A STUDY OF NATIONAL EDUCATION POLICY AND PUBLIC EXPENDITURE ISSUE IN INDIA

Original Article

A Study of National Education Policy and Public Expenditure issue in India

भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और सार्वजनिक व्यय के मुद्दें का एक अध्ययन

 

Dr. Vikas Kumar 1Icon

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1 Associate Professor, Department of Political Science, Atma Ram Sanatan Dharma College, University of Delhi, Delhi, India

 

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ABSTRACT

English: Education plays a crucial role in addressing systemic inequalities and building an inclusive society in India. Since independence, the Government of India and the States have prioritized education, establishing numerous Education Commissions. Over the years, several education policies have shaped this sector: the first National Policy on Education in 1968, the second in 1986 (revised in 1992), and the new National Education Policy (NEP) 2020, implemented almost after 34 years. NEP 2020 provides a framework for education across all levels and regions. Before NEP 2020 Government of India has taken few initiatives which include the National Curriculum Framework 2005 and the Right of Children to Free and Compulsory Education Act 2009, both of which uphold fundamental constitutional principles. Quality education is vital for India's economic development, social justice, and cultural unity. This paper analyzes the evolution of education policies in India since independence, emphasizing the significance and implications of the NEP 2020. The paper attempts to argue that government spending on education in India is approximately 4 percent of GDP. Unless this is increased to 6 percent, to achive the goal of the National Education Policy is impossible.

 

Hindi: शिक्षा से समाज में मौजूद व्यवस्थित असमानताओं से लड़ने की क्षमता होती है, जिसका मकसद एक समावेशी समाज बनाना है। इस उद्देष्य को पूरा करने लिए स्वतंत्रता के बाद से ही भारत सरकार एंव राज्यों की सरकारें षिक्षा को लेकर काफी जागरूक थी। इसलिए स्वतंत्रता के बाद ही कई सारे एजुकेषन कमीष्न बनाए गए। लगभग 34 वर्षों के बाद नई राष्ट्रीय षिक्षा नीति 2020 को भारत सरकार ने लागू किया है। हालांकि की इससे पहले 1968 में पहली नेषनल पाॅलिसी आॅन एजुकेषन, 1986 दूसरी नेषनल पालिसी आन एजुकेषन जिसे 1992 में संषोधित कर दुबारा लागू किया गया। नई नीति पिछली नेशनल पॉलिसी ऑन एजुकेशन, 1986 की जगह लेती है। यह पॉलिसी ग्रामीण और शहरी भारत दोनों में शुरुआती शिक्षा से लेकर हायर एजुकेशन के साथ-साथ वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए एक बड़ा फ्रेमवर्क है। साथ ही, दो जरूरी निर्णय, खासकर नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क 2005 और बच्चों को मुफ्त और जरूरी शिक्षा का अधिकार एक्ट 2009, जिसे बुनियादी सिद्धांत के रूप में भारत के संविधान स्थापित किया गया। अच्छी क्वालिटी की शिक्षा तक सबकी पहुँच हो, भारत की लगातार तरक्की और आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और बराबरी, वैज्ञानिक तरक्की, देश को एक करने और संस्कृति को बचाने के मामले में दुनिया का नेतृत्व कर सके तथा न्यायपूर्ण समाज बनाने और देश के विकास को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। इस पेपर का मुख्य मकसद भारत में आजादी के बाद के षिक्षा नीतियों में आए बदलावों का विष्लेषण करना है, जिसमें 2020 पर खास फोकस है। मुख्य रूप से सभी बड़ी एजुकेशनल पॉलिसी का विश्लेषण इसमें शामिल है। यह पेपर नीति के बारे में एक तर्क देने की कोशिश करता है कि भारत में शिक्षा पर सरकारी खर्च जीडीपी का लगभग 4 प्रतिषत है। इसे जब तक 6 प्रतिषत तक नही किया जाएगा तब तक 2020 की षिक्षा नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करना असंभव है।

 

Keywords: National Education Policy, Skill Development, Public Education, GDP, SGD4, NCF, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, कौशल विकास, सार्वजनिक शिक्षा, GDP, SGD4, NCF

 


 

प्रस्तावना

शिक्षा एक सामंजस्यपूर्ण शक्ति के रूप में कार्य करती है जो समाज के विभिन्न पहलुओं को एक साथ जोड़ती है, प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आधुनिक समय तक’।

