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Original Article
ROLE CONFLICT AMONG EDUCATED WORKING WOMEN: A SOCIOLOGICAL STUDY IN THE CONTEXT OF THE HIGHER EDUCATION SECTOR OF DEHRADUN CITY
शिक्षित
कार्यरत
महिलाओं में
भूमिका संघर्षः देहरादून
शहर के उच्च
शिक्षा
क्षेत्र के
संदर्भ में एक
समाजशास्त्रीय
अध्ययन
|
1 Associate Professor,
D.B.S. (P.G.) College, Dehradun, India |
|
|
|
ABSTRACT |
||
|
English: In India, women have made their mark in various fields. However, in India, women's working status has remained intertwined with the family. Working women have to play both the roles of a homemaker and a working professional. They face a conflict between the roles they play as a homemaker and mother on one hand, and as a productive worker on the other. Family responsibilities often overshadow their work. They experience the dilemma of understanding these contradictory roles. This research paper is based on primary and secondary data. The researcher has attempted to examine the role conflict experienced by educated working women regarding their work. Women feel pressured regarding their work. An exploratory and descriptive research design has been used to complete the present study. Role conflict among educated working women remains a major social issue today, primarily stemming from the burden of the "double role" of balancing a professional career with traditional domestic expectations. Despite higher levels of education, women often face conflicting demands, where fulfilling one role (e.g., career professional) makes it difficult to fulfill another (e.g., primary caregiver). Modern society is characterized by women's successful attempts to achieve gender equality in the workplace, which have been made possible through various measures: education, affirmative action, and economic empowerment policies. Yet, a large number of working women struggle to manage the dual roles of both household chores and their jobs. Their working lives are a constant attempt to balance domestic responsibilities and job-related demands – whether they live in rural or urban areas. Hindi: भारत
में महिलाओं
ने अलग-अलग
क्षेत्रों
में अपनी
महत्वपूर्ण
पहचान बनाई
है। लेकिन
भारत में,
महिलाओं
की कामकाजी
प्रस्थिति
परिवार से जुड़ी
रही है।
नौकरी करने
से महिलाओं
को गृहिणी और
कामकाजी
महिला, दोनों
तरह की
भूमिका
निभानी पड़ती
है। उन्हें गृहिणी
और माँ के तौर
पर और दूसरी
तरफ प्रोडक्टिव
वर्कर के तौर
पर निभाई
जाने वाली
भूमिकाओं के
बीच टकराव का
सामना करना
पड़ता है।
परिवार की
जिम्मेदारियाँ
उनके काम पर
हावी हो जाती
हैं। उन्हें
विरोधाभासी
भूमिकाओं की
समझ की दुविधा
का अनुभव
होता है। यह
रिसर्च पेपर
प्राथमिक और
द्वितीयक
तथ्यों पर
आधारित है।
शोधकर्ता ने
काम करने
वाली
शिक्षित
महिलाओं में
उनके काम को
लेकर भूमिका
संघर्ष को
देखने की कोशिश
की है।
महिलाओं को
अपने काम को
लेकर दबाव महसूस
