TRADE RELATIONS BETWEEN INDIA AND ASEAN IN THE 21ST CENTURY

Original Article

TRADE RELATIONS BETWEEN INDIA AND ASEAN IN THE 21ST CENTURY

21वीं शताब्दी में भारत - आसियान के बीच व्यापारिक संबंध

 

Kanchan Kumari 1*Icon

Description automatically generated, Dr. Aashish Kr. Bariyar 2

1 Research Scholar, Department of Political Science, Lalit Narayan Mithila University, Kameshwarnagar, Darbhanga, Bihar, India

2 Assistant Professor, Department of Political Science, C. M. College, Lalit Narayan Mithila University, Kameshwarnagar, Darbhanga, Bihar, India

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ABSTRACT

English: ASEAN has established itself as a strong and influential regional organization in contemporary international politics and the global economy. Comprising 11 Southeast Asian nations, it not only serves as a vehicle for regional stability and cooperation but also plays a central role in the Asian economic landscape. The systematic expansion of formal relations between India and ASEAN began especially after the 1990s. This was a period when India implemented structural changes in its economic policies, embracing liberalization, privatization, and globalization. These economic reforms paved the way for India’s deeper integration with the global market and strengthened the economic dimension of its foreign policy. In this changing context, the “Look East Policy” was formulated to strengthen relations with Southeast Asian countries, providing a new direction to India’s foreign policy. The disintegration of the Soviet Union in 1991 and the end of the Cold War resulted in profound changes in the international balance of power. The emerging unipolar structure, replacing the bipolar world order, redefined the priorities of global politics. This change was of particular significance for India, as the deterioration of its long-standing strategic relationship with the Soviet Union underscored the need for a rebalancing of foreign policy. Furthermore, the balance of payments crisis that emerged at that time necessitated economic restructuring. Following economic liberalization, India opened its market to a greater extent for international trade and foreign investment. Against this backdrop, India took concrete steps towards institutionalizing multifaceted cooperation with ASEAN through the Look East Policy, launched in 1992. Southeast Asian countries also viewed post-liberalization India as a major emerging market and potential investment destination. Furthermore, India’s role in the regional power balance was increasingly recognized, especially at a time when other major powers were becoming more active in the Asia-Pacific region. Consequently, relations between India and ASEAN gradually strengthened based on mutual economic interests, strategic needs, and shared aspirations for regional stability. Currently, ASEAN is among India’s major trading partners, and bilateral trade and investment cooperation is steadily expanding. The Act East Policy, an evolution of the Look East Policy, has given this partnership a more proactive, implementation-oriented, and strategic character. This relationship plays a crucial role in shaping the Asian balance of power, regional stability, and inclusive development in the twenty-first century. Thus, the nature of cooperation between India and ASEAN is increasingly dynamic, multi-layered and forward-looking, laying the foundation for serving the long-term interests of both sides in the changing global landscape.

 