इस पेपर के अंतर्गत भारत में शिक्षा, संवैधानिक प्रावधानों और संशोधनों एवं स्वत्रंता उपरांत निर्मित नीतियों का विश्लेषण किया गया है। विशेष रूप से 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986  (1992) की राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2002 के शिक्षा का अधिकार, 2009  शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2020  राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं क्रमिक सरकारों द्वारा पेश की गई नीतियों और योजनाओं में शामिल लक्ष्यों का अध्ययन शामिल किया गया है। यह पेपर भारत के शिक्षा और कौशल विकास, गतिशील, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि जो की 2020  राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल उद्येश्यों का अध्ययन करता है। साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे वितीय व्यय और सरकार द्वारा जारी बजट एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 का विश्लेषण है। यह पेपर इस बात पर जोर देता है की एक कुशल आबादी को पोषित करने की अनिवार्यता को पूरा करने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर विकास, नवाचार और समावेशी शिक्षा की जरुरत है। भारत शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को हमेशा महत्व देता रहा है जैसे की मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा ने जोर देकर कहा कि हर किसी को शिक्षा का अधिकार है। जॉमटियन घोषणा  के अंतर्गत “सभी के लिए शिक्षा” का विश्व घोषणापत्र जिसमें कहा गया की प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह - बच्चा, युवा और वयस्क कोई हो सभी को लाभान्वित होने में सक्षम होना चाहिए। एमडीजी एवं एसडीजी लक्ष्यों शिक्षा को बढावा देने की बात कही गई है । यह शोध शासन की गतिशीलता और नीति सुधारों के बीच जटिल अंतःक्रियाओं की पड़ताल करता है, जो बदलते सामाजिक-राजनीतिक प्रतिमानों के सामने भारत की शिक्षा और विकास को दर्शाता है।

 

भारतीय शिक्षा एवं संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार एवं राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत में कई ऐसे प्रावधान है जिसमें राज्य की शिक्षा के प्रति जिम्मेवारीयों का उल्लेख किया गया है जैसे किः

 

अनुच्छेद 21

शिक्षा का अधिकारः यह अनुच्छेद 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा डाला गया था। यह राज्य को 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का आदेश देता है। इस अधिकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक बच्चे को बुनियादी शिक्षा मिले।

 

अनुच्छेद 45

इस निर्देशात्मक सिद्धांत का मूल उद्देश्य सभी बच्चों को 14 वर्ष की आयु पूरी होने तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना था। 2002 में 86वें संशोधन के बाद, इसे छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन देखभाल और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के लिए संशोधित किया गया था।

 

अनुच्छेद 46

यह निर्देशात्मक सिद्धांत राज्य को समाज के कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने के लिए बाध्य करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि उन्हें सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से बचाया जाए।

 

अनुच्छेद 30

यह अनुच्छेद धर्म या भाषा आधारित किसी भी अल्पसंख्यक समूह  को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है, जिससे वे अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं को संरक्षित कर सकें, तथा राज्य, शैक्षणिक संस्थानों को सहायता प्रदान करते समय, किसी भी शैक्षणिक संस्थान के साथ इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि वह अल्पसंख्यक के प्रबंधन के अधीन है, चाहे वह धर्म या भाषा पर आधारित हो। Universal Law Publishing. (2010)

भारतीय संविधान में यह सुनिश्चित किया गया कि राज्य अपने सभी नागरिकों को शिक्षा प्रदान करे। भारतीय संविधान में शिक्षा को राज्य का विषय बताया गया था। लेकिन 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत शिक्षा को समवर्ती सूची का विषय बनाया गया, जो की केंद्र सरकार को इस क्षेत्र में उपयुक्त तरीके से कानून बनाने में सक्षम बनाती है। इसके अलावा भारत कई अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों जैसे जॉमटियन घोषणा, यूएनसीआरसी, एमडीजी लक्ष्यों, डकार घोषणा सार्क एसडीजी चार्टर फॉर चिल्ड्रन का हस्ताक्षरकर्ता है जो सभी बच्चों के लिए शिक्षा को वास्तविकता बनाने की अपनी प्रतिबद्धता पर बाध्यकारी है। जिसको सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों के समझा जा सकता है, जैसे कि भारत सरकार ने शिक्षा और कौशल विकास दोनों को बढ़ाने के उद्देश्य से कई अन्य विभिन्न पहलें शुरू की हैं। सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रम विशेष रूप से लड़कियों और हाशिए के समूहों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने में सहायक रहे हैं।

 

 