होता है।
प्रस्तुत
अध्ययन को पूरा
करने के लिए
अन्वेषणात्मक
तथा
व्याख्यात्मक
शोध प्रारूप
का उपयोग
किया गया है।
आज पढ़ी-लिखी
कामकाजी
महिलाओं के
बीच भूमिका
संघर्ष एक
प्रमुख
सामाजिक
मुद्दा बना
हुआ है,
जो
मुख्य रूप से
प्रोफेशनल
करियर और
पारंपरिक
घरेलू
उम्मीदों के
बीच संतुलन
बनाने के “दोहरी
भूमिका“ के
बोझ से पैदा
होता है।
उच्च शिक्षा
के स्तर के
बावजूद,
महिलाओं
को अक्सर ऐसी
मांगों का
सामना करना पड़ता
है जो
एक-दूसरे से
मेल नहीं
खातीं, जहाँ
एक भूमिका
(जैसे, करियर
प्रोफेशनल)
को पूरा करने
से दूसरी
भूमिका (जैसे,
प्राथमिक
देखभाल करने
वाली) को पूरा
करना
मुश्किल हो
जाता है।
आधुनिक,
समाज
की पहचान
महिलाओं
द्वारा
नौकरियों
में लैंगिक
समानता
हासिल करने
की सफल
कोशिशों से होती
है, जो
कई तरह के
उपायों से
संभव हुई
हैंः शिक्षा,
सकारात्मक
कार्रवाई और
आर्थिक
सशक्तिकरण नीतियां।
फिर भी,
बड़ी
संख्या में
कामकाजी
महिलाओं को
घर के काम और
नौकरी, दोनों
की दोहरी
भूमिका
निभाने में
संघर्ष करना
पड़ता है।
उनकी
कामकाजी
ज़िंदगी
घरेलू कामों
और नौकरी से
जुड़ी
ज़रूरतों के
बीच संतुलन
बनाने की
लगातार
कोशिश होती
है - चाहे वे
ग्रामीण हों
या शहरी। Keywords: Role Conflict, Role
Status of Educated Working Women, Economic Perspective भूमिका
संघर्ष, शिक्षित
कामकाजी
महिलाओं की
भूमिका की
स्थिति, आर्थिक
दृष्टिकोण |
||
प्रस्तावना
आज
भारत में
महिलाओं ने
अलग-अलग
क्षेत्रों में
अपनी
महत्वपूर्ण
उपस्थिति
दर्ज कराई है।
भारत में
महिलाओं को
शक्ति, प्रतिष्ठा
और सम्मान का
दर्जा दिया
गया है। समकालीन
समाज में
भारतीय
महिलाओं का
महत्व और भी
बढ़ गया है।
जहाँ कुछ समय
पहले तक वे
दृढ़ पितृसत्तात्मक
वर्चस्व की
छाया में थीं,
वहीं आज
भारत की
समकालीन
महिलाएँ सभी
सामाजिक
बाधाओं एवं
सीमाओं को पार
करते हुए
भविष्य की
नेता के रूप
में उभर रही
हैं।
उन्होंने न केवल
समाज में
साहसी
भूमिकाएँ
निभाई हैं,
बल्कि एक
’महिला’ के रूप
में अपनी
पहचान को एक बेहतर
अर्थ भी दिया
है,
आज वे
कार्य/व्यवसाय
के प्रत्येक
क्षेत्र में
योगदान दे रही
हैं और आय
अर्जित करके
आत्मनिर्भर
भी बन रही हैं
एवं अपनी
भूमिका को
सशक्त बना रही
हैं।साथ ही
परिवार स्तर
पर वित्तीय सहायता
भी प्रदान कर
रही हैं।
वैश्वीकरण
के प्रभाव तथा
आर्थिक
स्वाधीनता आने
से सामाजिक
सोच में बदलाव
आया है और
समाज में
प्रचलित
व्यवहार, नियम और
मूल्य
प्रणाली में
भी परिवर्तन
आया है।
औपचारिक
क्षेत्र में
काम करने वाली
महिलाओं के
प्रति समाज के
रवैये में भी
बदलाव देखा जा
रहा है। नगर
एवं गांव
दोनों ही
स्थलों पर महिलाएं
घर की
चारदिवारी से
बाहर निकल कर
काम करने जा
रही है एवं
इनकी संख्या
में भी निरंतर
वृद्धि हो रही
है। कैटलिस्ट
रिपोर्ट 2020 ने
अपनेप्रत्यावेदन
में बताया कि
भारत में कुल
श्रम शक्ति
में महिलाओं
की भागीदारी 19.9%है।
सरकार द्वारा
किए गए रोज़गार
सर्वे 2021 के
अनुसार, संगठित
क्षेत्र में
रोज़गार में
पुरुषों की भागीदारी
70.7%है और
महिलाओं की 20%।
महिलाओं को
औपचारिक
कार्यस्थलों
से जोड़ने के
लिए
व्यक्तिगत
स्तर पर,
समूह स्तर
पर और सरकारी
स्तर पर
प्रयास भी किए
जा रहे हैं।
महिलाओं को घर,
परिवार और
बाहरी
कार्यस्थल पर
अलग-अलग भूमिकाओं
में देखा जा
सकता है।
महिलाएं
नौकरी क्यों
करती हैं?