Hindi: आसियान  समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक सुदृढ़ और प्रभावशाली क्षेत्रीय संगठन के रूप में स्थापित हो चुका है। दक्षिण-पूर्व एशिया के 11 राष्ट्रों को समाहित करने वाला यह संगठन न केवल क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग का माध्यम है, बल्कि एशियाई आर्थिक परिदृश्य में भी इसकी केंद्रीय भूमिका है।[i]  भारत और आसियान के मध्य औपचारिक संबंधों का व्यवस्थित विस्तार विशेष रूप से 1990 के दशक के पश्चात् प्रारंभ हुआ। यह वह कालखंड था जब भारत ने अपनी आर्थिक नीतियों में संरचनात्मक परिवर्तन करते हुए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण को अपनाया। इन आर्थिक सुधारों ने भारत को वैश्विक बाजार से अधिक गहन रूप से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया तथा विदेश नीति के आर्थिक आयाम को सुदृढ़ किया। इसी परिवर्तित परिप्रेक्ष्य में दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ‘लुक ईस्ट नीति’ का प्रतिपादन किया गया, जिसने भारत की विदेश नीति में एक नई दिशा प्रदान की। 1991 में सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध की समाप्ति के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन में व्यापक परिवर्तन हुए। द्विध्रुवीय विश्व-व्यवस्था के स्थान पर उभरती एकध्रुवीय संरचना ने वैश्विक राजनीति की प्राथमिकताओं को पुनर्परिभाषित किया। भारत के लिए यह परिवर्तन विशेष महत्व का था, क्योंकि सोवियत संघ के साथ उसके दीर्घकालिक रणनीतिक संबंधों में आई शिथिलता ने विदेश नीति के पुनर्संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित किया। साथ ही, उस समय उत्पन्न भुगतान संतुलन संकट ने आर्थिक पुनर्संरचना को अनिवार्य बना दिया। आर्थिक उदारीकरण के पश्चात् भारत ने अपने बाजार को अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विदेशी निवेश के लिए अपेक्षाकृत अधिक खुला बनाया।  इस पृष्ठभूमि में 1992 में आरंभ की गई ‘लुक ईस्ट नीति’ के माध्यम से भारत ने आसियान के साथ बहुआयामी सहयोग को संस्थागत रूप प्रदान करने की दिशा में ठोस कदम उठाए।[ii]  दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने भी उदारीकरणोत्तर भारत को एक उभरते हुए व्यापक बाजार तथा संभावित निवेश-गंतव्य के रूप में देखा। साथ ही, क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के संदर्भ में भारत की भूमिका को महत्व दिया गया, विशेषतः ऐसे समय में जब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अन्य प्रमुख शक्तियों की सक्रियता में वृद्धि हो रही थी। परिणामस्वरूप भारत और आसियान के मध्य संबंध परस्पर आर्थिक हितों, सामरिक आवश्यकताओं और क्षेत्रीय स्थिरता की साझा आकांक्षाओं के आधार पर क्रमशः सुदृढ़ होते गए। वर्तमान परिदृश्य में आसियान भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में सम्मिलित है तथा द्विपक्षीय व्यापार और निवेश सहयोग निरंतर विस्तार की दिशा में अग्रसर है। ‘लुक ईस्ट नीति’ के विकसित रूप ‘ऐक्ट ईस्ट नीति’ ने इस साझेदारी को अधिक सक्रिय, क्रियान्वयन-केन्द्रित और रणनीतिक स्वरूप प्रदान किया है। इक्कीसवीं सदी के एशियाई शक्ति-संतुलन, क्षेत्रीय स्थिरता और समावेशी विकास की प्रक्रिया में यह संबंध महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इस प्रकार, भारत और आसियान के मध्य सहयोग का स्वरूप निरंतर गतिशील, बहुस्तरीय और भविष्याभिमुख है, जो परिवर्तित वैश्विक परिदृश्य में दोनों पक्षों के दीर्घकालिक हितों की पूर्ति का आधार निर्मित कर रहा है।

 

Keywords: India, ASEAN, FTA, Balance of Trade, Trade Deficit, Liberalization, Globalization, भारत, आसियान, एफटीए, व्यापार-संतुलन, व्यापार घाटा, उदारीकरण, भूमंडलीकरण