भारत की शिक्षा नीति एवं उसके मुख्य पहलू

स्वतंत्रता के बाद, शिक्षा के क्षेत्र की समस्याओं का विश्लेषण करने और आगे का रास्ता सुझाने के लिए कई समितियों और आयोगों का गठन किया गया था। यह महसूस किया गया कि शैक्षिक संस्थान विकास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह सुझाव दिया गया कि शैक्षिक संस्थानों के कर्तव्य और जिम्मेदारियां महत्वपूर्ण थीं और उनके नेतृत्व आवश्यकता थी। 1948 में, भारत के केंद्रीय सलाहकार बोर्ड ने दो आयोगों की स्थापना करने का निर्णय लिया, एक विश्वविद्यालय शिक्षा से निपटने के लिए और दूसरा माध्यमिक शिक्षा के लिए, डॉ. एस. राधाकृष्णन के निर्देशन में 1948 का विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग स्वतंत्र भारत में स्थापित पहला आयोग था। इस आयोग का लक्ष्य ऐसे विश्वविद्यालय स्थापित करना था जो किसी व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक ज्ञान और बुद्धि प्रदान करें। इसने विश्वविद्यालय की शिक्षा को उच्च स्तर की शिक्षा की ओर ले जाने के लिए एक आवश्यक पहला कदम माना गया। यह सुनिश्चित करना कि सभी सामाजिक वर्ग,  भू-क्षेत्र , जाति,  लिंग या अन्य कारकों की परवाह किए बिना, उच्च शिक्षा तक पहुंच सकते हैं, किसी दिए गए क्षेत्र में एक विश्वविद्यालय की स्थापना इसका प्राथमिक उद्देश्य था। 1952 में मुदलियार आयोग समिति गठित की गई जिसका नेतृत्व  डॉ. ए. लक्ष्मणस्वामी मुदलियार कर रहे थे, यह एक माध्यमिक शिक्षा आयोग था। 1953 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। अनुसंधान ने भारतीयों की शैक्षिक चुनौतियों का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया और उत्पादकता में सुधार के लिए सिफारिशें दी। आयोग के अध्ययन ने बहुउद्देशीय हाई स्कूल बनाने और हाई स्कूल के पाठ्यक्रम में विविधता लाने की सिफारिश की। एक और सुझाव यह था कि पूरे भारत में एक मानक पैटर्न लागू किया जाए। इसने यह भी सुझाव दिया कि तकनीकी विद्यालय स्थापित किए जाएं। Saluja (2023) भारत सरकार ने 1964 डॉ डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में भारतीय शिक्षा आयोग का गठन किया। जिसे अधिकांश लोगों द्वारा कोठारी आयोग के रूप में जाना जाता है, इस आयोग ने  शिक्षा के हर पहलू और क्षेत्र को संबोधित करने के साथ-साथ राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के विकास पर सरकार को सलाह देने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस आयोग के सुझावों को 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाते समय ध्यान में रखा गया था।  

शिक्षा पर कोठारी आयोग की रिपोर्ट के शुरुआती अनुच्छेदों में कहा गया है, भारत का भाग्य अब उसकी कक्षाओं में आकार ले रहा है। आयोग के तीन मुख्य पहलू हैं; 1) आंतरिक परिवर्तन 2) गुणात्मक सुधार और 3) शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) कोठारी आयोग की सिफारिशों पर आधारित थी, जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था। इसने शिक्षा प्रणाली के व्यापक पुनर्गठन की आवश्यकता पर जोर दिया और विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास, नैतिक सिद्धांतों के विकास और दैनिक जीवन के साथ शिक्षा के सख्त एकीकरण पर बहुत अधिक जोर दिया। आयोग ने सुझाव दिया कि सभी बच्चों को 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए निर्देश सिद्धांत की शीघ्र पूर्ति के लिए जोरदार प्रयास किए जाने चाहिए। Government of India. (1966)

भारत में शिक्षा पर वित्तपोषण पर कुछ प्रासंगिक सिफारिशें दी (1) कुछ स्पष्ट सिफारिशें हैं (2) मानदंडों का एक सेट जिसे मूल्यवान भी माना जा सकता है (3) कई सामान्य सहज मानक टिप्पणियाँ जो में बदलाव की आवश्यकता का सुझाव देंगी नीति निर्माताओं और योजनाकारों का दृष्टिकोण। सभी में से, शिक्षा के वित्तपोषण पर आयोग द्वारा की गई सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश शिक्षा के लिए राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत आवंटन है। आयोग ने स्वतंत्रता के बाद की अवधि में शिक्षा के वित्तपोषण में पिछली प्रवृत्तियों का विस्तृत विश्लेषण किया, 1985-86 तक भारत में शिक्षा प्रणाली की वित्तीय आवश्यकताओं का अनुमान लगाया, और सिफारिश की कि ष्यदि शिक्षा को पर्याप्त रूप से विकसित होना है, तो ... शिक्षा के लिए आवंटित जीएनपी का अनुपात 1985-86 में 6.0 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। Tilak (2007)

 

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मुख्य विशेषताएं एवं कमियां

भारतीय शिक्षा प्रणाली में अगली नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) थी। इसका प्रमुख उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को शिक्षा प्रदान करना था, जिसमें विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों और महिलाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया था, जो सदियों से शिक्षा के अवसरों से वंचित थे। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) ने गरीबों के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने, प्रौढ़ शिक्षा प्रदान करने, उत्पीड़ित समूहों से शिक्षकों की भर्ती करने और नए स्कूलों और कॉलेजों को विकसित करने पर जोर दिया। नीति छात्रों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करती है। इसके अलावा इसने दिल्ली में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) की स्थापना करके मुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना को भी महत्व दिया। नीति ने सिफारिश की थी कि ग्रामीण लोगों को गांधीवादी दर्शन के अनुरूप शिक्षा दी जानी चाहिए। इसने शिक्षा में सूचना प्रौद्योगिकी के उद्भव के लिए मंच भी तैयार किया, इसके अलावा निजी उद्यम के लिए तकनीकी शिक्षा क्षेत्र को काफी विस्तृत तरीके से खोल दिया। भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों के प्रभाव का पुनर्मूल्यांकन करने और सिफारिशें देने के लिए 1990 में आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था। जुलाई 1991 में केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने जनार्धन रेड्डी कमेटी की स्थापना की थी। जिसका काम एनपीई 1986 के क्रियान्यवन का रिव्यू करना था। Government of India. (1992)

