the partition of India. The research highlights the administrative and strategic failures that led to one of the largest displacements in history and widespread communal riots. Furthermore, the paper analyzes the provisions of the plan that left the future of the princely states in limbo, giving rise to long-standing disputes such as the Kashmir conflict. Ultimately, this research concludes that while the Mountbatten Plan succeeded in breaking the political deadlock, it inflicted wounds on the subcontinent whose consequences are still being felt by both nations today. Hindi: यह शोध पत्र
लॉर्ड माउंटबेटन
द्वारा 3 जून, 1947 को
प्रस्तुत की गई
उस योजना का गहन
विश्लेषण करता
है, जिसने भारतीय
उपमहाद्वीप के
राजनीतिक भाग्य
को स्थायी रूप
से बदल दिया। इस
शोध का मुख्य उद्देश्य
उन परिस्थितियों
की पड़ताल करना
है जिनके तहत ब्रिटिश
सरकार ने जून 1948
की पूर्व निर्धारित
समय सीमा को घटाकर
अगस्त 1947 कर दिया।
पत्र में इस बात
का आलोचनात्मक
मूल्यांकन किया
गया है कि क्या
सत्ता हस्तांतरण
में दिखाई गई यह
'अत्यधिक जल्दबाजी'
भारत के विभाजन
के दौरान हुई अभूतपूर्व
हिंसा और मानवीय
त्रासदी के लिए
जिम्मेदार थी। शोध के अंतर्गत
उन प्रशासनिक
और रणनीतिक विफलताओं
को रेखांकित किया
गया है, जिसके कारण
इतिहास का सबसे
बड़ा विस्थापन
और सांप्रदायिक
दंगे हुए। इसके
अतिरिक्त, यह पत्र
योजना के उन प्रावधानों
का भी विश्लेषण
करता है जिन्होंने
देसी रियासतों
के भविष्य को अधर
में छोड़ दिया,
जिससे कश्मीर
जैसे दीर्घकालिक
विवाद उत्पन्न
हुए। अंततः, यह
शोध यह निष्कर्ष
निकालता है कि
माउंटबेटन योजना
जहाँ एक ओर राजनीतिक
गतिरोध को तोड़ने
में सफल रही, वहीं
दूसरी ओर इसने
उपमहाद्वीप को
ऐसे घाव दिए जिनकी
कीमत आज भी दोनों
राष्ट्र चुका
रहे हैं। |
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Received 30 October 2025 Accepted 01 November 2025 Published 30 December 2025 Corresponding Author Dr.
Sandeep Kumar, 88sk22@gmail.com DOI 10.29121/ShodhSamajik.v2.i2.2025.59 Funding: This research
received no specific grant from any funding agency in the public, commercial,
or not-for-profit sectors. Copyright: © 2025 The
Author(s). This work is licensed under a Creative Commons
Attribution 4.0 International License. With the
license CC-BY, authors retain the copyright, allowing anyone to download,
reuse, re-print, modify, distribute, and/or copy their contribution. The work
must be properly attributed to its author.
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Keywords: Mountbatten Plan, Partition, Transfer of Power, Radcliffe Line, Communal Violence, Displacement, Dominion
Status, माउंटबेटन
योजना, विभाजन,
सत्ता हस्तांतरण,
रेडक्लिफ रेखा,
सांप्रदायिक
हिंसा, विस्थापन,
डोमिनियन स्टेटस |
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भारतीय स्वतंत्रता
संग्राम के इतिहास
में वर्ष 1947 एक दोहरी
नियति का वर्ष
था एक ओर जहाँ यह
दो शताब्दियों
के दमनकारी औपनिवेशिक
शासन के अंत का
प्रतीक था, वहीं
दूसरी ओर यह एक
रक्तरंजित विभाजन
की त्रासदी का
गवाह भी बना। इस
पूरी प्रक्रिया
के केंद्र में
'माउंटबेटन योजना'
(जिसे 3 जून योजना
भी कहा जाता है)
थी, जिसने न केवल
सत्ता के हस्तांतरण
का मार्ग प्रशस्त
किया, बल्कि उपमहाद्वीप
के भूगोल और भविष्य
को भी सदा के लिए
खंडित कर दिया।
ऐतिहासिक संदर्भ
और गतिरोध 1946 के कैबिनेट
मिशन की विफलता
के बाद, भारत में
राजनीतिक शून्यता
और सांप्रदायिक
विद्वेष की स्थिति
उत्पन्न हो गई
थी। मुस्लिम लीग
द्वारा 'प्रत्यक्ष
कार्यवाही दिवस'
(Direct Action Day) के आह्वान
ने देश को गृहयुद्ध
की कगार पर धकेल