प्रस्तावना

आसियान का पूरा नाम “एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशिया नेशन” (दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संघ) है।  आसियान की  स्थापना बैंकॉक घोषणा के तहत 8 अगस्त 1967 को इंडोनेशिया ,मलेशिया, फिलीपीन्स, सिंगापुर और थाईलैंड के द्वारा की गई।[iii]   म्यांमार, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम, ब्रुनेई  तथा तिमोर लिस्ते इसमें बाद में शामिल हुआ।  इस संगठन का मुख्यालय इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में है। आसियान  मूलत: मलय नस्ल के लोगों का संगठन है तथा यह उन देशों के प्रतिनिधित्व करता है जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्वतंत्र हुए हैं। आसियान का प्रमुख उद्देश्य क्षेत्रीय शांति, स्थिरता, आर्थिक प्रगति और सामाजिक-सांस्कृतिक सहयोग को सुदृढ़ करना है। यह संगठन उपनिवेशवादोत्तर काल में स्वतंत्र हुए दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के बीच आपसी विश्वास, संवाद और सहयोग की संस्थागत संरचना के रूप में विकसित हुआ। समय के साथ यह केवल एक आर्थिक मंच न रहकर बहुआयामी क्षेत्रीय व्यवस्था का रूप ग्रहण कर चुका है। विदेश मंत्रियों की वार्षिक बैठकें, शिखर सम्मेलन तथा विभिन्न क्षेत्रीय संवाद-प्रक्रियाएँ सदस्य देशों के मध्य नीति-समन्वय एवं विश्वास-निर्माण को प्रोत्साहित करती हैं। आसियान देशों के विदेश मंत्री अलग - अलग देशों की राजधानियों  में वार्षिक सम्मेलन द्वारा पारस्परिक सहयोग एवं एकता को बढ़ावा देते हैं। “एक दृष्टि, एक पहचान, एक समुदाय” का आदर्श वाक्य इसकी सामूहिक क्षेत्रीय पहचान और एकीकरण की आकांक्षा को अभिव्यक्त करता है।

 

भारत - आसियान संबंध

भारत और आसियान के संबंधों में वास्तविक सक्रियता 1990 के दशक में आरंभ हुई, जब भारत ने आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाई। 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री  नरसिम्हा राव द्वारा ‘लुक ईस्ट नीति’ की घोषणा के साथ दक्षिण-पूर्व एशिया भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण आयाम बन गया। इसी वर्ष भारत को आसियान का क्षेत्रीय वार्ता साझेदार का दर्जा प्राप्त हुआ। 1995 में पूर्ण वार्ता साझेदार तथा 1996 में आसियान क्षेत्रीय फोरम की सदस्यता ने भारत की क्षेत्रीय भागीदारी को सुदृढ़ किया।[iv]  वर्ष 2000 में ‘मेकांग–गंगा सहयोग’ पहल तथा 2002 से नियमित शिखर सम्मेलनों की शुरुआत ने द्विपक्षीय संबंधों को संस्थागत आधार प्रदान किया। 2009 में लागू आसियान–भारत वस्तु व्यापार समझौते ने आर्थिक संबंधों को नई गति दी, जबकि 2014 में सेवा एवं निवेश समझौतों ने सहयोग को व्यापक स्वरूप प्रदान किया। 2014 के पश्चात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘लुक ईस्ट नीति’ को ‘एक्ट ईस्ट नीति’ में रूपांतरित किया गया। इस नीति का उद्देश्य व्यापार, कनेक्टिविटी, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामरिक सहयोग को क्रियात्मक स्तर पर आगे बढ़ाना है। ‘कॉमर्स, कनेक्टिविटी और कल्चर’ इसके प्रमुख आधार रहे हैं, जिनमें सुरक्षा और क्षमता-निर्माण जैसे आयाम भी अंतर्निहित हैं।[v]  दक्षिण-पूर्व एशिया भौगोलिक रूप से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के मध्य सेतु का कार्य करता है। यह क्षेत्र वैश्विक समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति मार्गों तथा इंडो-पैसिफिक सामरिक संतुलन में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

 

भारत - आसियान सहयोग का महत्व

भारत एक उभरती हुई आर्थिक एवं सैन्य शक्ति वाला देश है।  हाल ही में 2025 में भारत जापान को पीछे छोड़ विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है । वहीं दक्षिण पूर्वी एशिया क्षेत्र सामरिक एवं भौगोलिक  दृष्टि से बड़ा ही महत्वपूर्ण है । यह हिंद महासागर से प्रशांत महासागर में मिलने वाले समुद्री पुल का कार्य करता है । आर्थिक दृष्टि से यह क्षेत्र काफी समृद्ध है । हिंद प्रशांत  क्षेत्र में चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा को भी ध्यान में रखते हुए भारत आसियान सहयोग महत्वपूर्ण है। भारत की उभरती आर्थिक एवं सामरिक स्थिति के संदर्भ में आसियान के साथ सहयोग का महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ा है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में शक्ति-संतुलन, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला विविधीकरण जैसे मुद्दे विशेष महत्व रखते हैं। इस संदर्भ में भारत–आसियान सहयोग बहु-आयामी स्वरूप ग्रहण कर चुका है। प्रमुख सहयोग क्षेत्र निम्नलिखित हैं—

