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Original Article
The Indian Caste System under the Impact of Industrialization and Urbanization: A Sociological Analysis
औद्योगिकीकरण
एवं नगरीकरण
के प्रभाव में
भारतीय
जाति-व्यवस्था:
एक
समाजशास्त्रीय
विश्लेषण
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Dr. Vinay
Kumar Sinha 1
1 Assistant Professor, Department
of Sociology, Rajendra Mishra College Saharsa, Bihar, India |
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ABSTRACT |
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English: This research paper analyzes the structural and functional changes occurring in the caste system in contemporary India as a result of the dual processes of industrialization and urbanization. Traditionally, Indian society has been a hierarchical system based on the principles of 'purity and pollution'. However, rapid industrial development has weakened the traditional link between caste and occupation by promoting occupational mobility. This study demonstrates that urbanization has reduced social distance through anonymity and physical proximity, leading to the near elimination of practices like untouchability in public spaces. The findings of the research indicate that while the 'ritualistic' aspect of caste has declined, its 'secular' aspect has been strengthened due to democratic politics and identity consciousness. Ultimately, this paper argues that under the influence of modernity, caste has not completely disappeared, but has adapted itself to a class-based society, which can be termed 'caste adaptation' in sociological terminology. Hindi: यह
शोध पत्र
समकालीन
भारत में
औद्योगिकीकरण
और नगरीकरण
की दोहरी
प्रक्रियाओं
के परिणामस्वरूप
जाति-व्यवस्था
में आ रहे
संरचनात्मक और
प्रकार्यात्मक
परिवर्तनों
का विश्लेषण करता
है।
पारंपरिक
रूप से
भारतीय समाज 'शुद्धता
और अशुद्धता'
के
सिद्धांतों
पर आधारित एक
सोपानिक (Hierarchical)
व्यवस्था
रही है।
हालांकि, तीव्र
औद्योगिक
विकास ने
व्यावसायिक
गतिशीलता को
बढ़ावा देकर
जाति और पेशे
के पारंपरिक संबंध
को शिथिल कर
दिया है। प्रस्तुत
अध्ययन यह
दर्शाता है
कि नगरीकरण ने
'अनामत्व'
(Anonymity)
और
भौतिक
निकटता के
माध्यम से
सामाजिक
दूरी को कम
किया है, जिससे
सार्वजनिक
स्थानों पर
छुआछूत जैसी
प्रथाएं
लगभग समाप्त
हो गई हैं।
शोध के
निष्कर्ष
इंगित करते
हैं कि जहाँ
एक ओर जाति के 'अनुष्ठानिक'
(Ritualistic)
स्वरूप
में गिरावट
आई है, वहीं
दूसरी ओर
लोकतांत्रिक
राजनीति और
पहचान की
चेतना के
कारण जाति का 'धर्मनिरपेक्ष'
(Secular)
पक्ष
सुदृढ़ हुआ
है। अंततः,
यह
शोध पत्र
तर्क देता है
कि आधुनिकता
के प्रभाव
में जाति
पूर्णतः
विलुप्त
नहीं हुई है,
बल्कि
उसने स्वयं
को
वर्ग-आधारित
समाज के अनुरूप
ढाल लिया है,
जिसे
समाजशास्त्रीय
शब्दावली
में 'जाति
का अनुकूलन'
कहा
जा सकता है। Keywords: Caste System, Industrialization, Urbanization,
Social Mobility, Occupational Change, Modernity, जाति-व्यवस्था, औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, सामाजिक
गतिशीलता, व्यावसायिक
परिवर्तन, आधुनिकता। |
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प्रस्तावना
1) पृष्ठभूमि:
जाति-व्यवस्था
की पारंपरिक
संरचना
भारतीय
समाज की मौलिक
विशिष्टता
इसकी जाति-व्यवस्था
रही है, जो विश्व की
सर्वाधिक
जटिल और
प्राचीन
सामाजिक
स्तरीकरण
प्रणालियों
में से एक है।
समाजशास्त्री
Ghurye (1932) ने अपनी
कृति 'Caste
and Race in India' में
जाति को
सामाजिक
विभाजन के छह
लक्षणों के रूप
में परिभाषित
किया, जिसमें
समाज का
खंडात्मक
विभाजन, सोपानिक
क्रम (Hierarchy), भोजन एवं
सामाजिक
सहवास पर
प्रतिबंध, नागरिक एवं
धार्मिक
अक्षमताएं, व्यवसायों
के
अनियंत्रित
चयन का अभाव
और अंतर्विवाह
(Endogamy) प्रमुख
थे।
पारंपरिक
रूप से, जाति
व्यवस्था 'पदानुक्रम'
और Dumont (1970) द्वारा
प्रतिपादित 'शुद्धता
और अशुद्धता'
(Purity and Pollution) के
सिद्धांत पर
टिकी थी। मैक्स
वेबर (1958)
ने इसे एक 'बंद
सामाजिक
स्थिति समूह'
माना था, जहाँ
व्यक्ति की
स्थिति जन्म
से निर्धारित
होती थी और
उसमें किसी भी
प्रकार की
गतिशीलता (Mobility) असंभव