समिति की रिपोर्ट 1992 में प्रस्तुत की गई थी और इसे 1992 की राष्ट्रीय कार्य योजना के रूप में जाना जाने लगा। इसने विकास को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने पर जोर दिया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1992) ने गुणवत्ता वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारतीय शिक्षा प्रणाली के अधिक परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया। नीति में छात्रों के बीच नैतिक मूल्यों को विकसित करने और शिक्षा को जीवन के करीब लाने पर भी जोर दिया गया है।

 

21 वीं सदी में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार

1986 के बाद इक्कीसवीं सदी में शिक्षा के मुद्दों को संबोधित करते हुए सरकारों ने कई सुधार एवं योजनाओं की शुरुआत की जैसे कि, मध्याह्न भोजन योजना 1995 की शुरुआत जिसमें सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों को कवर करने के लिए किया गया था। इसका उद्देश्य छात्रों को मुफ्त भोजन प्रदान करके स्कूल में उपस्थिति और पोषण में सुधार करना है। हालांकि इस योजना का नाम बदल दिया गया है,  वर्ष 2022-23 में, मध्याह्न भोजन योजना को प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (पीएम-पोषण) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (एनएफएसए) के तहत संचालित यह अधिकार-आधारित केंद्र प्रायोजित योजना, प्राथमिक छात्रों के अलावा पूर्व-प्राथमिक छात्रों या बाल वाटिकाओं को शामिल कर अपने दायरे को व्यापक बनाने का लक्ष्य रखती है। इसके बाद सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) 2001 में शुरू किया गया, एसएसए सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से एक प्रमुख कार्यक्रम है। यह बुनियादी ढांचे, शिक्षक प्रशिक्षण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच में सुधार पर ध्यान केंद्रित करता है, विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में।

इसके पश्चात न्यायालय के हस्तक्षेप एवं सरकार की सक्रियता ने ना केवल संविधान में संशोधन किये बल्कि कई नये शैक्षिक सुधारों की पहल की । इसकी शुरुआत सबसे पहले  संविधान के तहत शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करके किया गया। 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा  शिक्षा के अधिकार को जीवन जीने के मौलिक अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत शामिल किया गया। जिसके अंतर्गत राज्य को 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का प्रावधान किया गया। इस अधिकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक बच्चे को बुनियादी शिक्षा मिले। Universal Law Publishing. (2010)

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सैम पित्रोदा के निर्देशन में जून 2005 में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (एनकेसी) की स्थापना की, जिसका लक्ष्य उच्च शिक्षा में समानता, गुणवत्ता और पहुंच के लिए एक रूपरेखा प्रस्तावित करना था, इसके अतिरिक्त हमारे ज्ञान से संबंधित संस्थानों और बुनियादी ढांचे के लिए एक सुधार का खाका तैयार करना था जो भारत को भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए सशक्त बनाएगा। शिक्षा के अधिकार, पुस्तकालयों, भाषा, अनुवाद, पोर्टलों और ज्ञान नेटवर्क सहित विषयों के संबंध में, एनकेसी ने प्रस्ताव प्रदान किए हैं। इसकी कुछ सिफारिशें हैंः 1. शिक्षा के अधिकार की पुष्टि करने वाले एक केंद्रीय कानून की आवश्यकता। 2. बच्चे की प्रथम भाषा (मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा) के साथ-साथ एक भाषा के रूप में अंग्रेजी की शिक्षा कक्षा 1 से शुरू की जानी चाहिए। 3. विद्यालय प्रणाली में परिवर्तन जो विकेंद्रीकरण, विद्यालयों के प्रबंधन में स्थानीय स्वायत्तता और धन के वितरण में लचीलेपन को प्रोत्साहित करेगा। 4. गुणवत्ता में सुधार करने और जवाबदेही उत्पन्न करने, स्कूल के बुनियादी ढांचे में सुधार करने और स्थानीय हितधारकों के लिए अधिक भूमिका और प्रणाली में अधिक पारदर्शिता के साथ स्कूल निरीक्षण को नया रूप देने के लिए। 5. सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) को शिक्षकों, छात्रों और प्रशासन के लिए अधिक सुलभ बनाया जाएगा। 6. पाठ्यक्रम और परीक्षा प्रणालियों में रटने की शिक्षा से अवधारणाओं की आलोचनात्मक समझ की ओर बढ़ने और अंततः संकाय में सुधार की आवश्यकता है। National Council of Educational Research and Training (2005)