महिलाओं
में काम करने
की प्रेरणा
पुरुषों से अलग
होती है।
हालांकि
मुख्य कारण
’पैसे की ज़रूरत’
लगता है, लेकिन यह
कहना गलत होगा
कि,
सभी
महिलाएं
सिर्फ़ इसी
उद्देश्य से
नौकरी करती
हैं। काम करने
वाली महिलाओं
पर एक अध्ययन
के आधार पर,
नौकरी
ढूंढने के
महत्वपूर्ण
कारण बताए गए
हैंः पति की
कम सैलरी,
पति की
मौत, पति
की बीमारी,
पति का
सहयोग न करना,
पति का
छोड़ देना,
और घर के
बाहर काम करने
की इच्छा।
मोटे तौर पर,
ज़्यादातर
महिलाएं कम
आर्थिक ज़रूरत
के कारण काम
करती पाई गईं।
1989 में
जयपुर
(राजस्थान)
में काम करने
वाली महिलाओं
पर दीपा माथुर
के एक अध्ययन
में महिलाओं के
रोज़गार में छह
प्रेरणादायक
कारकों की
पहचान की गईः
आर्थिक ज़रूरत
या कम
पारिवारिक आय
को बढ़ाना,
भविष्य की
आकस्मिकताओं
के खिलाफ
सुरक्षा, जीवन स्तर
में सुधार,
बोरियत से
बचना या
सामाजिक
जुड़ाव, आत्म-सम्मान
और
आत्म-पूर्ति।
राल्फ
लिंटन, (1936)-
भूमिका
स्थिति का
गतिशील पहलू
है। भूमिका वह
तरीका है
जिससे कोई
व्यक्ति अपनी
स्थिति की ज़रूरतों
को पूरा करता
है। लेकिन
इतनी सारी उपलब्धियों
के बाद भी,
समाज में
महिलाओं से की
जाने वाली
पुरानी उम्मीदों
में कोई बदलाव
नहीं आया है।
प्रो. आर. के. मर्टन
ने कहा - एक
व्यक्ति एक
खास सामाजिक
स्थिति से
बंधा होता है,
जिसमें
खास पदों पर
बैठे लोगों से
अनगिनत उम्मीदें
की जाती हैं,
जिसके
कारण यह
स्वाभाविक है
कि भूमिका
संघर्ष या
तनाव की
स्थिति पैदा
होती है।
कार्यरत महिलाएं
संघर्ष की
स्थिति का
सामना कर रही
हैं, वे
घर और
कार्यस्थल से
संबंधित
भूमिकाओं को किस
हद तक ठीक से
निभा रही हैं;
उन्हें
भूमिका तनाव
और भूमिका
संघर्ष की स्थिति
का सामना करने
के लिए मजबूर
होना पड़ता है।
कार्यरत
महिलाओं के
सामने
बहुआयामी
स्थिति और
उनसे संबंधित
भूमिका
अपेक्षाओं
में वृद्धि के
कारण, असंगति और
आपसी विरोध के
कारण भूमिका
संघर्ष की
स्थितियाँ
उत्पन्न होती
हैं, जो
कार्यरत
महिलाओं में
अवसाद, तनाव,
असामंजस्य
और मानसिक
संघर्ष की ओर
धकेलती हैं।
परिवार के
सदस्य एक
कार्यरत
महिला से घरेलू
स्तर पर
पारंपरिक
भूमिकाओं की
उम्मीद करते हैं,
जो भूमिका
संघर्ष का
मुख्य कारण
है। यदि
परिवार के
सदस्यों का एक
कार्यरत
महिला की
जिम्मेदारियों
के प्रति
सहयोगात्मक
रवैया है,
तो परिवार
में भूमिका
संघर्ष की
स्थिति को कम किया
जा सकता है।
एक ओर, रोजगार के