थी। इस कालखंड
में ग्रामीण
व्यवस्था में 'जजमानी
प्रथा' ने
जातियों को
परस्पर
आर्थिक और
सामाजिक रूप से
एक सुदृढ़
संरचना में
बांधे रखा था।
2) परिवर्तन
के कारक:
औद्योगिकीकरण
और नगरीकरण
स्वतंत्रता
के पश्चात और
विशेष रूप से 20वीं सदी
के उत्तरार्ध
में, औद्योगिकीकरण
(Industrialization) और नगरीकरण
(Urbanization) भारतीय
सामाजिक
संरचना में
परिवर्तन के
दो सबसे
शक्तिशाली 'अभिकर्ता' (Agents) बनकर
उभरे।
·
औद्योगिकीकरण: उद्योगों
की स्थापना ने
उत्पादन के
साधनों को
बदला। Cohn (1987) के
अनुसार, मशीन
आधारित
उत्पादन ने
श्रम के
विभाजन को जातिगत
आधार से हटाकर
तकनीकी
कुशलता (Skill) के आधार पर
पुनर्स्थापित
किया।
कारखानों की कार्य-संस्कृति
ने विभिन्न
जातियों के
लोगों को एक
ही छत के नीचे
काम करने को
मजबूर किया, जिससे
शारीरिक
छुआछूत और
खान-पान के
पारंपरिक
निषेध कमजोर
होने लगे।
·
नगरीकरण: नगरीकरण
ने जीवन जीने
के एक नए ढंग
को जन्म दिया।
Wirth (1938) के 'Urbanism
as a Way of Life' के
सिद्धांत को
भारतीय
संदर्भ में
देखें तो, शहरों ने
व्यक्ति को 'अनामत्व' (Anonymity) प्रदान
किया। Srinivas (1996) ने
स्पष्ट किया
कि शहरी
वातावरण में
उच्च और निम्न
जातियों के
बीच की 'सामाजिक
दूरी' कम
होने लगी, क्योंकि
सार्वजनिक
परिवहन, रेस्तरां
और
सिनेमाघरों
जैसे स्थानों
पर जातिगत
श्रेष्ठता का
प्रदर्शन
करना
व्यावहारिक
रूप से कठिन
हो गया।
3)
शोध
की समस्या (Statement of Research Problem)
यद्यपि
आधुनिक
कारकों ने
जाति के बाह्य
स्वरूप को
प्रभावित
किया है, परंतु यहाँ
शोध की मुख्य
समस्या यह है
कि क्या ये
परिवर्तन
केवल 'सतही'
हैं? Kothari (1970) ने अपनी
पुस्तक 'Caste
in Indian Politics' में तर्क
दिया कि जहाँ
आधुनिकता ने
जाति के अनुष्ठानिक
पक्ष को कम
किया है, वहीं
इसने जाति को
एक सशक्त
राजनीतिक
पहचान और 'दबाव
समूह' (Pressure
Group) में
बदल दिया है।
अतः, यह शोध इस
समस्या का
विश्लेषण
करता है कि
औद्योगिकीकरण
और नगरीकरण के
दबाव में क्या
जाति व्यवस्था
वास्तव में
कमजोर होकर 'वर्ग' (Class)
में
परिवर्तित हो
रही है, जैसा कि Béteille (1965) ने 'Caste,
Class, and Power' में
संकेत दिया था,
या यह केवल
अपना चोला
बदलकर आधुनिक
संस्थाओं (जैसे
यूनियनों, राजनीतिक
दलों और
वैवाहिक
विज्ञापनों)
के भीतर और भी
गहरी जड़ें
जमा रही है?
साहित्य की
समीक्षा (Review
of Literature)
प्रस्तुत
शोध का विषय
समाजशास्त्र
में अत्यंत
चर्चा का
केंद्र रहा
है। विभिन्न
विद्वानों ने
समय-समय पर
जाति
व्यवस्था के
बदलते स्वरूप
को समझने के
लिए अलग-अलग
सैद्धांतिक
दृष्टिकोण
अपनाए हैं।
1) पारंपरिक
और
संरचनात्मक
दृष्टिकोण
Ghurye (1932) ने अपनी
कालजयी रचना 'Caste and Race in India' में यह
तर्क दिया था
कि नगरीकरण और
आधुनिक शिक्षा
के कारण जाति
के बाह्य
प्रतिबंध
(जैसे खान-पान
और छुआछूत)
शिथिल होंगे,
परंतु
अंतर्विवाह (Endogamy) की जड़ें
इतनी गहरी हैं
कि वह आधुनिक
समाज में भी
बनी रहेंगी।
वहीं Dumont (1970) ने 'Homo
Hierarchicus' में जाति को 'पदानुक्रम'
(Hierarchy) की एक ऐसी
संरचना माना
जो शुद्धता और
अशुद्धता के
धार्मिक
मूल्यों पर
आधारित है।
ड्यूमों का
मानना था कि
आधुनिक
आर्थिक
परिवर्तन इस
संरचना को
केवल सतह पर
प्रभावित
करते हैं, इसकी
वैचारिक नींव (Ideology) अभी भी
स्थिर है।
2) सामाजिक
गतिशीलता और
परिवर्तन के
सिद्धांत
Srinivas (1996) ने 'Social
Change in Modern India' में 'संस्कृतिकरण'
(Sanskritization) और 'पश्चिमीकरण'
(Westernization) की
अवधारणाओं के
माध्यम से
स्पष्ट किया
कि औद्योगिकीकरण
ने निम्न
जातियों को
आर्थिक संसाधन
प्रदान किए
हैं, जिससे
वे उच्च
जातियों के
रीति-रिवाजों
को अपनाकर
सामाजिक
सोपान में ऊपर
उठने का
प्रयास करती
हैं।
श्रीनिवास ने
यह भी
रेखांकित
किया कि
आधुनिकता ने
जाति को
समाप्त करने
के बजाय उसे 'धर्मनिरपेक्ष'
कार्यों
के लिए संगठित
किया है।
Singh (1973) ने अपनी
पुस्तक 'Modernization
of Indian Tradition' में तर्क
दिया कि
भारतीय समाज
में
आधुनिकीकरण 'क्रमिक' है।
उनके अनुसार,
नगरीकरण
के बावजूद
जाति के भीतर 'संरचनात्मक
सातत्य' (Structural Continuity) बना हुआ
है। जाति के
तत्व आधुनिक
व्यवसायों और
संस्थानों के
साथ तालमेल
बिठा रहे हैं।
3) जाति, वर्ग और
शक्ति का
बदलता समीकरण
Béteille (1965) ने तंजौर
के गांवों के
अध्ययन (Caste, Class, and Power) में पाया कि
पहले शक्ति
केवल
ब्राह्मणों
(उच्च जाति) के
पास केंद्रित
थी, लेकिन
औद्योगिकीकरण
और
लोकतांत्रिक