इसके सुझाव पर राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (एनसीएफ) 2005 में पेश की गई थी। इसका उद्देश्य एक अधिक लचीला और बाल-केंद्रित पाठ्यक्रम प्रदान करना था, जो रट्टा सीखने के बजाय समग्र विकास और आलोचनात्मक सोच पर ध्यान केंद्रित करता था। एनसीएफ ने इन सिद्धांतों के अनुरूप पाठ्यपुस्तकों और शिक्षण विधियों में बदलाव की सिफारिश की। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) 2009,  आरटीई अधिनियम के शीर्षक में ‘मुफ्त और अनिवार्य’ शब्द शामिल हैं। निःशुल्क शिक्षा का अर्थ है कि कोई भी बच्चा, उसके माता-पिता द्वारा किसी ऐसे स्कूल में प्रवेश कराए गए बच्चे के अलावा जो उपयुक्त सरकार द्वारा समर्थित नहीं है, किसी भी प्रकार की फीस या शुल्क या खर्च का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं होगा जो उसे प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने और उसे पूरा करने से रोक सकता है। अनिवार्य शिक्षा उचित सरकार और स्थानीय अधिकारियों पर 6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने और उपस्थिति और पूर्णता सुनिश्चित करने का दायित्व डालती है। आरटीई अधिनियम ने शिक्षा तक पहुंच में असमानताओं को कम करने की मांग की। National Council of Educational Research and Training (2009)

राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए): 2009 में शुरू किया गया, आरएमएसए 9 और 10 की कक्षाओं के लिए बुनियादी ढांचे, शिक्षक प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम विकास को बढ़ाकर माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार पर ध्यान केंद्रित करता है। डिजिटल पहल की गई और आईसीटी के माध्यम से शिक्षा पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमईआईसीटी) और डिजिटल इंडिया जैसी पहलों के माध्यम से शिक्षा में प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है।। इन पहलों का उद्देश्य कक्षाओं में डिजिटल संसाधनों और ई-लर्निंग उपकरणों के उपयोग को बढ़ाना है।

ये कुछ प्रमुख शैक्षिक सुधार और पहल हैं जो 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाद से भारत में शुरू की गई हैं। इन सुधारों का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली में पहुंच, गुणवत्ता और प्रासंगिकता के मुद्दों को संबोधित करना है, साथ ही बदलते सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के अनुरूप ढलना था। Singh (2023) लेकिन 1986 की शिक्षा नीति देश में शिक्षा प्रणाली को आकार देने के उद्देश्य से एक व्यापक ढांचा था, लेकिन इसमें कमियों का भी उचित हिस्सा था, जिसमें शामिल हैं, कौशल विकास पर कम ध्यान केंद्रित करना,  1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति  व्यावसायिक प्रशिक्षण बल दिया लेकिन कौशल शिक्षा की बात इसमें नहीं थी। इससे शिक्षा प्रणाली और बाजार में मौजूद नौकरी की मांगों के बीच एक अंतर पैदा हो गया। नीति ने विभिन्न क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में शैक्षिक असमानताओं के मुद्दे को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया। यह शहरी और ग्रामीण शिक्षा के बीच, साथ ही विभिन्न जातियों और समुदायों के बीच के अंतर को पाटने के लिए ठोस उपाय प्रदान करने में विफल रहा। यह माना जाया की नीति ने शिक्षा के लिए एक परीक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया, जिसने समग्र शिक्षा और आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करने के बजाय परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए छात्रों पर अत्यधिक दबाव डाला। इस  नीति का उद्देश्य उच्च शिक्षा का विस्तार करना था, इसने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की नींव को मजबूत करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। इसके परिणामस्वरूप प्राथमिक शिक्षा की तुलना में उच्च शिक्षा को अधिक संसाधन और ध्यान मिला। नीति ने विकलांग बच्चों की जरूरतों को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया या मुख्यधारा की शिक्षा में उनके समावेश के लिए एक स्पष्ट रोडमैप प्रदान नहीं किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रस्तावित सुधारों के वित्तपोषण के लिए कोई ठोस योजना प्रदान नहीं की गई थी।

किसी नई नीति के अभाव में, पिछले कुछ दशकों के दौरान शिक्षा क्षेत्र में कार्यकारी आदेशों, और असंबद्ध पहलों के साथ परिवर्तन किए गए थे। सत्ता में आने के तुरंत बाद, वर्तमान सरकार ने संकेत दिया कि वह शिक्षा पर एक नई राष्ट्रीय नीति लेकर आएगी। वैश्विक चुनौतीयां को देखते हुए लगभग 34 वर्षाे के बाद सरकार ने 2020 में एक नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की शुरुआत हुई, जिसका उद्देश्य इनमें से कुछ मुद्दों को संबोधित करना और भारतीय शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार लाना था।