कारण कार्यरत
महिलाओं को
मानसिक संतुष्टि,
आत्मविश्वास,
व्यक्तित्व
विकास और
वित्तीय
स्वतंत्रता के
अवसर मिलते
हैं, दूसरी
ओर,
घरेलू काम
में तनाव,
व्यवसाय
में तनाव,
दोहरे
कार्यभार के
कारण, उन्हें
दोहरे स्तर पर
भूमिका
निभानी पड़ती
है। परिवार की
अपेक्षाओं के
लिए, सदस्यों
के नकारात्मक
रवैये के रूप
में कीमत चुकानी
पड़ती है।
कार्यरत
महिलाओं के
संदर्भ में,
समाज में
आधुनिकीकरण
के कारण नए
मूल्यों, विश्वासों,
मान्यताओं
और नए
व्यवहारों और
प्रतिबंधों के
कारण भूमिका
संघर्ष अपने
उच्च स्तर पर
दिखाई देता
है।
एक
तरफ, समाज
में पुरानी
मान्यताएं और
उनके अनुसार व्यवहार
करने के तय
तरीके हैं,
वहीं
दूसरी तरफ,
समाज की
ज़रूरतें बदल
रही हैं और
परिस्थिति के अनुसार
से नए व्यवहार
की भी मांग
है। बदलती सामाजिक
उम्मीदों की
वजह से
कार्यरत
महिलाओं के
सामने भूमिका
संघर्ष की
स्थिति पैदा
हो जाती है।
साहित्य
की समीक्षा
संघर्ष
के बीच
महिलाओं को
सशक्त बनाने
में कार्यरत
महिलाओं की
भूमिका पर
अपने अध्ययन
में, उन्होंने
पाया कि अगर
महिलाएं काम
करती हैं,
तो उन्हें
खुद फायदा
होता है और वे
आर्थिक रूप से
अपने
पारिवारिक
जीवन को भी
बेहतर बनाती
हैं। जिससे
पुरुषों की
चिंताएं थोड़ी
कम हो जाती हैं।
लेकिन
पुरुषों को भी
उसी तरह से
भाग लेना
चाहिए जैसे
महिलाओं को
आर्थिक रूप से
पुरुषों के
साथ साझेदारी
करनी चाहिए।
इसी तरह, पुरुषों
को भी हर काम
में भाग लेना
चाहिए ताकि
दोनों का जीवन
आसान हो सके।
कलारानी
नेकार्यरत
महिलाओं के
काम और परिवार
के बीच तालमेल
और काम से आने
वाली
चुनौतियों पर
विचार किया।
उनकेअध्ययन
से यह परिणाम
निकला कि कुल
उत्तर देने
वालों में से 30.7 प्रतिशत
महिलाएं काम
करने के बाद
भी अपने लिए
काफी समय
निकाल पाती
हैं। काम पर
तनाव का मुख्य
कारण अपने
वरिष्ठों के
साथ अच्छे
रिश्तों की
कमी है। 57.0 प्रतिशत
उत्तर देने
वालीमहिलाएं
अलग-अलग मनोरंजन
की
गतिविधियों
में शामिल
होकर काम से होने
वाले तनाव को
कम करती हैं।
अपनी पुस्तक
वर्किंग वुमन
में, उन्होंने
महिलाओं की
ज़िंदगी से
जुड़ी मुश्किलों
जैसे विकलांगता,
तलाक,
परिवार के
सदस्यों के
काम और हिंसा,
धार्मिक
भक्ति, जाति से
जुड़ी अलग-अलग
तरह की
रुकावटें,
वर्ग से
जुड़े मतभेदों
पर चर्चा की
है।
एक
कार्यरत
महिला को
अनगिनत
समस्याओं का
सामना करना
पड़ता है। घर