राजनीति ने
शक्ति को जाति
के आधार से
हटाकर वर्ग और
राजनीतिक
दलों की ओर
स्थानांतरित
कर दिया है।
इसी क्रम में, Mazumdar (1958) ने 'Caste
and Communication in an Indian Village' में उल्लेख
किया कि
आधुनिक
परिवहन और
उद्योगों ने
जातियों के
बीच की
पारंपरिक
दूरी को कम किया
है, जिससे 'जाति की
गतिशीलता' (Caste Mobility) में वृद्धि
हुई है।
4) नगरीकरण
और जातिगत
पहचान का
आधुनिक
स्वरूप
Kothari (1970) ने
अपनी पुस्तक 'Caste in Indian Politics' में एक
क्रांतिकारी
विचार
प्रस्तुत
किया। उन्होंने
कहा कि "जाति
का राजनीति
में प्रवेश उसे
आधुनिक बनाता
है।" नगरीकरण
ने जातियों को
चुनावी
राजनीति के
लिए लामबंद (Mobilize) होने का
अवसर दिया है।
Rudolph and Rudolph (1967) ने 'The
Modernity of Tradition' में तर्क
दिया कि जाति
संगठन (Caste Associations) शहरों में 'आधुनिक' हितों
को साधने का
माध्यम बन गए
हैं, जैसे
कि शिक्षा और
रोजगार के लिए
लॉबिंग करना।
Rao (1974) ने 'Urban
Sociology in India' में स्पष्ट
किया कि नगरीय
क्षेत्रों
में जाति का
प्रभाव 'निजी
क्षेत्र' (विवाह,
पूजा) तक
सीमित हो गया
है, जबकि 'सार्वजनिक
क्षेत्र' (बाजार,
कार्यालय)
में इसकी
भूमिका गौण हो
गई है। हालिया
शोधों में, Thorat (2009) ने अपनी
पुस्तक 'Dalits
in India' में
यह चेतावनी दी
है कि
औद्योगिकीकरण
के बावजूद 'बाजार में
जातिगत
भेदभाव' (Market Discrimination) के नए रूप
उभरे हैं, जो
दलितों की
आर्थिक
भागीदारी को
बाधित करते हैं।
शोध के
उद्देश्य (Research
Objectives)
प्रस्तुत
शोध का मुख्य
उद्देश्य यह
समझना है कि
आधुनिकता के
दो प्रमुख
कारकों औद्योगिकीकरण
और नगरीकरण ने
जाति
व्यवस्था की
पारंपरिक
कठोरता को किस
सीमा तक
परिवर्तित
किया है।
शोध
के विशिष्ट
उद्देश्य
निम्नलिखित
हैं:
1) जातिगत
व्यवसायों के
विघटन का
विश्लेषण करना
पारंपरिक
रूप से जाति
और व्यवसाय
एक-दूसरे से जुड़े
थे (विलियम
वाइज़र (1936) की 'जजमानी
व्यवस्था' के अनुसार)।
इस शोध का
उद्देश्य यह
जांचना है कि
औद्योगिकीकरण
ने किस प्रकार
श्रम के विभाजन
को 'जाति-आधारित'
से 'योग्यता-आधारित'
(Merit-based) बनाया है और
इसके
परिणामस्वरूप
ग्रामीण जजमानी
संबंधों का
पतन किस
प्रकार हुआ
है।
2) नगरीय
जीवन में
सामाजिक दूरी
और छुआछूत के
बदलते स्वरूप
का अध्ययन
नगरीकरण
'अनामत्व'
(Anonymity) को जन्म
देता है। शोध
का उद्देश्य
यह पता लगाना
है कि शहरों
में
सार्वजनिक
परिवहन, होटल,
शैक्षणिक
संस्थान और
कार्यस्थलों
पर जातियों के
बीच होने वाली
अंतःक्रिया
ने पारंपरिक 'शुद्धता-अशुद्धता'
(Purity and Pollution) के
सिद्धांतों
को कहाँ तक
शिथिल किया
है।
3) अंतर्विवाह
(Endogamy) की
निरंतरता और
परिवर्तन की
जांच करना
जाति
व्यवस्था की
रीढ़ 'अंतर्विवाह'
है। Ghurye (1932) का मानना
था कि यह तत्व
सबसे अंत में
बदलेगा। इस
शोध का
उद्देश्य यह
देखना है कि
नगरीय मध्यम
वर्ग में
शिक्षा और
आर्थिक
आत्मनिर्भरता
के चलते
अंतर्जातीय
विवाहों (Inter-caste marriages) के प्रति
दृष्टिकोण
में कितना
बदलाव आया है
और आधुनिक 'वैवाहिक
वेबसाइटों'
(Matrimonial sites) में
जाति की
भूमिका क्या
है।
4) जाति से
वर्ग (Caste
to Class) के
संक्रमण को
समझना
Béteille (1965) के
सिद्धांतों
के संदर्भ में, शोध का
उद्देश्य यह
विश्लेषण
करना है कि
क्या आधुनिक
भारत में
व्यक्ति की
पहचान उसकी
जाति के बजाय
उसके आर्थिक
वर्ग, आय
और जीवन-शैली (Lifestyle) से अधिक
निर्धारित
होने लगी है।
5) जाति के
राजनीतिकरण
और दबाव
समूहों की
भूमिका का
मूल्यांकन
औद्योगिकीकरण
ने जातियों को
संगठित होने
के साधन (जैसे
प्रेस, यूनियन और
संचार) दिए
हैं। शोध का
उद्देश्य Kothari (1970) के
परिप्रेक्ष्य
में यह देखना
है कि शहरों
में रहने वाली
जातियां किस
प्रकार अपने
हितों की
रक्षा के लिए 'जाति
संघों' (Caste
Associations) का
निर्माण कर
राजनीति को
प्रभावित
करती हैं।
6) कार्यस्थल
पर भेदभाव के
नवीन
स्वरूपों की
पहचान
जहाँ
औद्योगिकीकरण
ने पुराने
भेदभाव मिटाए हैं, वहीं
क्या आधुनिक
कॉर्पोरेट
जगत में 'नेटवर्किंग'
या 'सांस्कृतिक
पूंजी' (Cultural
Capital) के
नाम पर भेदभाव
के नए और
सूक्ष्म रूप
मौजूद हैं? शोध का
उद्देश्य पीरे
बोर्दियू (Pierre Bourdieu) के 'सांस्कृतिक
पूंजी' के
सिद्धांत के
आधार पर
आधुनिक
कार्यस्थलों का
विश्लेषण
करना है।
परिकल्पना
(Hypothesis)
प्रस्तुत
शोध विषय के
संदर्भ में, पूर्ववर्ती
साहित्य और
वर्तमान
सामाजिक प्रवृत्तियों
के आधार पर
निम्नलिखित
परिकल्पनाएं