दिया था। इग्नू
(EHI-01) के विश्लेषण
के अनुसार, ब्रिटिश
सरकार यह समझ चुकी
थी कि अब भारत पर
शासन करना न तो
आर्थिक रूप से
व्यवहार्य है और
न ही रणनीतिक रूप
से संभव Indira
Gandhi National Open University (2005)। इसी
पृष्ठभूमि में,
ब्रिटिश प्रधानमंत्री
क्लीमेंट एटली
ने 20 फरवरी, 1947 को घोषणा
की कि अंग्रेज
जून 1948 तक भारत छोड़
देंगे और लॉर्ड
वेवेल के स्थान
पर लॉर्ड माउंटबेटन
को अंतिम वायसराय
नियुक्त किया गया।
माउंटबेटन
का आगमन और वैचारिक
परिवर्तन लॉर्ड
माउंटबेटन जब मार्च
1947 में भारत आए, तो
उन्हें स्पष्ट
निर्देश थे कि
वे भारत की एकता
को बनाए रखने का
प्रयास करें, लेकिन
यदि आवश्यक हो
तो विभाजन के विकल्पों
पर भी विचार करें।
प्रसिद्ध इतिहासकार
विपिन चंद्र के
अनुसार, माउंटबेटन
ने जल्द ही यह महसूस
कर लिया कि कांग्रेस
और लीग के बीच की
खाई इतनी चौड़ी
हो चुकी थी कि उसे
पाटना असंभव था
Chandra
(2009)। यहाँ
यह रेखांकित करना
महत्वपूर्ण है
कि एनसीईआरटी
(कक्षा 12, भारतीय
इतिहास के कुछ
विषय-3) यह स्पष्ट
करती है कि जिन्ना
की 'द्वि-राष्ट्र
सिद्धांत' (Two-Nation
Theory) की हठधर्मिता
और पंजाब व बंगाल
में भड़की हिंसा
ने माउंटबेटन को
योजना में आमूल-चूल
परिवर्तन करने
पर विवश किया National
Council of Educational Research and Training (2021)।
योजना की आकस्मिकता
और जल्दबाजी प्रस्तावना
का एक महत्वपूर्ण
पहलू सत्ता हस्तांतरण
की तिथि को जून
1948 से घटाकर अगस्त
1947 करना है। सुमित
सरकार अपनी कृति
'मॉडर्न इंडिया'
में तर्क देते
हैं कि यह 'जल्दबाजी'
ब्रिटिश साम्राज्य
की अपनी जिम्मेदारी
से भागने की एक
सोची-समझी रणनीति
थी, ताकि वे आगामी
गृहयुद्ध के कलंक
से बच सकें Sarkar
(1983)। माउंटबेटन
ने प्रशासनिक जटिलताओं
और सीमाओं के सीमांकन
की संवेदनशीलता
को नजरअंदाज करते
हुए केवल 72 दिनों
के भीतर विभाजन
की प्रक्रिया को
पूरा करने का निर्णय
लिया।
शोध का उद्देश्य
और महत्ता यह शोध
पत्र इस प्रश्न
का परीक्षण करता
है कि क्या माउंटबेटन
योजना वास्तव में
भारतीय नेताओं
के बीच एक "अनिवार्य
समझौता" थी या यह
ब्रिटिश कूटनीति
की एक "अंतिम विफलता"
थी? आयशा जलाल जैसे
विद्वान इसे एक
ऐसी प्रक्रिया
मानते हैं जहाँ
'केंद्र' की रक्षा
के लिए 'प्रांतों'
की बलि दी गई Jalal
(1985)। इस
प्रस्तावना के
माध्यम से हम उस
जटिल ताने-बाने
को समझने का प्रयास
करेंगे जिसने न
केवल दो राष्ट्रों
को जन्म दिया, बल्कि
एक ऐसी मानवीय
त्रासदी को भी
जन्म दिया जिसकी
मिसाल आधुनिक इतिहास
में विरल है।
1947 का त्वरित
घटनाक्रम:

व्याख्या: (Timeline Analysis)
यह टाइमलाइन
चार्ट फरवरी 1947 से
जून 1947 के बीच की उन
महत्वपूर्ण कड़ियों
को दर्शाता है
जिन्होंने भारत
के विभाजन की गति
को अप्रत्याशित
रूप से तेज कर दिया:
1)
फरवरी 1947 (एटली
की घोषणा): ब्रिटिश
प्रधानमंत्री
क्लीमेंट एटली
ने घोषणा की कि
अंग्रेज जून 1948 तक
भारत को सत्ता
सौंप देंगे। यह
इस शोध पत्र का
मुख्य बिंदु है
क्योंकि बाद में
इस तिथि को 10 महीने
पहले खिसका दिया
गया।
2)
मार्च 1947 (माउंटबेटन
का आगमन): लॉर्ड
माउंटबेटन अंतिम
वायसराय बनकर भारत
आए। उनका प्राथमिक
कार्य सत्ता हस्तांतरण
को सुव्यवस्थित
करना था, लेकिन
बढ़ती सांप्रदायिक
हिंसा ने उनके
दृष्टिकोण को बदल
दिया।
3)
मई 1947 (गहन कूटनीतिक
वार्ता): इस दौरान
'प्लान बाल्कन'
पर चर्चा हुई और
अंततः कांग्रेस
व मुस्लिम लीग
के नेताओं के साथ
विभाजन के अंतिम
प्रारूप पर सहमति
बनी।
4)
3 जून 1947 (माउंटबेटन
योजना): आधिकारिक
तौर पर 'विभाजन
के साथ स्वतंत्रता'
की घोषणा की गई।
इसी दिन यह स्पष्ट
हुआ कि भारत का
बंटवारा होगा और
दो नए डोमिनियन
(भारत और पाकिस्तान)
अस्तित्व में आएंगे।
यह चार्ट स्पष्ट
करता है कि जिस
प्रक्रिया के लिए
15 महीने (जून 1948 तक)
का समय तय किया
गया था, उसे केवल
72 दिनों के भीतर
समेटने का निर्णय
लिया गया, जो बाद
में हुई हिंसा
का एक प्रमुख कारण
बना।
2.