की ज़िंदगी को कार्यालयिकाय
के साथ
समायोजित
करना पड़ता है।
घर के काम को पारंपरिक
तरीकों से अलग
तरीके से
व्यवस्थित करना
पड़ता है।
समायोजन को एक
आयामी पैमाने
पर मापा जाता
है। किसी
व्यक्ति की
स्थिति को इस
पैमाने पर
सबसे ऊँचे
बिंदु से लेकर
सबसे निचले बिंदु
तक देखा जा
सकता है। कम
समायोजन को
कुसमायोजन से
अलग किया जाता
है क्योंकि ये
दोनों गुणात्मक
रूप से
एक-दूसरे से
अलग हैं।
कुसमायोजन
में
व्याधिकीय
प्रतिक्रियाएँ
शामिल होती हैं,
लेकिन कम
समायोजन
स्थितियों में
अधूरा जुड़ाव
दिखाता है।
’घर का
समायोजन ’ और ’जॉब
का समायोजन’
में
मूल्यांकन के
अलग-अलग मापदंड
शामिल हैं।
कार्यरत
महिलाओं के
मामले में,
आम तौर पर
यह पाया जाता
है कि घर के
समायोजन की तुलना
में जॉब के
समायोजन में
उच्चसमायोजन
की डिग्री
ज़्यादा होती
है।
अनुसंधान
उद्देश्य
1)
कार्यस्थल
पर कार्यरत
महिलाओं की
सामाजिक स्थिति
और भूमिका की
अन्तःक्रिया
का प्रभाव जानना।
2)
कार्यस्थल
पर कार्यरत
महिलाओं की
आर्थिक स्थिति
और भूमिका के
आपसी संबंध का
प्रभाव जानना।
अध्ययन
क्षेत्र और
अनुसंधान
पद्धति
प्रस्तुत
अध्ययन
क्षेत्र में,
देहरादून
जिले के
देहरादून शहर
को चुना गया है।
देहरादून
जिले के
अंतर्गत 06 तहसीलें
हैं, जिनमें
से शोधकर्ता
ने सुविधा के
अनुसार देहरादून-सदर
तहसील (शहरी
क्षेत्र) को
चुना है।
नमूने
का चयन
देहरादून
जिले के
देहरादून शहर
में उच्च शिक्षा
सरकारी सेवा
में कुल लगभग 150 महिलाएं
कार्यरत हैं,
जिनमें से
शोधकर्ता ने
आनुपातिक
नमूना पद्धति
के माध्यम से 20प्रतिशत
महिलाओं का
चयन किया है,
जिनकी कुल
संख्या 30 है।
अनुसंधान
पद्धति
प्रस्तुत
अध्ययन
अन्वेषणात्मक
एवं व्याख्यात्मक
शोध प्रारूप
अनुसंधान पर
आधारित है। प्रस्तुत
शोध पत्र में
प्राथमिक और
द्वितीयक
तथ्यों का
उपयोग किया
गया है।
प्राथमिक तथ्यों
को एकत्र करने
के लिए
साक्षात्कार-अनुसूची
का उपयोग किया
गया
है।द्वितीयक
तथ्यों के रूप
में पुस्तकों,
जर्नल्स व
लेख शामिल
हैं।
अध्ययन
प्राप्तियां
प्रस्तुत
अध्ययन
देहरादून शहर
की शिक्षित कार्यरत
महिलाओं पर
आधारित है
जिसमें
अध्ययन के
दौरान यह पाया
गया कि
वर्तमान समय
में शिक्षित
कार्यरत
महिलाएं
पारिवारिक
एवं कार्य स्थल
के बीच एक
बेहतर
समायोजन बना
रही है तथा परिस्थिति
के अनुसार
सामाजिक
प्रस्थिति
तथा भूमिका के
अंतर्संबंधों
का समंजन
स्थापित कर
रही हैं।