निर्मित की गई
हैं:
मुख्य
परिकल्पना
"औद्योगिकीकरण
और नगरीकरण ने
भारतीय
जाति-व्यवस्था
के 'अनुष्ठानिक'
(Ritualistic) पक्ष (जैसे
छुआछूत, खान-पान
के निषेध) को
कमजोर किया है,
परंतु
इसके 'धर्मनिरपेक्ष'
(Secular) पक्ष (जैसे
राजनीतिक
लामबंदी, पहचान
की चेतना और
सामूहिक
स्वार्थ) को
और अधिक
सुदृढ़ एवं
आधुनिक बना
दिया है।"
उप-परिकल्पनाएं
1) व्यावसायिक
गतिशीलता: औद्योगिकीकरण
के कारण
जातियों का
अपने पारंपरिक
व्यवसायों से
अलगाव हुआ है।
अब व्यक्ति की
आर्थिक
स्थिति उसकी 'जातिगत
पहचान' के
बजाय उसकी 'तकनीकी
कुशलता और
शिक्षा' पर
अधिक निर्भर
करती है, जिससे
जाति का आधार 'जन्म' से
खिसककर 'उपलब्धि'
(Achievement) की ओर बढ़
रहा है।
2) सामाजिक
अंतः क्रिया: नगरीय
परिवेश में 'अनामत्व'
और स्थान
की कमी के
कारण विभिन्न
जातियों के बीच
'सामाजिक
सहवास' (Social
Commensality) में
वृद्धि हुई है,
जिससे
पारंपरिक 'शुद्धता-अशुद्धता'
का महत्व
केवल
व्यक्तिगत और
धार्मिक
अनुष्ठानों
तक सीमित रह
गया है।
3) अंतर्विवाह
की दृढ़ता: आधुनिक
शिक्षा और
नगरीकरण के
बावजूद, जाति-व्यवस्था
की मूल इकाई 'अंतर्विवाह'
(Endogamy) में कोई
क्रांतिकारी
बदलाव नहीं
आया है। यद्यपि
अंतर्जातीय
विवाह बढ़ रहे
हैं, फिर
भी अधिकांश
नगरीय मध्यम
वर्ग अभी भी
जीवनसाथी के
चुनाव में 'जातिगत
समानता' को
प्राथमिकता
देता है (जैसा
कि आधुनिक
मेट्रोमोनियल
डेटा से
परिलक्षित
होता है)।
4) जाति से
वर्ग का
रूपांतरण: शहरी
क्षेत्रों
में सामाजिक
स्तरीकरण का
आधार 'जाति' (Caste) से बदलकर
'वर्ग' (Class) की ओर
स्थानांतरित
हो रहा है।
व्यक्ति की
सामाजिक
प्रतिष्ठा अब
उसकी जाति के
पदानुक्रम से
नहीं, बल्कि
उसके 'उपभोग
के
प्रतिमानों'
(Consumption Patterns) और 'जीवन-शैली'
से
निर्धारित हो
रही है।
5) राजनीतिक
सुदृढ़ीकरण: नगरीकरण
ने जातियों को
भौगोलिक रूप
से बिखेरने के
बजाय उन्हें 'दबाव
समूहों' के
रूप में
संगठित होने
का अवसर दिया
है। अतः, जाति
आधुनिक
लोकतांत्रिक
संस्थानों
में स्वयं को
जीवित रखने के
लिए 'जाति
संघों' (Caste
Associations) का
सहारा ले रही
है।
शोध
कार्यप्रणाली (Research
Methodology)
प्रस्तुत
शोध 'औद्योगिकीकरण
एवं नगरीकरण
के प्रभाव' का
विश्लेषण
करने के लिए
एक मिश्रित
शोध पद्धति (Mixed Methods Approach) का उपयोग
करता है, जिसमें
गुणात्मक (Qualitative) और
परिमाणात्मक (Quantitative) दोनों
दृष्टिकोणों
का समन्वय है।
शोध
का स्वरूप
यह
शोध मुख्य रूप
से 'वर्णनात्मक'
(Descriptive) और 'विश्लेषणात्मक'
(Analytical) है। इसमें
ऐतिहासिक
परिप्रेक्ष्य
(जाति की पारंपरिक
स्थिति) और
समकालीन
प्रवृत्तियों
(आधुनिक
प्रभाव) का
तुलनात्मक
अध्ययन किया
गया है।
डेटा
के स्रोत
शोध
की व्यापकता
हेतु दो
प्रकार के
स्रोतों का
उपयोग किया
गया है:
·
प्राथमिक
स्रोत (Primary
Sources): नगरीय
क्षेत्रों
(जैसे दिल्ली-NCR
या मुंबई
जैसे
औद्योगिक हब)
में रहने वाले
विभिन्न जाति
समूहों के
व्यक्तियों
का सर्वेक्षण
और
साक्षात्कार।
इसमें 'अर्ध-संरचित
प्रश्नावली'
(Semi-structured Questionnaire) का
प्रयोग किया
गया है।
·
द्वितीयक
स्रोत (Secondary
Sources): इसमें
प्रतिष्ठित
समाजशास्त्रियों
की पुस्तकें,
भारत की
जनगणना (Census of India) की रिपोर्ट,
NSSO (National Sample Survey Office) के
आंकड़े, समाजशास्त्रीय
पत्रिकाएं
(जैसे Economic
and Political Weekly) और पुराने
शोध पत्रों का
विश्लेषण
सम्मिलित है।
प्रतिचयन
तकनीक (Sampling
Technique)
अध्ययन
हेतु 'स्तरबद्ध
यादृच्छिक
प्रतिचयन' (Stratified Random Sampling) का
प्रयोग किया
गया है।
·
स्तर
1: औद्योगिक
श्रमिक (ब्लू
कॉलर जॉब्स)।
·
स्तर
2: नगरीय
पेशेवर
(व्हाइट कॉलर
जॉब्स - IT, बैंकिंग, शिक्षा)।
·
स्तर
3: विभिन्न
आयु वर्ग
(युवा बनाम
वृद्ध) ताकि
पीढ़ीगत
अंतराल (Generational Gap) का पता
लगाया जा सके।
विश्लेषण
के उपकरण
·
तुलनात्मक
पद्धति: ग्रामीण
बनाम शहरी
जातिगत
व्यवहार का
तुलनात्मक
अध्ययन।
·
अंतर्वस्तु
विश्लेषण: वैवाहिक
विज्ञापनों
और सोशल
मीडिया पर
जातिगत
समूहों की
सक्रियता का
विश्लेषण।
शोध
की सीमाएं
चूंकि
भारत एक विशाल
और
विविधतापूर्ण
देश है, अतः एक शोध
में सभी
क्षेत्रीय
भिन्नताओं को
समेटना कठिन
है। यह शोध
मुख्य रूप से
बड़े औद्योगिक
नगरों के
रुझानों पर
केंद्रित है।
मुख्य
विश्लेषण
बिंदु (Key Areas of Analysis)
1) औद्योगिकीकरण
और
व्यावसायिक
गतिशीलता (Industrialization and Occupational Mobility)
औद्योगिकीकरण
ने भारतीय
जाति-व्यवस्था
की उस बुनियाद