माउंटबेटन
योजना के मुख्य
प्रावधान
3 जून, 1947 को लॉर्ड
माउंटबेटन ने रेडियो
के माध्यम से अपनी
योजना की घोषणा
की। इस योजना का
मुख्य आधार भारतीय
स्वतंत्रता के
साथ-साथ देश का
विभाजन था। एनसीईआरटी
National
Council of Educational Research and Training (2021) के
अनुसार, यह योजना
वास्तव में 'बंटवारे
के साथ स्वतंत्रता'
(Freedom with Partition) का आधिकारिक
दस्तावेज थी। इसके
प्रमुख प्रावधान
निम्नलिखित थे:
विभाजन की
स्वीकृति और डोमिनियन
स्टेटस: योजना
का प्राथमिक प्रावधान
भारत और पाकिस्तान
नामक दो स्वायत्त
डोमिनियनों की
स्थापना करना था।
इग्नू Indira
Gandhi National Open University (2005) के
अनुसार, माउंटबेटन
ने सत्ता हस्तांतरण
के लिए 'डोमिनियन
स्टेटस' का सुझाव
इसलिए दिया क्योंकि
इससे ब्रिटिश राष्ट्रमंडल
के साथ संबंध बने
रहते और सत्ता
का हस्तांतरण त्वरित
रूप से संभव हो
पाता। ब्रिटिश
संसद ने इसी के
आधार पर बाद में
'भारतीय स्वतंत्रता
अधिनियम, 1947' पारित
किया।
प्रांतीय विधानसभाओं
का निर्णय: योजना
ने विभाजन की प्रक्रिया
को लोकतांत्रिक
जामा पहनाने के
लिए प्रांतीय विधानसभाओं
को शक्ति दी:
·
पंजाब और बंगाल: इन
प्रांतों की विधानसभाओं
को दो भागों (मुस्लिम
बहुल और गैर-मुस्लिम
बहुल) में विभाजित
होकर मतदान करना
था। यदि किसी भी
पक्ष ने विभाजन
के पक्ष में मत
दिया, तो प्रांत
का बंटवारा निश्चित
था Bandyopadhyay (2004)।
·
सिंध: सिंध
की विधानसभा को
स्वयं यह तय करना
था कि वह किस डोमिनियन
में शामिल होना
चाहती है।
जनमत संग्रह: उत्तर-पश्चिमी
सीमा प्रांत (NWFP) और
असम के सिलहट जिले
की स्थिति अत्यधिक
संवेदनशील थी।
योजना के अनुसार,
इन क्षेत्रों में
जनमत संग्रह कराया
जाना था ताकि जनता
स्वयं यह तय कर
सके कि वे भारत
में रहना चाहते
हैं या पाकिस्तान
में। Chandra
(2009) उल्लेख
करते हैं कि खान
अब्दुल गफ्फार
खान के विरोध के
बावजूद NWFP में जनमत
संग्रह कराया गया,
जिसका झुकाव अंततः
पाकिस्तान की ओर
रहा।
सीमा आयोग
का गठन: विभाजन की
भौगोलिक रेखा खींचने
के लिए एक स्वतंत्र
'सीमा आयोग' के गठन
का प्रावधान किया
गया। इसकी अध्यक्षता
ब्रिटिश कानूनी
विशेषज्ञ सिरिल
रेडक्लिफ को सौंपी
गई। Guha (2007) अपनी
पुस्तक 'इंडिया
आफ्टर गांधी' में
लिखते हैं कि रेडक्लिफ
को भारत की जटिल
सामाजिक-भौगोलिक
स्थिति का कोई
पूर्व ज्ञान नहीं
था और उन्हें यह
कार्य पूरा करने
के लिए केवल पांच
सप्ताह का समय
दिया गया Guha (2007) ।
देसी रियासतों
(Princely
States) का भविष्य: माउंटबेटन
योजना ने स्पष्ट
किया कि 15 अगस्त,
1947 को ब्रिटिश सर्वोच्चता
(Paramountcy) समाप्त हो जाएगी।
योजना के तहत रियासतों
को यह स्वायत्तता
दी गई कि वे अपनी
भौगोलिक स्थिति
और जनसांख्यिकी
के आधार पर भारत
या पाकिस्तान में
से किसी एक को चुन
लें। हालांकि,
बी.पी. मेनन के अनुसार,
तकनीकी रूप से
वे स्वतंत्र भी
रह सकती थीं, लेकिन
माउंटबेटन ने उन्हें
स्पष्ट चेतावनी
दी थी कि वे 'शून्य'
में नहीं रह सकतीं
Menon
(1956)।
सत्ता हस्तांतरण
की तिथि: इस योजना
का सबसे विवादास्पद
प्रावधान सत्ता
हस्तांतरण की तिथि
को 15 अगस्त, 1947 घोषित
करना था। मूल रूप
से क्लीमेंट एटली
ने जून 1948 की तिथि
तय की थी, लेकिन
माउंटबेटन ने प्रशासनिक
तैयारी की कमी
के बावजूद इसे
दस महीने पहले
खिसका दिया (सरकार,
1983)।

व्याख्या:
माउंटबेटन योजना
का संरचनात्मक
ढांचा
यह चार्ट माउंटबेटन
योजना के उन विधिक
और प्रशासनिक स्तंभों
को स्पष्ट करता
है, जिनके आधार
पर भारतीय उपमहाद्वीप
का विभाजन सुनिश्चित
किया गया। इसे
तीन मुख्य शाखाओं
में विभाजित किया
जा सकता है:
1)
प्रांतीय निर्णय
(Decision of Provinces)
योजना का सबसे