 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

नई षिक्षा नीति बनाने के लिए डॉ. के.के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई। इस कमेटी ने 2019 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार किया। इस पॉलिसी को जुलाई 2020 में केंद्र सरकार ने मंजूरी दी जिसे नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 के नाम से जाना जाता है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 (एनईपी) शिक्षा में एक बड़े परिवर्तन की परिकल्पना करती है - भारतीय लोकाचार में निहित एक शिक्षा प्रणाली जो भारत, यानी भारत को एक न्यायसंगत और जीवंत ज्ञान समाज में स्थायी रूप से बदलने में सीधे योगदान करती है, सभी को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करके, जिससे भारत एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बन जाएगा। एनईपी 2020 पहुंच, समानता, गुणवत्ता, सामथ्र्य और जवाबदेही के पांच मार्गदर्शक स्तंभों पर आधारित है। यह हमारे युवाओं को वर्तमान और भविष्य की विविध राष्ट्रीय और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करेगा। स्कूली शिक्षा में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मूल मूल्यों और सिद्धांत पर जोर देती है कि शिक्षा को न केवल संज्ञानात्मक कौशल विकसित करना चाहिए, अर्थात - साक्षरता और संख्यात्मकता के ‘आधारभूत कौशल’ और ‘उच्च-क्रम’ कौशल जैसे आलोचनात्मक सोच और समस्या समाधान - बल्कि सामाजिक और भावनात्मक कौशल भी विकसित करना चाहिए - जिन्हें ‘सॉफ्ट स्किल्स’ भी कहा जाता है - जिनमें सांस्कृतिक जागरूकता और सहानुभूति, दृढ़ता और साहस, टीम वर्क, नेतृत्व, संचार आदि शामिल हैं। Government of India. (2020)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार ‘‘षिक्षा व्यवस्था का मकसद अच्छे इंसान बनाना है जो समझदारी से सोच सकें और काम कर सकें, जिनमें दया और हमदर्दी हो, हिम्मत हो, साइंटिफिक सोच और क्रिएटिव कल्पना हो, और जिनके नैतिक मूल्य और मान्यताएं अच्छी हों। इसका मकसद ऐसे नागरिक तैयार करना है जो प्रोडक्टिव और योगदान देने वाले हों, जो हमारे संविधान के हिसाब से सबको साथ लेकर चलने वाला हो, समावेषी, बहुलवादी समाज की बात करता हो, ।’’Government of India. (2020)

नीति का उद्देश्य पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाना है और यह सिफारिश करता है कि प्रत्येक विषय में पाठ्यक्रम भार को समग्र, चर्चा और विश्लेषण-आधारित शिक्षा के लिए जगह बनाकर इसकी श्मूल आवश्यकश् सामग्री तक कम किया जाना चाहिए। नीति का उद्देश्य सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना है और 2025 तक सभी के लिए प्राथमिक विद्यालय और उससे आगे की बुनियादी साक्षरता / संख्यात्मकता की प्राप्ति पर विशेष जोर देना है। यह अनुशंसा करता है कि प्रत्येक विषय में पाठ्यक्रम भार को समग्र, चर्चा और विश्लेषण-आधारित शिक्षा के लिए स्थान बनाकर इसकी श्मूल आवश्यकश् सामग्री तक कम किया जाना चाहिए। नीति ने स्कूली शिक्षा के सभी चरणों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर जोर दिया है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न केवल जीवन बदलने वाला है, बल्कि एक दिमाग बनाने वाला और चरित्र निर्माण करने वाला अनुभव भी है, जो नागरिकता पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। सशक्त शिक्षार्थी न केवल देश के कई बढ़ते विकासात्मक आवश्यकताओं में योगदान करते हैं बल्कि एक न्यायपूर्ण और न्यायसंगत समाज बनाने में भी भाग लेते हैं। उच्च शिक्षा में, एनईपी, 2020 शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर बहुमूल्य अंतर्दृष्टि और सिफारिशें प्रदान करता है जिसमें बहुविषयक और समग्र शिक्षा की ओर बढ़ना, संस्थागत स्वायत्तता, राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन की स्थापना के माध्यम से गुणवत्ता अनुसंधान को बढ़ावा देना, शिक्षकों का निरंतर व्यावसायिक विकास, प्रौद्योगिकी का एकीकरण, उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण, शासन और नियामक संरचना का पुनर्गठन, बहुविषयक पाठ्यक्रम, मिश्रित, शिक्षाशास्त्र, वैध विश्वसनीय और मिश्रित मूल्यांकन और भारतीय भाषाओं में सामग्री की उपलब्धता शामिल है। सरकार का मानना है की इस नीति से शिक्षा प्रणाली पर दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव पड़ने और भारत को कुशल जनशक्ति का वैश्विक केंद्र बनाने की उम्मीद है, जो 2047 में विकसित भारत तक अगले 25 वर्षों का नेतृत्व करेगा। किसी भी नीति की प्रभावशीलता उसके कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। नीति के प्रभावी कार्यान्वयन में एमएचआरडी, एनसीईआरटी, एससीईआरटी, केंद्र और राज्य सरकारों आदि जैसे कई निकायों के समन्वित प्रयास शामिल हैं। यह चरणबद्ध निष्पादन और प्राथमिकता जैसे प्रमुख सिद्धांतों का पालन करता है। केंद्रीय और राज्य स्तर पर विशेष समितियां नियमित समीक्षा के साथ प्रगति सुनिश्चित करते हुए विस्तृत योजनाएं विकसित करेंगी। नियमित समीक्षा कार्यान्वयन की प्रगति को ट्रैक करेगी, जिसमें 2030-40 के लिए एक व्यापक समीक्षा निर्धारित है। Government of India. (2020)