कार्यस्थल पर
महिलाएं एक ओर
प्रगति की
भूमिका का
निर्वहन कर
रही है वहीं
घरेलू कार्यों
में सहयोग
करके अपनी
परंपरागत
पारिवारिक
भूमिका का भी
निर्वहन कर
रही हैं।प्रस्तुतअध्ययन
में मुख्य रूप
से सामाजिक
प्रस्थिति एवं
भूमिका
अंतर्संबंधों,
कार्य
स्थल पर
महिलाओं का
अन्य सहयोगी
एवं कार्मिकों
के साथ
अंतर्संबंध
एवं महिलाओं
की कार्यस्थल
में तथा
परिवार में
पत्नी और मां
की भूमिका के
महत्व को
प्रदर्शित
करने का प्रयास
किया गया है।
तालिका
1
|
तालिका 1 सामाजिक
प्रस्थिति
और भूमिका के
बीच संबंध |
|||
|
क्रम
संख्या |
विवरण |
माध्य |
भूमिका |
|
01 |
प्रोत्साहित
करना |
5.7 |
18 |
|
02 |
रूढ़िवादी |
04 |
04 |
|
03 |
तटस्थ |
03 |
08 |
|
योग |
30 |
30 |
|
ऊपर
दी गई तालिका
से यह स्पष्ट
है कि,शिक्षित
कार्यरत
महिलाओं के
सामाजिक और
भूमिका के
आपसी संबंध और
भूमिका को
बढ़ावा देने के
बीच का औसत 5.7
(18) है। जबकि
रूढ़िवादी सोच
में यह आपसी
संबंध 4 (4) है। इसी
तरह, कार्यरत
महिलाएं
सामाजिक और
भूमिका के
आपसी संबंधों
के बीच 3 (8) तटस्थ
हैं। इससे यह
साफ़ होता है
कि काम के प्रति
भूमिका के
टकराव के बारे
में महिलाओं
के बीच बनी
पुरानी सोच कम
हुई है।
तालिका
2
|
तालिका
2 कार्यस्थल
पर आर्थिक और
भूमिका
अन्तर्सम्बन्ध |
|||||||
|
क्रम
संख्या |
विवरण |
अत्यधिक
सहयोगी |
सहयोगी |
असहयोगी |
सहानुभूतिपूर्ण |
तटस्थ |
कुल |
|
01 |
प्रबन्धन/प्राचार्य/
उप
प्राचार्य/
विभागाध्यक्ष |
13(43.33%) |
07(23.33%) |
03(10%) |
04(13.33%) |
03(10%) |
30(100%) |
|
02 |
सहकर्मी |
11(36.3%) |
09(30%) |
02(6.66%) |
04(13.33%) |
04(13.33%) |
30(100%) |
|
03 |
कार्यालय
कार्मिक |
08(26.33%) |
07(23.33%) |
05(16.66%) |
04(13.33%) |
06(20%) |
30(100%) |
ऊपर
दी गई तालिका
से यह स्पष्ट
है कि, काम करने
वाली महिलाओं
के आर्थिक और
भूमिका अन्तर्सम्बन्ध
में, प्रबन्धन/प्राचार्य/उप
प्राचार्य/विभागाध्यक्ष
अत्यधिक
सहयोगी (13) 43.33%, सहयोगी (07)
23.33%, असहयोगी (03)
10%, सहानुभूति
रखने वाले (04)
13.33%, तटस्थ (03)
10% हैं, जबकि साथ
काम करने
वालों के बीच
आपसी संबंध अत्यधिक
सहयोगी (11) 36.33%, सहयोगी (09)
30%, असहयोगी (02)
6.66%, सहानुभूति
रखने वाले (04)
13.33%, तटस्थ (04)
13.33% हैं। इसी
तरह, मिनिस्ट्रियल
कर्मचारियों
और ऑफिस स्टाफ
के बीच, अत्यधिक