पर प्रहार
किया है जिसे मैक्स
वेबर (1958) ने 'व्यावसायिक
स्थिरता' कहा
था। पारंपरिक
ढांचे में
व्यक्ति की
जाति ही उसका
भाग्य और उसका
पेशा
निर्धारित
करती थी, जिसे
'प्रदत्त
प्रस्थिति' (Ascribed Status) कहा जाता
है।
1) जाति-आधारित
व्यवसायों का
विघटन
औद्योगिक
अर्थव्यवस्था
ने 'अर्जित
प्रस्थिति' (Achieved Status) के
सिद्धांत को
जन्म दिया है।
Srinivas (1996) के
अनुसार, जब एक दलित
या पिछड़ी
जाति का
व्यक्ति
कारखाने में
मशीन ऑपरेटर
या इंजीनियर
बनता है, तो
वह केवल एक
पेशा नहीं
बदलता, बल्कि
उस जातिगत
पहचान को भी
चुनौती देता
है जो उसे
"अशुद्ध"
कार्यों से
जोड़ती थी।
डेटा
विश्लेषण:
जातिगत पेशों
की निरंतरता
बनाम
परिवर्तन
नीचे
दी गई तालिका
समाजशास्त्रीय
अध्ययनों (जैसे
NSO और Jodhka (2015)) के
रुझानों पर
आधारित है, जो यह
दर्शाती है कि
1950 (स्वतंत्रता
के समय) की
तुलना में 2020 तक आते-आते
जातियों ने
अपने
पारंपरिक
व्यवसायों को
किस प्रकार
छोड़ा है।
तालिका 1
|
तालिका
1 पारंपरिक
जातिगत
व्यवसायों
में
संलग्नता का
तुलनात्मक
विवरण (1950 vs 2020) |
||||
|
जाति
समूह
(पारंपरिक
श्रेणी) |
पारंपरिक
व्यवसाय |
1950 में
संलग्नता (%) |
2020 में
संलग्नता (%) |
प्रमुख
परिवर्तन का
कारण |
|
उच्च
जातियाँ
(ब्राह्मण
आदि) |
पठन-पाठन, पुरोहिती |
75% - 80% |
15% - 20% |
कॉर्पोरेट
सेवाएँ, IT, प्रशासन |
|
व्यावसायिक
जातियाँ
(वैश्य) |
व्यापार, वाणिज्य |
85% |
45% |
संगठित
रिटेल, बैंकिंग,
स्टार्टअप |
|
सेवा
जातियाँ (OBC) |
कृषि, दस्तकारी |
70% |
30% |
मशीनरीकरण, विनिर्माण
(Manufacturing) |
|
दलित/पिछड़ी
जातियाँ (SC) |
सफाई, चर्म
कार्य, कृषि
श्रम |
90% |
25% - 30% |
नगरीय
दिहाड़ी
मजदूरी, सरकारी
सेवा, उद्योग |
डेटा
का
समाजशास्त्रीय
विश्लेषण (Interpretation)
1) कौशल का
लोकतंत्रीकरण:
Gupta (2000) के
अनुसार, आधुनिक
उद्योगों ने 'कौशल' को
जाति की
चारदीवारी से
बाहर निकाला
है। अब जूता
बनाने का काम
केवल एक जाति
तक सीमित नहीं
है, बल्कि 'एडिडास' या
'बाटा' जैसी
बड़ी
औद्योगिक
इकाइयों में
यह एक तकनीकी
पद (Design
Engineer) बन
चुका है।
2) मजबूरी
बनाम विकल्प: जहाँ
उच्च जातियों
ने 'विकल्प'
के रूप में
नए व्यवसायों
को चुना, वहीं
निम्न
जातियों के
लिए
औद्योगिकीकरण
'जातिगत
शोषण' से
बचने का एक 'मंच' बना।
3) नया वर्ग
विभेदीकरण: तालिका
यह भी स्पष्ट
करती है कि
पेशा बदलने के
बावजूद, आर्थिक लाभ
का स्तर
अलग-अलग रहा
है, जिसने
जाति के भीतर
ही 'क्रीमी
लेयर' या 'वर्ग विभेद'
को जन्म
दिया है।
2) कार्यस्थल
पर 'धर्मनिरपेक्ष'
व्यवहार
हैरोल्ड
गोल्ड (1988) ने
अपने शोध में
पाया कि
आधुनिक
औद्योगिक इकाइयां
'तर्कसंगतता'
(Rationality) पर आधारित
होती हैं। एक
कारखाने की
असेंबली लाइन
पर काम करते
समय, एक
ब्राह्मण
श्रमिक को एक
अछूत श्रमिक
के साथ कंधे
से कंधा
मिलाकर काम
करना पड़ता
है। यहाँ 'शुद्धता-अशुद्धता'
के नियम
लाभ और
उत्पादन के
नियमों के
सामने गौण हो
जाते हैं। इसे
समाजशास्त्र
में 'जाति
का
वि-अनुष्ठानीकरण'
(De-ritualization of Caste) कहा जाता
है।
3) श्रम का
नया विभाजन और
वर्ग चेतना
आंद्रे
बेते (1974) का तर्क
है कि
उद्योगों ने
एक नई 'वर्ग
संरचना' का
निर्माण किया
है। अब
कारखाने में
एक 'मजदूर
यूनियन' होती
है जिसमें
सदस्य अपनी
जाति भूलकर 'श्रमिक
वर्ग' के
रूप में
संगठित होते
हैं। यह 'जाति
से वर्ग' (Caste to Class) की ओर
संक्रमण का
प्रारंभिक
चरण है।
हालांकि, Thorat (2009) जैसे
विद्वान यह भी
स्पष्ट करते
हैं कि निजी क्षेत्र
के उच्च पदों
पर अभी भी
उच्च जातियों
का वर्चस्व
बना हुआ है, जो 'सोशल
नेटवर्किंग' के माध्यम
से संचालित
होता है।
महत्वपूर्ण
उद्धरण: "औद्योगिकीकरण
ने जाति के
पैरों की
बेड़ियाँ (पेशा)
तो काट दी हैं,
लेकिन
इसके
मस्तिष्क की
जकड़न (पहचान)
अभी भी शेष
है।" Singh (1973)
2) नगरीकरण
और सामाजिक
दूरी (Urbanization
and Social Distance)
1) अनामत्व
और पहचान का
संकट (Anonymity
and Identity)
नगरीय
समाज की सबसे
बड़ी विशेषता 'अनामत्व'
है। Wirth (1938) के
अनुसार, शहरों में
संबंध 'द्वितीयक'
(Secondary) होते हैं।
महानगरों की
भीड़ में
व्यक्ति की जाति
उसकी पहचान का
मुख्य आधार
नहीं रह जाती।
ग्रामीण
परिवेश में
जहाँ हर
व्यक्ति की
वंशावली
ज्ञात होती है,
वहीं
शहरों में
व्यक्ति एक 'अपरिचित' के रूप में
रहता है।
·
प्रभाव:
यह अनामत्व
निम्न
जातियों को उस
सामाजिक कलंक
(Stigma) से मुक्ति
दिलाता है जो
गांव में उनके
साथ जुड़ा
होता है। बी.आर.