यह नीति शिक्षा संरचना के सभी पहलुओं के संशोधन और नवीनीकरण का प्रस्ताव करती है, जिसमें इसका रेगुलेशन और शासन भी शामिल है, ताकि एक नई प्रणाली बनाई जा सके जो 21वीं सदी की शिक्षा के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के अनुरूप हो, जिसमें एसडीजी4 भी शामिल है, जबकि भारत की परंपराओं और मूल्य प्रणालियों पर निर्माण किया जा सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रत्येक व्यक्ति की रचनात्मक क्षमता के विकास पर विशेष जोर देती है। यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि शिक्षा को न केवल संज्ञानात्मक क्षमताओं - साक्षरता और संख्यात्मकता की ‘आधारभूत क्षमताएं’ और ‘उच्च-क्रम’ संज्ञानात्मक क्षमताएं, जैसे कि आलोचनात्मक सोच और समस्या समाधान - बल्कि सामाजिक, नैतिक और भावनात्मक क्षमताओं और स्वभावों को भी विकसित करना चाहिए।Government of India. (2020)

 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं सरकार की सार्वजनिक व्यय

2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शैक्षिक निवेश को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाने के लिए प्रतिबद्धता है दिखाई गई है, हालांकि इससे पहले की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी वितीय व्यवस्था की व्यापक स्तर पर सिफारिश की गई थी और उसकी   स्वीकृति के बावजूद और इसे 1968 और 1986 में एनपीई का हिस्सा बनाने के बावजूद, और जिसे संसद द्वारा अनुमोदित किया गया था, कार्यान्वयन बहुत धीमा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी वितीय व्यवस्था की बात कही गई है जैसे किः

नीति में शैक्षिक निवेश को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाने की प्रतिबद्धता है, क्योंकि इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता जहां है हमारे युवाओं की उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और समाज के भविष्य के लिए निवेश हो। दुर्भाग्य से, भारत में शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय 1968 की शिक्षा नीति में परिकल्पित जीडीपी के 6 प्रतिषत के अनुशंसित स्तर के करीब नहीं पहुँच पाया है,  जैसा कि 1968 की शिक्षा नीति में परिकल्पित  किया गया था, जिसे 1986 की नीति में दोहराया गया था,  जिसकी पुष्टि 1992 की शिक्षा नीति की समीक्षा में भी मौजूद है। भारत में शिक्षा पर वर्तमान सरकार (केंद्र एवं राज्य) का सार्वजानिक व्यय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 4.43 प्रतिषत रहा है जो की शिक्षा के लिए कुल सरकारी खर्च का केवल 10 प्रतिषत (आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18)। ये संख्याएँ अधिकांश विकसित और विकासशील देशों की तुलना में बहुत कम हैं।” Government of India. (2020)

बी.जी.तिलक ने अपनी किताब फाइनेंसिंग एजुकेशन इन इंडिया (2003) बताया है कि यह व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त सिद्धांत है कि जो देश शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को गंभीरता से लेता है उसे अपने सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) का लगभग 6 प्रतिशत इस कार्य के लिए खर्च करना चाहिए। भारत में यह कभी भी हासिल नहीं किया गया है। 1950 के दशक की शुरुआत में, यह 1.2 प्रतिशत के आस-पास था, जो धीरे-धीरे बढ़कर 1990 के दशक की शुरुआत में केवल 4 प्रतिशत तक पहुंच पाया। परन्तु यह फिर से नीचे भी गिरा, लेकिन 1999-2000 में 4.5 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। यह तर्क दिया जा सकता है कि एक गरीब देश अधिक खर्च नहीं कर सकता है। लेकिन तिलक ने अपने शुरुआती निबंध में बताया कि पूरे अफ्रीकी महाद्वीप के लिए, संबंधित आंकड़ा 6 प्रतिशत के करीब था और यहां तक कि उप-सहारा अफ्रीका, जिसमें दुनिया के कुछ सबसे गरीब देश शामिल हैं, ने 5.6 प्रतिशत का आंकड़ा दिखाया।Tilak (2003)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का यह कहना सही है कि भारत में शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी के 6 प्रतिशत के स्तर के करीब नहीं आया है, जिसकी सिफारिश कोठारी आयोग ने 1960 के दशक में की थी और बाद के हर महत्वपूर्ण शिक्षा नीति दस्तावेज में इसे दोहराया गया था। 1970 से 80 तक शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय (केंद्र और राज्यों को मिलाकर) जीडीपी का लगभग 2-3 प्रतिशत के बीच था, जो 1989-90 में सकल घरेलू उत्पाद के 3.43 प्रतिशत तक बहुत धीरे-धीरे बढ़ा, लेकिन उसके बाद के वर्षों में वापस गिर गया। (शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को दर्शाने वाला स्टेटमेंट) हालांकि फिर से धीरे- धीरे इसमें बढोतरी हुई है 2022 में 4.1 प्रतिशत बताई गई है। यह कहना भी सही है कि भारत का शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च अधिकांश विकसित और विकासशील देशों की तुलना में बहुत कम है। विकसित देशों में शिक्षा पर औसत सार्वजनिक व्यय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 5.1 प्रतिशत है। विकासशील देशों में यह आंकड़ा है अर्जेंटीना दृ 5.9 प्रतिशत (2023),  ब्राजील - 5.6 प्रतिशत (2022), चीन 4.0 प्रतिशत  और दक्षिण अफ्रीका - 6.0 प्रतिशत (2024)। ( वल्र्ड बैंक रिपोर्ट, शिक्षा पर सरकारी व्यय, कुल जीडीपी का प्रतिशत)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में यह कहा गया किः