महत्वपूर्ण हिस्सा
प्रांतों का विभाजन
था।
·
पंजाब और बंगाल: इन
दोनों बड़े प्रांतों
के लिए यह प्रावधान
किया गया कि उनकी
विधानसभाओं के
सदस्य दो समूहों
(मुस्लिम बहुल
और गैर-मुस्लिम
बहुल) में बैठेंगे।
यदि किसी भी समूह
ने बहुमत से विभाजन
के पक्ष में मतदान
किया, तो उन प्रांतों
का बंटवारा अनिवार्य
माना गया।
·
सिंध: यहाँ
की विधानसभा को
विशेष अधिकार दिया
गया कि वह स्वयं
यह तय करे कि उसे
किस डोमिनियन
(भारत या पाकिस्तान)
का हिस्सा बनना
है।
2)
जनमत संग्रह
(Referendum
for Border Areas)
उन क्षेत्रों
के लिए जहाँ जनसांख्यिकी
मिश्रित थी या
राजनीतिक स्थिति
जटिल थी, 'जनमत संग्रह'
का लोकतांत्रिक
मार्ग अपनाया गया:
·
उत्तर-पश्चिमी
सीमा प्रांत (NWFP): यहाँ
की जनता से पूछा
गया कि वे पाकिस्तान
में शामिल होना
चाहते हैं या नहीं।
(यद्यपि खान अब्दुल
गफ्फार खान ने
इसका विरोध किया
था)।
·
असम का सिलहट
जिला: यह एक मुस्लिम
बहुल जिला था जो
असम का हिस्सा
था। यहाँ भी जनमत
संग्रह के माध्यम
से यह तय किया गया
कि इसे पूर्वी
बंगाल (पाकिस्तान)
में शामिल किया
जाएगा।
3)
देसी रियासतों
की स्थिति (Status
of Princely States)
यह चार्ट का
तीसरा और सबसे
विवादास्पद स्तंभ
है:
·
योजना के अनुसार,
15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश
'पैरामाउंटसी'
(सर्वोच्चता) समाप्त
हो गई।
·
रियासतों को
यह विकल्प दिया
गया कि वे अपनी
भौगोलिक स्थिति
और जनता की इच्छा
के अनुसार भारत
या पाकिस्तान में
शामिल हों।
·
यद्यपि सैद्धांतिक
रूप से उन्हें
'स्वतंत्र' रहने
का विकल्प भी था,
लेकिन माउंटबेटन
ने स्पष्ट किया
कि प्रशासनिक और
सुरक्षा कारणों
से ऐसा करना अव्यावहारिक
होगा।
चार्ट का शोधपरक
महत्व (Significance)
यह पदानुक्रम
चार्ट (Hierarchy Chart) यह रेखांकित
करता है कि माउंटबेटन
योजना केवल एक
'राजनीतिक घोषणा'
नहीं थी, बल्कि
यह विकेंद्रीकृत
निर्णय प्रक्रिया
पर आधारित थी।
इसने ब्रिटिश संसद
के बजाय स्थानीय
विधानसभाओं और
जनता (जनमत संग्रह
के माध्यम से) पर
विभाजन की नैतिक
जिम्मेदारी डाल
दी।
3.
माउंटबेटन
योजना का आलोचनात्मक
विश्लेषण
माउंटबेटन
योजना का आलोचनात्मक
विश्लेषण इस शोध
पत्र का वैचारिक
केंद्र है। इस
खंड में हम उन अंतर्निहित
दोषों और रणनीतिक
चूकों का परीक्षण
करेंगे जिन्होंने
एक व्यवस्थित सत्ता
हस्तांतरण को एक
मानवीय आपदा में
बदल दिया। लॉर्ड
माउंटबेटन की योजना
को अक्सर एक 'सफल
विदाई' के रूप में
प्रस्तुत किया
जाता है, परंतु
गहन ऐतिहासिक विश्लेषण
इसके पीछे छिपी
अदूरदर्शिता और
ब्रिटिश साम्राज्य
के स्वार्थों को
उजागर करता है।
'महान जल्दबाजी'
और प्रशासनिक विफलता:
योजना की सबसे
तीखी आलोचना इसकी
समय-सीमा को लेकर
की जाती है। माउंटबेटन
ने सत्ता हस्तांतरण
की तिथि को जून
1948 से घटाकर अगस्त
1947 कर दिया। Sarkar
(1983) के
अनुसार, यह 10 महीने
की कटौती किसी
प्रशासनिक तर्क
पर नहीं, बल्कि
माउंटबेटन के व्यक्तिगत
उत्साह और ब्रिटिश
सरकार की जिम्मेदारी
से भागने की हड़बड़ी
पर आधारित थी।
इतने कम समय में
40 करोड़ लोगों के
भाग्य, सेना के
बंटवारे, रेल, खजाने
और यहाँ तक कि डाक
टिकटों के विभाजन
का प्रबंधन करना
असंभव था Sarkar
(1983)।
रेडक्लिफ रेखा:
एक अज्ञात सीमांकन: सीमा
आयोग के अध्यक्ष
सिरिल रेडक्लिफ
को भारत के भूगोल
और संस्कृति का
शून्य ज्ञान था।
Guha (2007) लिखते
हैं कि रेडक्लिफ
ने नक्शों पर जो
लकीरें खींचीं,
वे गाँवों, घरों
और यहाँ तक कि समुदायों
को बीच से काटती
थीं। सबसे आश्चर्यजनक
और आलोचनात्मक
बिंदु यह है कि
सीमा रेखा की घोषणा
14-15 अगस्त तक सार्वजनिक
नहीं की गई थी।
एनसीईआरटी के अनुसार,
लोग यह जानते ही
नहीं थे कि वे किस
देश के नागरिक