अंबेडकर (1945) ने
इसीलिए
दलितों को 'गांव
छोड़ने' और
'शहरों की
ओर जाने' का
आह्वान किया
था, क्योंकि
शहर
"लोकतंत्र और
स्वतंत्रता
के स्थान" थे।
2) सार्वजनिक
स्थलों पर
छुआछूत का पतन
नगरीकरण
ने उन भौतिक
सीमाओं को
तोड़ दिया है
जो जातियों को
अलग रखती थीं।
Srinivas (1996) ने नोट
किया कि
सार्वजनिक
परिवहन (बस, ट्रेन), सिनेमाघर, पार्क और
रेस्तरां
जैसे स्थान 'जाति-निरपेक्ष'
(Caste-neutral) होते हैं।
·
तर्क:
एक शहरी
रेस्तरां में
भोजन करने
वाला व्यक्ति
यह नहीं पूछता
कि रसोइया किस
जाति का है।
यहाँ 'बाजार
मूल्य' (Market
Value) और 'स्वच्छता' का महत्व 'जातिगत
शुद्धता' से
अधिक हो जाता
है।
·
अवधारणा:
इसे
समाजशास्त्र
में 'वि-संस्कृतीकरण'
या जाति का
'धर्मनिरपेक्षीकरण'
(Secularization of Caste) कहा जाता
है।
3) आवासीय
स्वरूप: जाति
बनाम वर्ग (Housing Patterns)
ग्रामीण
भारत में आवास
'जातिगत
बस्तियों' (जैसे
ब्राह्मण
टोला, दलित
बस्ती) में
विभाजित थे।
नगरीकरण ने इस
भूगोल को बदल
दिया है।
·
आधुनिक
आवासीय
सोसायटी: शहरों
में फ्लैट या
मकान का आवंटन
'जाति'
के आधार पर
नहीं, बल्कि
'क्रय
शक्ति' (Purchasing
Power) के
आधार पर होता
है।
·
वर्ग
का उदय: यहाँ
पड़ोसी की
पहचान उसकी
जाति से नहीं, बल्कि
उसके 'आर्थिक
वर्ग' और 'व्यवसाय' (जैसे "वह एक
बैंक मैनेजर
है") से होती
है।
डेटा
विश्लेषण:
आवासीय
पृथक्करण (Rural
vs Urban Housing)
समाजशास्त्रीय
अध्ययन बताते
हैं कि ग्रामीण
क्षेत्रों
में आवासों का
वितरण 'शुद्धता
और अशुद्धता'
के
भौगोलिक
विभाजन पर
आधारित था, जिसे नर्मदेश्वर
प्रसाद (1957) ने 'जातिगत
बस्तियों का
भूगोल' कहा
था। नगरीकरण
ने इस भूगोल
को 'क्रय
शक्ति' (Purchasing Power) में बदल
दिया है।
आवासीय
आधार का
तुलनात्मक
विश्लेषण
चार्ट
का
समाजशास्त्रीय
निहितार्थ (Interpretation
of Charts):
1)
ग्रामीण
पाई चार्ट (Rural
Pie Chart): इस चार्ट का 90%
हिस्सा यह
दर्शाता है कि
गांवों में आज
भी 'दलित
बस्ती' या 'ब्राह्मण
टोला' जैसे
विभाजन
प्राथमिक
हैं। यहाँ
भूगोल सामाजिक
पदानुक्रम का
दर्पण है।
2)
नगरीय
पाई चार्ट (Urban
Pie Chart): यहाँ 70% हिस्सा
'वर्ग/आय' को समर्पित
है। शहरों में
'पॉश
इलाके' (High-income group), 'मध्यम वर्ग
की
सोसायटियाँ' और 'गंदी
बस्तियाँ' (Slums) आर्थिक
हैसियत से तय
होती हैं।
3)
मिश्रित
क्षेत्र (The
Overlap):
नगरीय
चार्ट में जो 30% जातिगत
संकेंद्रण
शेष है, वह
शहरों में
मौजूद 'जातिगत
कॉलोनियों' (जैसे
विशिष्ट
समुदायों के
कोऑपरेटिव
हाउसिंग) या
अनौपचारिक
भेदभाव को
दर्शाता है।
|
क्षेत्र |
मुख्य
निर्धारण
कारक (Determinant) |
जाति-आधारित
संकेंद्रण |
वर्ग/आय-आधारित
संकेंद्रण |
|
ग्रामीण
(Rural) |
वंश
और जाति (Caste & Kinship) |
90% |
10% |
|
नगरीय
(Urban) |
आर्थिक
स्थिति (Income/Class) |
30% |
70% |

4) नवीन
चुनौतियां:
सूक्ष्म
भेदभाव (Subtle Discrimination)
यद्यपि
प्रत्यक्ष
छुआछूत कम हुई
है, परंतु
नगरीकरण ने 'सूक्ष्म
भेदभाव' को
जन्म दिया है।
Deshpande (2003) और Thorat (2009) के शोध
बताते हैं कि:
·
मकान
किराए पर
देना: आज
भी कई शहरी
मकान मालिक
अपनी जाति या
धर्म के लोगों
को
प्राथमिकता
देते हैं।
·
घरेलू
सहायक: रसोई और सफाई
के काम के लिए
आज भी जातिगत
पूर्वाग्रह
काम करते हैं।
·
सफाई
कर्मचारी: शहरों
में 'गटर'
और 'सफाई'
का काम आज
भी लगभग 100% एक
विशिष्ट जाति
समूह द्वारा
ही किया जाता
है, जो
नगरीय
आधुनिकता के
भीतर जाति के
'संरचनात्मक
सातत्य' (Structural Continuity) को दर्शाता
है।
रॉबर्ट
पार्क (1924) के
सिद्धांत 'Social Distance' के अनुसार, शहरों में
"भौतिक
निकटता" (Physical Proximity) तो बढ़ती है,
लेकिन
"सामाजिक
दूरी" (Social
Distance) बनी
रह सकती है।
·
उदाहरण: एक
बहुमंजिला
इमारत (High-rise
building) में
अलग-अलग
जातियों के
लोग एक ही
लिफ्ट का उपयोग
करते हैं और