·     व्यापार एवं निवेश

·     आधारभूत अवसंरचना विकास

·     पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु सहयोग

·     नवीकरणीय ऊर्जा

·     शिक्षा, कौशल विकास एवं क्षमता निर्माण

·     सांस्कृतिक एवं जन-से-जन संपर्क

·     समुद्री एवं क्षेत्रीय सुरक्षा

·     सुरक्षा, चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना आदि।

 

भारत - आसियान व्यापार

1990 का दशक विश्व मे महत्वपूर्ण आर्थिक परिवर्तन का रहा । विश्वभर मे आर्थिक परिवर्तन हुआ । इसी कड़ी मे भारत मे भी आर्थिक परिवर्तन हुआ और 1991 मे उदारीकरण एवं आर्थिक खुलेपन की नीति अपनाई । इसके पहले भारत मे बंद अर्थव्ययवस्था थी जिसके कारण विदेशी व्यापार करने मे अनेक प्रकार की लाइसेंस ,परमिट की  वजह से व्यापार  मे कठिानाई होती थी । इसलिए बदलते वैश्विक परिवेश मे भारत के विदेश नीति के निर्माणकर्ता ने आर्थिक महत्व को समझते हुए आर्थिक बदलाव लाया । अब उदारीकरण के पश्चात व्यापार हेतु भारत को भौगोलिक निकटता , सुगम परिवहन हेतु पड़ोसी तथा विस्तारित पड़ोसी आसियान कि ओर मुख करना स्वाभाविक था । परिणामत: 1992 मे लुक ईस्ट पॉलिसी द्वारा भारत आसियान संबंधों पर जोर दिया गया । 1991 के पश्चात भारत की विदेश नीति में आर्थिक आयाम को प्राथमिकता दी गई। ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक निकटता के कारण आसियान भारत का स्वाभाविक आर्थिक साझेदार बना। 1992 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो आगामी दशकों में उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 110 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया। इसके बावजूद व्यापार संतुलन प्रायः भारत के प्रतिकूल रहा है।

2003 में भारत और आसियान  देशों के उद्यमियों को एक साथ मंच पर लाने हेतु ‘आसियान इंडिया बिज़नेस काउंसिल’ (एआईबीसी) की स्थापना की गई।  13 अगस्त 2009 को ‘आसियान भारत वस्तु व्यापार समझौता’ (ASEAN-INDIA Trade in goods agreement – AITIGA) हुआ जो 1 जनवरी 2010 से लागू हुआ।[vi] 2012 में भारत आसियान संबंध सामरिक स्तर तक पहुच गया । 13 नवंबर 2014 को ‘आसियान भारत सेवा व्यापार समझौता’ पर भी हस्ताक्षर हुआ ।  इस समझौते के बाद व्यापार बढ़कर 72 बिलियन डॉलर 2017-18 में हो गया । 2015 में “मेक इन इंडिया” पहल में सिंगापुर प्रमुखता से भाग लिया।  2021-22 में भारत और आसियान के बीच व्यापार 110.40 बिलियन डॉलर पहुँच गया।[vii]  आसियान भारत के प्रमुख व्यापार साझेदारों में से एक है जो भारत के वैश्विक व्यापार में 11 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। हालांकि व्यापारिक निर्भरता मुख्यतः सिंगापुर, इंडोनेशिया और मलेशिया पर निर्भर है, आसियान के अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय व्यापारिक समझौतों के माध्यम से भारत को आसियान के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने चाहिए। 2009 से 2023 के मध्य आसियान से आयात की वृद्धि दर निर्यात की अपेक्षा अधिक रही, जिससे व्यापार घाटा बढ़ा। वित्त वर्ष 2022-23  मे आसियान देशों  को भारत का निर्यात 44.04 बिलियन डॉलर रहा जबकि आयात इससे अधिक रहा।[viii]  अतः भारत और आसियान दोनों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने हेतु यह आवश्यक है कि दोनों ही एक दूसरे का  सहयोग करें और वस्तु तथा सेवा, निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्र में अपने संबंधों को मजबूती प्रदान कर एशिया की मजबूत अर्थव्यवस्था बनने की विशाल संभवता को वास्तविक धरातल पर उतारे कि आवश्यकता है । भारत ने विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को विकसित अर्थव्यवस्था बनाने हेतु ‘विजन 2020’ योजना का मसौदा तैयार किया जो प्रमुख पांच क्षेत्रों पर केंद्रित है -