हैं, जिससे अराजकता
और हिंसा को बढ़ावा
मिला National
Council of Educational Research and Training (2021)।
ब्रिटिश 'निकास
रणनीति' (Exit
Strategy) का स्वार्थ: इतिहासकार
Jalal
(1985) का
तर्क है कि माउंटबेटन
योजना वास्तव में
भारत को संगठित
छोड़ने की योजना
नहीं थी, बल्कि
यह ब्रिटेन के
गिरते वैश्विक
प्रभाव के बीच
एक 'सम्मानजनक
निकास' सुनिश्चित
करने का प्रयास
था। अंग्रेजों
का मुख्य उद्देश्य
यह सुनिश्चित करना
था कि विभाजन के
बाद भी दोनों देश
राष्ट्रमंडल (Commonwealth) का
हिस्सा बने रहें
ताकि हिंद महासागर
में ब्रिटिश सामरिक
हित सुरक्षित रहें
Jalal
(1985)।
रियासतों के
प्रति अस्पष्टता:
योजना ने 565 देसी
रियासतों को 'अधिलोकन'
(Paramountcy) की समाप्ति
के बाद सैद्धांतिक
रूप से स्वतंत्र
छोड़ दिया। इग्नू
Indira
Gandhi National Open University (2005) के
अनुसार, यह प्रावधान
भारत के 'बाल्कनीकरण'
(छोटे-छोटे टुकड़ों
में टूटना) का जोखिम
पैदा करता था।
हालांकि माउंटबेटन
ने रियासतों को
भारत या पाकिस्तान
में शामिल होने
की सलाह दी, लेकिन
कानूनी अस्पष्टता
ने कश्मीर, जूनागढ़
और हैदराबाद जैसी
समस्याओं को जन्म
दिया, जिनका दंश
आज भी उपमहाद्वीप
झेल रहा है।
हिंसा का पूर्वानुमान
लगाने में विफलता: विद्वान
Singh
(1987) के अनुसार,
माउंटबेटन ने दावा
किया था कि वे रक्तपात
नहीं होने देंगे,
लेकिन वास्तविकता
इसके विपरीत रही।
विभाजन की योजना
में अल्पसंख्यकों
की सुरक्षा के
लिए कोई ठोस तंत्र
नहीं बनाया गया
था। पंजाब बाउंड्री
फोर्स (PBF) का गठन
बहुत देर से और
कम संख्या में
किया गया, जो दंगों
को रोकने में पूरी
तरह अक्षम सिद्ध
हुई Singh
(1987)।
राजनीतिक नेतृत्व
का समझौता: आलोचनात्मक
दृष्टि से यह भी
देखा जाना चाहिए
कि भारतीय नेतृत्व
(कांग्रेस और लीग)
ने इस दोषपूर्ण
योजना को क्यों
स्वीकार किया।
Chandra
(2009) का
मत है कि कांग्रेस
ने विभाजन को एक
'अपरिहार्य बुराई'
के रूप में स्वीकार
किया ताकि गृहयुद्ध
को रोका जा सके
और एक मजबूत केंद्र
के साथ शासन शुरू
किया जा सके Chandra
(2009)।
तालिका 1
|
तालिका
1
माउंटबेटन
योजना — दावे बनाम
वास्तविकता (Critique Table) |
||
|
विश्लेषण
के बिंदु |
ब्रिटिश
प्रशासन/माउंटबेटन
का दावा (A) |
ऐतिहासिक
वास्तविकता/परिणाम
(B) |
|
समय
सीमा (Deadline) |
जून 1948 की जगह 15 अगस्त 1947 की
समय सीमा तय
की गई ताकि
"जल्द
समाधान" निकले। |
मात्र 72 दिनों की
समय सीमा ने
प्रशासनिक
तंत्र को ध्वस्त
कर दिया।
संपत्तियों
का बंटवारा
अधूरा रह
गया। |
|
हिंसा
पर नियंत्रण |
माउंटबेटन
का दावा: "मैं
रक्तपात
नहीं होने दूँगा, मैं एक
सैनिक हूँ।" |
इतिहास
का सबसे
क्रूर
नरसंहार; पंजाब और
बंगाल में 5 से 10 लाख
लोग मारे गए। |
|
जनसंख्या
विस्थापन |
यह माना
गया कि आबादी
का
स्थानांतरण
स्वैच्छिक
और
शांतिपूर्ण
होगा। |
लगभग 1.5 करोड़
लोगों का 'अकस्मात'
और 'जबरन'
विस्थापन
हुआ।
शरणार्थी
समस्या आज भी
एक मुद्दा
है। |
|
सीमा
निर्धारण (Radcliffe
Line) |
एक
निष्पक्ष
सीमा आयोग
(रेडक्लिफ)
द्वारा वैज्ञानिक
विभाजन का
वादा। |
रेडक्लिफ
को भारत का
अनुभव शून्य
था। सीमा रेखा
की घोषणा
आजादी के 2 दिन बाद (17
अगस्त) हुई,
जिससे
भारी
अराजकता
फैली। |
|
रियासतों
का भविष्य |
एक
व्यवस्थित
विलय
प्रक्रिया (Accession) का
आश्वासन। |
कश्मीर, जूनागढ़
और हैदराबाद
में
अनिश्चितता
पैदा हुई।
कश्मीर
विवाद आज भी
दक्षिण
एशिया की
सबसे बड़ी
सुरक्षा
चुनौती है। |
|
सैन्य
सुरक्षा |
'पंजाब
बाउंड्री
फोर्स' (PBF) दंगों
को
नियंत्रित
करने के लिए
पर्याप्त होगी। |
सैन्य
बल का स्वयं
सांप्रदायिक
आधार पर विभाजन
हो गया, जिससे वे
दंगों को
रोकने में
पूरी तरह
अक्षम रहे। |
4.