सहयोगी (08) 26.33%, सहयोगी (07)
23.33%, असहयोगी (05)
16.66%, सहानुभूति
रखने वाले (04)
13.33%, तटस्थ (06)
20% हैं, जो ऊपर दी
गई तालिका से
स्पष्ट है।
काम करने वाली
महिलाओं के
आर्थिक और
भूमिका
अन्तर्सम्बन्ध
में सबसे कम
तटस्थता (13)
43.33% पाई गई।
तालिका
3
|
तालिका
3 सामाजिक
और आर्थिक
अंतर्संबंध |
|||
|
क्रम
संख्या |
भूमिका |
संख्या |
प्रतिशत |
|
01 |
कार्यरत
महिला की
भूमिका
महत्वपूर्ण
है |
09 |
30% |
|
02 |
पत्नी की
भूमिका
महत्वपूर्ण
है |
05 |
16.66% |
|
03 |
माँ की
भूमिका
महत्वपूर्ण
है |
07 |
23.33% |
|
04 |
तीनों
भूमिकाएँ
महत्वपूर्ण
हैं |
09 |
30% |
|
योग |
30 |
100% |
|
ऊपर
दी गई तालिका
से यह स्पष्ट
है कि, समाज में
शिक्षित
कार्यरत
महिलाओं की
तीनों भूमिकाएँ
बराबर
महत्वपूर्ण
हैं। जिनकी
संख्या 09 (30%) है,
इसी तरह
कार्यरत
महिला की
भूमिका 09 (30%) है,
पत्नी के
रूप में
कार्यरत
महिला की
भूमिका 05 (16.66%) है और
इसी तरह माँ
की भूमिका 09
(30%) है।
इससे यह
स्पष्ट है कि,
पत्नी की
भूमिका की
महत्ता सबसे
कम पाई गई है,
जो 05 (16.66%) है।
निष्कर्ष
भूमिका
संघर्ष
शिक्षित
कार्यरत
महिलाओं के बीच
एक जटिल और आम
समस्या है,
जो कि
उनके मानसिक
और शारीरिक
स्वास्थ्य पर
बुरा असर
डालती है।
उन्हें काम की
जगह पर लिंग भेदभाव
और असमानता का
सामना करना
पड़ता है, साथ ही घर
के काम और
बच्चों की
देखभाल की
ज़िम्मेदारियाँ
भी निभानी
पड़ती हैं,
जिससे
उन्हें काम और
परिवार के बीच
संतुलन बनाने
में मुश्किल
होती है। इस
टकराव को कम
करने के लिए
समाज और
परिवार का
सहयोग, फ्लेक्सिबल
काम के घंटे
और बच्चों की
देखभाल की
सुविधाएँ
ज़रूरी हैं।
इसके अलावा,
लिंग
भूमिकाओं के
पारंपरिक
विचारों को
बदलना और
महिलाओं का
उनके
अधिकारों और
क्षमताओं के अनुसार
सम्मान करना
भी इस टकराव
को कम कर सकता
है।
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Srivastava, R., Gupta, S., and Sanjeev, M. A. (2022). Comprehending and Measuring Pandemic Induced Stress Among Professionals Due to Lockdown and Work From Home (लॉकडाउन और वर्क फ्रॉम होम के कारण पेशेवरों में महामारी-जनित तनाव का आकलन). Journal of Public Affairs, 22(Suppl. 1), e2791. https://doi.org/10.1002/pa.2791
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