·      कृषि । 

·      खाद्य प्रसंस्करण।

·      विद्युत।

·      शिक्षा एवं स्वास्थ।

·      प्रौद्योगिकी क्षेत्र।

21वें भारत- आसियान शिखर सम्मेलन 10 अक्टूबर,2024 को लाओ पीडीआर के वियनतियाने में आयोजित किया गया था।  इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ की एक दशक पूरे होने पर आसियान भारत व्यापक रणनीति साझेदारी की प्रगति की समीक्षा करने के लिए शामिल हुए । उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में भारत आसियान व्यापार दोगुना होकर 130 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है।  साथ ही उन्होंने एफटीए की चरणबद्ध तरीके से समीक्षा पूरी करने की आवश्यकता को भी महत्वपूर्ण बताया । भारत में आसियान के निवेश की अपार सम्भावनाएं हैं।[ix]  भारत में विशाल बाजार, युवा जनसंख्या, तथा उपभोक्ता है। इसलिए भारत को इसका फायदा उठाते हुए अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने करने की  अवश्यकता है ।  कोविड - 19 के बाद डिजिटल अर्थव्यवस्था कि अपार संभावनए है । अतः भारत और आसियान को इस ओर ध्यान देने कि जरूरत है । 

चित्र 1

चित्र 1 भारत - आसियान व्यापार

स्रोत: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय

 

तालिका  2

चित्र 2 आसियान के साथ भारत का व्यापार संतुलन

स्रोत: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय

 

वित्त वर्ष 2009-2023 के बीच आसियान से भारत में आयात में 234.4% की वृद्धि हुई जबकि भारत से आसियान में निर्यात में केवल 130.4% की बढ़ोतरी रही। इस व्यापार घाटा पर चिंतन करने की आवश्यकता है। हालांकि 2025 ने भारत AITIGA के समीक्षा पर बल दिया। एटिगा  की समीक्षा में बढ़ोतरी  प्रगति दर्ज की गई। भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल तथा मलेशिया के व्यापार एवं उद्योग मंत्री  जफरुल अज़ीज़ के बीच वर्चुअल बैठक में यह प्रगति दर्ज की गई । भारत व्यापार संतुलन हेतु 21वीं सदी की वास्तविकताओ के साथ जोड़कर भारत- आसियान व्यापार संबंधों को संतुलित बना सकता है।

 

व्यापार घाटा के कारण

·     टैरिफ सुविधा- भारत ने आसियान देशों के लिए अपनी टैरिफ लाइन लगभग 74% टैरिफ में कमी की है, वहीं आसियान देशों ने केवल 56% ही किया है।[x]

तालिका 1

 

तालिका 1भारत को आसियान देशों का टैरिफ ऑफर (परसेंट लाइंस)