तालिका
का अकादमिक विवरण
यह तालिका
इस शोध पत्र के
मुख्य तर्क को
सिद्ध करती है
कि माउंटबेटन योजना
'योजनाबद्ध हस्तांतरण'
के बजाय एक 'अफरातफरी
में किया गया पलायन'
थी।
1)
प्रशासनिक
अदूरदर्शिता: तालिका
के पहले बिंदु
से स्पष्ट है कि
समय सीमा को घटाना
कोई राजनीतिक आवश्यकता
नहीं, बल्कि ब्रिटिश
सरकार की अपनी
जिम्मेदारी से
बचने की कोशिश
थी। Sarkar
(1983) के
अनुसार, "यह जल्दबाजी
दंगों को रोकने
के लिए नहीं, बल्कि
अंग्रेजों को दंगों
की जिम्मेदारी
से बचाने के लिए
थी।"
2)
सूचना का अभाव: रेडक्लिफ
अवार्ड की घोषणा
में देरी (17 अगस्त)
ने करोड़ों लोगों
को अधर में लटका
दिया। लोग जानते
ही नहीं थे कि 15 अगस्त
को वे किस देश में
सो रहे हैं। इस
'सूचना शून्यता'
ने ही कत्लेआम
को सबसे अधिक बढ़ावा
दिया।
3)
सुरक्षा विफलता: तालिका
का अंतिम बिंदु
दर्शाता है कि
जब रक्षक (सेना)
का ही विभाजन कर
दिया गया, तो वे
जनता की रक्षा
कैसे करते? Jalal
(1985) इसे
ब्रिटिश कूटनीति
की सबसे बड़ी नैतिक
हार मानती हैं।
5.
भारतीय
उपमहाद्वीप पर
तात्कालिक परिणाम
शोध पत्र का
यह खंड माउंटबेटन
योजना के क्रियान्वयन
के बाद उत्पन्न
हुई उन विनाशकारी
और परिवर्तनकारी
घटनाओं का विश्लेषण
करता है, जिन्होंने
भारतीय उपमहाद्वीप
के सामाजिक और
राजनीतिक ढांचे
को हिलाकर रख दिया।
माउंटबेटन योजना
के लागू होते ही
उपमहाद्वीप एक
अभूतपूर्व उथल-पुथल
के दौर में प्रवेश
कर गया। इग्नू
Indira
Gandhi National Open University (2005) के
अनुसार, स्वतंत्रता
का उल्लास शीघ्र
ही विभाजन की त्रासदी
में बदल गया। इसके
तात्कालिक परिणाम
निम्नलिखित क्षेत्रों
में देखे जा सकते
हैं:
इतिहास का
सबसे बड़ा विस्थापन
और शरणार्थी संकट: योजना
का सबसे भयावह
परिणाम जनसंख्या
का अनियोजित और
हिंसक स्थानांतरण
था। एनसीईआरटी
के आंकड़ों के
अनुसार, लगभग 1.5 करोड़
लोगों को रातों-रात
अपनी जड़ों को
छोड़कर सीमा पार
जाने पर मजबूर
होना पड़ा। यह
मानव इतिहास का
अब तक का सबसे बड़ा
विस्थापन था। शरणार्थियों
के लिए बुनियादी
सुविधाओं का अभाव
और अनिश्चित भविष्य
ने एक दीर्घकालिक
सामाजिक और आर्थिक
संकट पैदा कर दिया
National
Council of Educational Research and Training (2021)।
सांप्रदायिक
हिंसा और नरसंहार: सत्ता
हस्तांतरण की गति
इतनी तीव्र थी
कि कानून-व्यवस्था
बनाए रखना असंभव
हो गया। Sarkar
(1983) उल्लेख
करते हैं कि पंजाब
और बंगाल में 'बाउंड्री
फोर्स' दंगों को
रोकने में मूकदर्शक
बनी रही। अनुमानतः
5 लाख से 10 लाख लोग
सांप्रदायिक हिंसा
की भेंट चढ़ गए।
महिलाओं के खिलाफ
हिंसा और अपहरण
इस त्रासदी का
सबसे काला अध्याय
था, जैसा कि उर्वशी
बुटालिया ने अपनी
शोधपरक कृतियों
में विस्तार से
बताया है Butalia
(1998)।
प्रशासनिक