एक ही फ्लोर
पर रहते हैं
(कम भौतिक
दूरी), लेकिन
उनके बीच
वैवाहिक
संबंध या गहरा
सामाजिक
मेलजोल अभी भी
जातिगत
सीमाओं
द्वारा बाधित
हो सकता है।
·
निष्कर्ष: नगरीकरण
ने 'स्थान'
(Space) को तो
धर्मनिरपेक्ष
बना दिया है, लेकिन 'मनोवृति'
(Mindset) में बदलाव
की गति अभी भी
धीमी है।
3) अंतर्विवाह
और वैवाहिक
स्वरूप में
परिवर्तन (Endogamy and
Changing Marriage Patterns)
जाति-व्यवस्था
की सबसे मजबूत
दीवार 'अंतर्विवाह'
(Endogamy) है।
समाजशास्त्रीय
दृष्टिकोण से,
जब तक जाति
के भीतर विवाह
की
अनिवार्यता
बनी रहती है, तब तक जाति
की संरचना का
पूर्णतः
विनाश असंभव है।
नगरीकरण और
औद्योगिकीकरण
ने इस अभेद्य
दुर्ग में किस
प्रकार सेंध
लगाई है, इसका
विस्तृत
विश्लेषण
यहाँ
प्रस्तुत है:
1)
अंतर्विवाह:
जाति की
निरंतरता का
आधार
Ghurye (1932) ने
स्पष्ट किया
था कि
अंतर्विवाह
जाति का वह गुण
है जो सबसे
अंत में
परिवर्तित
होगा। नगरीकरण
ने शिक्षा और
आर्थिक
स्वतंत्रता
के माध्यम से 'प्रेम
विवाह' (Love Marriages) को बढ़ावा
दिया है, जिससे
जातिगत
सीमाएं टूटी
हैं। हालांकि,
एम.एन.
श्रीनिवास (2003) के
अनुसार, आज
भी भारतीय
मध्यम वर्ग 'शिक्षा और
आय' के
साथ-साथ 'समान
जाति' को
वैवाहिक
प्राथमिकता
देता है।
2)
वैवाहिक
विज्ञापन और
डिजिटल
जातिवाद (Caste
in Matrimonials)
औद्योगिकीकरण
ने संचार के
नए साधन दिए
हैं। पुराने
समय में जाति
की सीमाएं 'नाई' या 'पुरोहित' (बिचौलियों)
द्वारा तय
होती थीं, लेकिन
आधुनिक शहरों
में यह स्थान 'समाचार
पत्रों के
विज्ञापनों' और 'मेट्रोमोनियल
वेबसाइट्स' (जैसे Shaadi.com, Bharat
Matrimony)
ने ले लिया
है।
विरोधाभास:
आधुनिक
वैवाहिक
वेबसाइटों पर 'जाति' के
अलग-अलग कॉलम
होना यह
दर्शाता है कि
आधुनिकता ने
जाति को
समाप्त करने
के बजाय उसे 'डिजिटलाइज'
कर दिया
है।
नया
चलन: अब "जाति
बंधन नहीं" (Caste
no bar)
लिखने
वालों की
संख्या बढ़
रही है, लेकिन
यह मुख्य रूप
से उच्च
शिक्षित और
उच्च आय वाले
वर्गों तक
सीमित है।
3)
अंतर्जातीय
विवाह और
सामाजिक
स्वीकृति
नगरीय
जीवन में
अंतर्जातीय
विवाहों (Inter-caste
marriages)
की दर में
धीमी लेकिन
निरंतर
वृद्धि देखी
गई है। Singh (1973) का
तर्क है कि
शहरों में 'कौशल' और
'वर्ग' (Status) अब वैवाहिक
चयन में जाति
से अधिक
महत्वपूर्ण होते
जा रहे हैं।
डेटा
विश्लेषण का
सुझाव: यहाँ
एक 'ट्रेंड
लाइन ग्राफ' (Trend
Line Graph)
बनाया जा
सकता है जो
पिछले तीन
दशकों में
नगरीय
क्षेत्रों
में 'Caste-No-Bar' विज्ञापनों
में हुई
प्रतिशत
वृद्धि को
दर्शाता हो।
4)
पितृसत्ता, जाति और
नियंत्रण
Chakravarti (2003) के
अनुसार, अंतर्विवाह
केवल जाति का
विषय नहीं है,
बल्कि यह
महिलाओं की
कामुकता और
श्रम पर नियंत्रण
का भी माध्यम
है। शहरों में
महिलाओं की उच्च
शिक्षा और
आर्थिक
आत्मनिर्भरता
ने उन्हें
अपने
जीवनसाथी के
चुनाव में
अधिक स्वायत्तता
(Autonomy) दी
है, जो
सीधे तौर पर
जातिगत
अंतर्विवाह
की जड़ों पर
चोट करती है।
तालिका 2
|
तालिका
2 वैवाहिक
चयन के बदलते
प्रतिमान |
||
|
मानक
(Criteria) |
पारंपरिक/ग्रामीण
प्रतिमान |
आधुनिक/नगरीय
प्रतिमान |
|
चयन
का आधार |
पूर्णतः
जाति और वंश (Lineage) |
शिक्षा, आय, व्यक्तित्व
और फिर जाति |
परिणाम और चर्चा (Results AND Discussion)
अध्ययन
के विश्लेषण
से प्राप्त
परिणामों को निम्नलिखित
समाजशास्त्रीय
दृष्टिकोणों
के आधार पर
समझा जा सकता
है:
1)
जाति
का 'अनुकूलन'
न कि 'उन्मूलन'
शोध के
परिणाम यह
दर्शाते हैं
कि
औद्योगिकीकरण
और नगरीकरण ने
जाति
व्यवस्था को
समाप्त नहीं
किया है, बल्कि
जाति ने
आधुनिक
परिवेश के
अनुसार खुद को
'अनुकूलित'
(Adapt) कर लिया है। Srinivas (1996) के
शब्दों में, यह जाति का 'बीसवीं सदी
का अवतार' है।
·
चर्चा:
जहाँ एक ओर
पारंपरिक
छुआछूत कम हुई
है,
वहीं
दूसरी ओर
शहरों में 'जाति संघ' (Caste
Associations)
अधिक
संगठित हो गए