उत्कृष्टता के साथ शिक्षा के लक्ष्य और इस राष्ट्र और इसकी अर्थव्यवस्था को संबंधित लाभों की बहुलता को प्राप्त करने के लिए, यह नीति स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा में सार्वजनिक निवेश में पर्याप्त वृद्धि का समर्थन करती है और कल्पना करती है। केंद्र और राज्य मिलकर शिक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश को बढ़ाकर जल्द से जल्द सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत तक ले जाएंगे। इसे उच्च गुणवत्ता और न्यायसंगत सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है जो भारत की भविष्य की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक और तकनीकी प्रगति और विकास के लिए वास्तव में आवश्यक है।” Government of India. (2020)

भाजपा ने लोकसभा चुनावों के समय जारी अपने 2014 के चुनावी घोषणापत्र (पेज 23) में वादा किया था कि यदि वह सत्ता में आती है तो शिक्षा पर कुल सामान्य सरकारी खर्च को जीडीपी के 6 प्रतिशत तक बढ़ाएगी।

निरपेक्ष संख्या में शिक्षा पर व्यय 2014-15 में 3.4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में 5.6 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो पांच वर्षों में 60 प्रतिशत की वृद्धि है। हालांकि, यूपीए-2 शासन के तहत, शिक्षा पर व्यय 2009-10 में 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2013-14 में 3.48 लाख करोड़ रुपये (77 प्रतिशत) हो गया था। जीडीपी के प्रतिशत के संदर्भ में, यूपीए-2 के तहत केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा किया गया व्यय औसतन जीडीपी का लगभग 3.19 प्रतिशत था। एनडीए सरकार के पांच वर्षों में यह घटकर 2.88 प्रतिशत हो गया। (इंडिया टुडे, 2020)

2019-20 में भारत ने शिक्षा पर 6.43 लाख करोड़ रुपये (88 बिलियन डॉलर) खर्च किए। 2019-20 में, उस सिफारिश के 52 साल बाद, भारत ने शिक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का केवल 3.1: खर्च किया। (भारत सरकार, आर्थिक सर्वेक्षण-2019-20) आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 2019-20 में भारत ने शिक्षा के लिए 6.43 लाख करोड़ रुपये (88 बिलियन डॉलर) का सार्वजनिक धन आवंटित किया। इसमें से केंद्र सरकार ने स्कूली शिक्षा के लिए 56,537 करोड़ रुपए (7.74 बिलियन डॉलर) और उच्च शिक्षा के लिए 38,317 करोड़ रुपए (5.25 बिलियन डॉलर) आवंटित किए। एक साथ रखने पर, केंद्र शिक्षा व्यय का 15: हिस्सा है। बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आए थे।

यदि 2014 के बाद शिक्षा क्षेत्र में हुए व्यय को देखा जाए तो यह प्रगति काफ़ी निराशाजनक थी। यह 2014-15 में 2.8: तक गिर गया और 2015-16 में 2.4: की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, 2016-17 (2.6:) के बाद से सुधार के कुछ संकेत मिले हैं, शिक्षा पर व्यय को 2012-13 के स्तर पर बहाल नहीं किया गया है, जीडीपी के 6: को छूने के सरकार के लक्ष्य के करीब कहीं भी पहुंचने की बात तो दूर है। हालांकि सरकार के द्वारा प्रस्तुत कई रिपोर्ट में यह आंकड़ा 3 प्रतिशत से ऊपर है। 2022-23 में यह आंकड़ा 4.06 प्रतिशित बताई गई है।

वास्तव में यदि सरकार ईमानदारी से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को सही लागू करना चाहती है तो उसे शिक्षा के क्षेत्र में मौजूदा बजट को बढ़ाना होगा। तभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्यों को हाशिल किया जा सकता है।

  

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