और सैन्य विभाजन
की जटिलताएँ: माउंटबेटन
योजना ने केवल
भूमि का नहीं, बल्कि
सरकारी संपत्तियों,
ऋणों, रेलवे, डाक
सेवाओं और यहाँ
तक कि सेना का भी
विभाजन कर दिया।
Menon
(1956) के
अनुसार, सेना का
सांप्रदायिक आधार
पर विभाजन सबसे
जोखिम भरा कार्य
था। हथियारों और
संसाधनों के बंटवारे
ने दोनों नवजात
राष्ट्रों के बीच
तत्काल अविश्वास
की दीवार खड़ी
कर दी, जिससे प्रशासनिक
पंगुता की स्थिति
उत्पन्न हो गई
Menon
(1956)।
देसी रियासतों
का एकीकरण और विवाद: योजना
द्वारा ब्रिटिश
सर्वोच्चता की
समाप्ति ने रियासतों
को तकनीकी रूप
से स्वतंत्र छोड़
दिया था। हालांकि
सरदार पटेल के
नेतृत्व में अधिकांश
रियासतों का भारत
में विलय हो गया,
लेकिन जूनागढ़,
हैदराबाद और विशेषकर
जम्मू-कश्मीर की
स्थिति विवादास्पद
हो गई। Guha (2007) का
तर्क है कि माउंटबेटन
द्वारा कश्मीर
मुद्दे को संयुक्त
राष्ट्र में ले
जाने की सलाह ने
एक 'तात्कालिक
परिणाम' को 'स्थायी
संघर्ष' में बदल
दिया Guha (2007)।
आर्थिक अस्थिरता: विभाजन
ने उपमहाद्वीप
के आर्थिक पारिस्थितिकी
तंत्र को नष्ट
कर दिया। कच्चे
माल के स्रोत (जैसे
जूट और कपास क्षेत्र)
एक देश में चले
गए, जबकि प्रसंस्करण
मिलें दूसरे देश
में रह गईं। Chandra
(2009) के
अनुसार, इस आर्थिक
असंतुलन ने दोनों
देशों में खाद्य
संकट और मुद्रास्फीति
को जन्म दिया Chandra
(2009)।
विभाजन की
मानवीय लागत
(1941-1951)

व्याख्या
(Analysis of the Chart)
यह ग्राफ माउंटबेटन
योजना के क्रियान्वयन
के बाद उत्पन्न
हुई प्रशासनिक
विफलता को सांख्यिकीय
रूप से सिद्ध करता
है:
1)
पंजाब का असंतुलन: ग्राफ
में पंजाब का बार
सबसे ऊंचा है, जो
यह दर्शाता है
कि विभाजन का सबसे
भीषण प्रहार इसी
प्रांत पर हुआ।
यहाँ 'रेडक्लिफ
रेखा' ने न केवल
जमीन को बांटा,
बल्कि दो समुदायों
के बीच गृहयुद्ध
जैसी स्थिति पैदा
कर दी।
2)
दिल्ली: एक शरणार्थी
शहर: दिल्ली के
बार से यह स्पष्ट
होता है कि कैसे
भारत की राजधानी
रातों-रात एक विशाल
शरणार्थी शिविर
में बदल गई थी।
1941 और 1951 की जनगणना
के बीच दिल्ली
की जनसांख्यिकी
में आया भारी उछाल
इसी विस्थापन का
परिणाम था।
3)
बंगाल का विस्थापन: बंगाल
में विस्थापन पंजाब
की तुलना में थोड़ा
धीमा था लेकिन
यह लंबे समय तक
चला (1950 के दशक तक)।
ग्राफ यह भी दिखाता
है कि पंजाब की
तुलना में बंगाल
में तात्कालिक
मृत्यु दर कम थी,
लेकिन विस्थापन
का पैमाना बहुत
बड़ा था।
यह सांख्यिकीय
चित्रण शोध पत्र
के उस तर्क को पुष्ट
करता है कि माउंटबेटन
योजना ने 'जनसंख्या
के व्यवस्थित स्थानांतरण'
के बारे में कोई
ठोस प्रावधान नहीं
किया था। जनगणना
1951 के आंकड़े उस 'अदृश्य
त्रासदी' को संख्यात्मक
रूप देते हैं, जिसे
केवल शब्दों में
बयां करना कठिन
है।
6.