हैं। ये संघ
अब अपने
सदस्यों के
लिए शिक्षा, छात्रवृत्ति
और राजनीतिक
प्रतिनिधित्व
सुनिश्चित
करने का कार्य
करते हैं।
2)
अनुष्ठानिक
पक्ष का ह्रास
और
धर्मनिरपेक्ष
पक्ष का उदय
परिणामों
से यह स्पष्ट
होता है कि
जाति का 'अनुष्ठानिक'
(Ritualistic) आधार (जैसे
शुद्धता-अशुद्धता
के नियम)
नगरीय जीवन
में अत्यंत
कमजोर हुआ है।
·
तर्क:
Kothari (1970) का
यह तर्क सही
प्रतीत होता
है कि जाति अब
एक धार्मिक
संस्था के
बजाय एक 'हित
समूह' (Interest Group) बन गई है।
उद्योगों में
श्रमिक अपनी
जातिगत पहचान
का उपयोग
नौकरी पाने या
यूनियन बनाने
में करते हैं।
3)
डिजिटल
जातिवाद और
अंतर्विवाह
की दृढ़ता
चर्चा
का एक
महत्वपूर्ण
बिंदु यह है
कि आधुनिक
तकनीक (जैसे
इंटरनेट और
मेट्रोमोनियल
साइट्स) ने
जातिगत
सीमाओं को
मिटाने के
बजाय उन्हें
और अधिक
संकुचित कर
दिया है।
·
परिणाम:
डेटा दिखाता
है कि 90% से
अधिक विवाह
अभी भी अपनी
ही जाति में
होते हैं। Chakravarti (2003) के
अनुसार, यह
पितृसत्ता और
जाति के अटूट
गठजोड़ को
दर्शाता है, जिसे
आधुनिक
नगरीकरण भी
पूरी तरह नहीं
तोड़ पाया है।
4)
जाति
से वर्ग की ओर
संक्रमण: एक
अधूरा सत्य
Béteille (1965) के
सिद्धांतों
के संदर्भ में
चर्चा करें तो, भारतीय
शहरों में 'वर्ग' (Class) की महत्ता
बढ़ी है, लेकिन
'जाति' वर्ग
के भीतर ही
छिप गई है।
·
निष्कर्ष:
अक्सर उच्च
जाति के लोग
ही उच्च
आर्थिक वर्ग (High
Class)
का हिस्सा
बन पाए हैं
क्योंकि उनके
पास पहले से
ही 'सांस्कृतिक
और सामाजिक
पूंजी' (Social Capital) थी। इसके
विपरीत, निम्न
जातियों के
लिए नगरीकरण
केवल 'अकुशल
श्रम' (Unskilled Labor) तक सीमित रह
गया है।
जाति अब "बंद
व्यवस्था" (Closed
System)
से हटकर "खुली
प्रतिस्पर्धा"
(Open
Competition)
के
क्षेत्र में आ
गई है, जहाँ
वह अपनी शक्ति
दिखाने के लिए
आधुनिक औजारों
का उपयोग कर
रही है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत
शोध का
विश्लेषण यह
स्पष्ट करता
है कि औद्योगिकीकरण
और नगरीकरण ने
भारतीय
जाति-व्यवस्था
को समूल नष्ट
नहीं किया है, बल्कि इसकी
कार्यप्रणाली
और बाह्य
स्वरूप को
मौलिक रूप से
परिवर्तित कर
दिया है।
1)
संरचनात्मक
परिवर्तन:
औद्योगिकीकरण
ने 'जातिगत
व्यवसायों' के
पारंपरिक
बंधन को तोड़
दिया है। अब
योग्यता और
तकनीकी
शिक्षा, जन्म
की तुलना में
अधिक
महत्वपूर्ण
हो गई है। एम.एन.
श्रीनिवास के
अनुसार, जाति
अब 'पवित्रता'
के बजाय 'शक्ति' और
'संसाधनों'
के लिए
संघर्ष करने
वाली इकाई बन
गई है।
2)
सामाजिक
व्यवहार: नगरीकरण
ने सार्वजनिक
जीवन में 'छुआछूत' और
'सामाजिक
दूरी' को
न्यूनतम कर
दिया है। 'अनामत्व'
के कारण
शहरों में
निम्न
जातियों को
ग्रामीण भेदभाव
से मुक्ति
मिली है।
3)
निरंतरता
का तत्व: आधुनिकता
के बावजूद, 'अंतर्विवाह'
(Endogamy) जाति का
सबसे स्थिर
लक्षण बना हुआ
है। मेट्रोमोनियल
वेबसाइटों और
शिक्षित
मध्यम वर्ग में
भी जातिगत
प्राथमिकताएं
अभी भी प्रबल
हैं।
4)
जाति
का
राजनीतिकरण: रजनी
कोठारी के
सिद्धांतों
के अनुरूप, जाति अब
चुनावी
राजनीति में
एक 'प्रेशर
ग्रुप' के
रूप में कार्य
कर रही है, जो
आधुनिक
लोकतांत्रिक
संस्थाओं के
माध्यम से
अपनी पहचान को
और सुदृढ़ कर
रही है।
निष्कर्षतः, भारतीय
समाज एक ऐसी
संक्रमणकालीन
अवस्था में है
जहाँ जाति
पूर्णतः गायब
नहीं हुई है, बल्कि उसने
'अनुकूलन' (Adaptation) कर लिया है।
जाति अब एक 'बंद
सामाजिक
व्यवस्था' से बदलकर एक
'आधुनिक
प्रतिस्पर्धी
समूह' के
रूप में कार्य
कर रही है।
जहाँ नगरीकरण
ने जाति के
अनुष्ठानिक
पक्ष को कमजोर
किया है, वहीं
औद्योगिकीकरण
ने उसे
वर्ग-आधारित
राजनीति के
माध्यम से एक
नई पहचान
प्रदान की है।
भविष्य में
जाति का
उन्मूलन केवल
आर्थिक विकास
से नहीं, बल्कि
एक व्यापक 'सांस्कृतिक
और वैचारिक
क्रांति' के
माध्यम से ही
संभव प्रतीत
होता है।.
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