दीर्घकालिक
प्रभाव
माउंटबेटन
योजना और उसके
परिणामस्वरूप
हुए विभाजन ने
भारतीय उपमहाद्वीप
पर स्थायी सामाजिक,
राजनीतिक और सामरिक
घाव छोड़े हैं:
·
स्थायी शत्रुता
और कश्मीर विवाद: योजना
की सबसे बड़ी दीर्घकालिक
विफलता कश्मीर
मुद्दे का समाधान
न कर पाना थी। Guha (2007) के
अनुसार, रियासतों
के विलय की अधूरी
प्रक्रिया ने भारत
और पाकिस्तान के
बीच चार बड़े युद्धों
और निरंतर सीमा
विवाद को जन्म
दिया Guha (2007)।
·
सांप्रदायिक
राजनीति का सुदृढ़ीकरण: विभाजन
ने उपमहाद्वीप
में 'अल्पसंख्यक'
और 'बहुसंख्यक'
की राजनीति को
स्थायी बना दिया।
National
Council of Educational Research and Training (2021) के
विश्लेषण के अनुसार,
1947 की हिंसा की स्मृतियों
ने दोनों देशों
के आंतरिक राजनीतिक
विमर्श में सांप्रदायिकता
को एक प्रमुख तत्व
बना दिया National
Council of Educational Research and Training (2021)।
·
सैन्यीकरण
और परमाणु प्रतिस्पर्धा: दक्षिण
एशिया का भूगोल
जिस प्रकार बांटा
गया, उसने दोनों
राष्ट्रों को रक्षा
पर भारी खर्च करने
के लिए मजबूर किया।
Jalal
(1985) तर्क
देती हैं कि पाकिस्तान
की राजनीति में
सेना का अत्यधिक
वर्चस्व इसी सुरक्षा
असुरक्षा की भावना
का परिणाम था Jalal
(1985)।
·
क्षेत्रीय
सहयोग में बाधा: माउंटबेटन
योजना ने भूगोल
को इस तरह विभाजित
किया कि आज दक्षिण
एशिया विश्व के
सबसे कम एकीकृत
क्षेत्रों में
से एक है। सार्क
(SAARC) जैसे संगठनों
की विफलता के पीछे
विभाजन की ऐतिहासिक
कड़वाहट ही मुख्य
कारण है।
7.
निष्कर्ष
माउंटबेटन
योजना भारतीय आधुनिक
इतिहास का वह विवादास्पद
मोड़ है, जिसने
एक औपनिवेशिक युग
का अंत तो किया,
परंतु उपमहाद्वीप
के भविष्य को रक्त
और विस्थापन की
स्याही से लिख
दिया। इस शोध पत्र
के माध्यम से यह
स्पष्ट होता है
कि 3 जून की योजना
केवल सत्ता के
हस्तांतरण का दस्तावेज
नहीं थी, बल्कि
यह ब्रिटिश साम्राज्य
की अपनी जिम्मेदारियों
से 'सम्मानजनक
निकास' (Honourable Exit) की
एक सोची-समझी रणनीति
थी।
अकादमिक संश्लेषण
जैसा कि इग्नू
Indira
Gandhi National Open University (2005) के
पाठ्यपुस्तकों
में उल्लेखित है,
माउंटबेटन की योजना
ने उस समय की अपरिहार्य
परिस्थितियों
को स्वीकार किया,
जहाँ कांग्रेस
की 'अखंड भारत' की
कल्पना और मुस्लिम
लीग की 'पाकिस्तान'
की हठधर्मिता के
बीच कोई मध्य मार्ग
शेष नहीं रह गया
था। हालाँकि, इस
शोध का आलोचनात्मक
विश्लेषण यह सिद्ध
करता है कि Chandra
(2009) के
तर्कों के अनुसार,
विभाजन स्वयं में
उतना दुखद नहीं
था जितना कि उस
विभाजन को लागू
करने का हिंसक
और अव्यवस्थित
तरीका था।
प्रमुख निष्कर्ष
1)
जल्दबाजी की
त्रासदी: सत्ता
हस्तांतरण की तिथि
को दस महीने पहले
खिसकाना एक ऐसी
रणनीतिक चूक थी,
जिसने प्रशासनिक
तंत्र को पंगु
बना दिया और सीमा
आयोग को न्यायसंगत
निर्णय लेने का
समय नहीं दिया।
2)
मानवीय मूल्य: National
Council of Educational Research and Training (2021) और
उर्वशी बुटालिया
के शोध यह स्पष्ट
करते हैं कि माउंटबेटन
योजना में 'मानवीय
सुरक्षा' (Human
Security) को राजनीतिक लाभ
के आगे गौण रखा
गया, जिसके परिणामस्वरूप
इतिहास का सबसे
बड़ा विस्थापन
हुआ।
3)
अपूर्ण एकीकरण: योजना
ने रियासतों की
स्थिति को कानूनी
रूप से अस्पष्ट
छोड़ दिया, जिसका
परिणाम कश्मीर
विवाद के रूप में
आज भी दक्षिण एशिया
की स्थिरता को
चुनौती दे रहा
है।
अंतिम विचार
अंततः, यह कहा जा
सकता है कि माउंटबेटन
योजना एक 'आवश्यक
बुराई' (Necessary Evil) के
रूप में स्वीकार
की गई थी। यदि माउंटबेटन
ने जून 1948 तक प्रतीक्षा
की होती, तो संभवतः
सांप्रदायिक दंगों
की तीव्रता और
विस्थापन की अव्यवस्था
को बेहतर ढंग से
प्रबंधित किया
जा सकता था। यह
योजना जहाँ एक
ओर औपनिवेशिक मुक्ति
का मार्ग बनी, वहीं
इसने भारतीय उपमहाद्वीप
को एक ऐसी भौगोलिक
और मानसिक विभाजक
रेखा प्रदान की,
जिसके घाव आठ दशकों
बाद भी पूरी तरह
नहीं भर पाए हैं।
None.
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