देश

एलिमिनेशन

टोटल ऑफर

ब्रुनेई

8.10%

84.70%

कंबोडिया

84.10%

92%

इंडोनेशिया

50 .10%

70.40%

लाओस

77.50%

88.50%

मलेशिया

78.10%

86.20%

म्यांमार

73.40%

81.30%

फिलीपींस

75.60%

88.10%

सिंगापुर

100%

100%

थाईलैंड

75.60%

85.40%

वियतनाम

69.70%

82.20%

(स्रोत: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय)

 

·        विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता - आसियान के कई देश खासकर थाईलैंड और वियतनाम ने भारत की तुलना में उच्च उत्पादकता स्तर के साथ सुदृढ़ विनिर्माण क्षेत्र विकसित किया है।

·        भारतीय दवा निर्यात को आसियान देशों में लंबी तथा महंगी पंजीकरण प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

·        रूल्स ऑफ ओरिजिन का दुरुपयोग - एआइएफटीए मे  उद्गम क्षेत्र नियम के कमजोर होने से गैर आसियान देश जैसे चीन को भारत में अपने निर्यात को आसियान के माध्यम से राउंड ट्रिप द्वारा भेजने की अनुमति मिल जाती है जिससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ जाता है।

 

समकालीन परिप्रेक्ष्य एवं भावी संभावनाएँ

डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित प्रौद्योगिकी, आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ीकरण, ब्लू इकॉनमी तथा समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की व्यापक संभावनाएँ विद्यमान हैं। AITIGA की समीक्षा और अधिक संतुलित व्यापार तंत्र की स्थापना दोनों पक्षों के दीर्घकालिक हित में है। भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार, युवा जनसांख्यिकीय संरचना और तकनीकी क्षमता, तथा आसियान की उत्पादन दक्षता और क्षेत्रीय एकीकरण की प्रक्रिया—इनकी पारस्परिक पूरकता एशिया में एक सुदृढ़ आर्थिक एवं सामरिक साझेदारी का आधार बन सकती है। अतः स्पष्ट है कि भारत–आसियान संबंध केवल व्यापारिक विनिमय तक सीमित न रहकर इंडो-पैसिफिक परिप्रेक्ष्य में बहु-आयामी, दीर्घकालिक और रणनीतिक सहयोग की दिशा में विकसित हो चुके हैं।

 

निष्कर्ष

1992 में आसियान के साथ संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से भारत द्वारा ‘लुक ईस्ट नीति’ का आरंभ किया गया। इस नीति के प्रारंभिक चरण में भारत-आसियान द्विपक्षीय व्यापार का स्तर मात्र लगभग 2 अरब अमेरिकी डॉलर था। किंतु आर्थिक उदारीकरण, क्षेत्रीय एकीकरण और परस्पर निर्भरता में वृद्धि के परिणामस्वरूप वित्तीय वर्ष 2018–19 तक यह व्यापार बढ़कर 96.79 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। इसके पश्चात व्यापारिक संबंधों में निरंतर विस्तार हुआ और 2024–25 तक द्विपक्षीय व्यापार का स्तर लगभग 123 अरब अमेरिकी डॉलर के आसपास दर्ज किया गया।[xi]  यद्यपि व्यापार की समग्र मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, तथापि व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में अनुकूल नहीं रहा। 2010–11 में जहाँ व्यापार घाटा लगभग 5 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर पर था, वहीं 2024–25 तक यह बढ़कर 44 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया, जबकि कुल द्विपक्षीय व्यापार 130 अरब अमेरिकी डॉलर से ऊपर पहुँच चुका था। यह असंतुलन संरचनात्मक कारकों, आयात-निर्यात संरचना में असमानता, मूल्यवर्धित उत्पादों में प्रतिस्पर्धात्मकता की कमी तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की सीमित भागीदारी जैसे कारणों से उत्पन्न हुआ है।

भारत और आसियान के मध्य मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर के उपरांत व्यापारिक गतिविधियों में तीव्रता आई। विशेषतः खाद्य उत्पाद, वस्त्र एवं परिधान, कृषि फसलें, लकड़ी एवं उससे संबंधित उत्पाद, मत्स्य पालन तथा तंबाकू जैसे क्षेत्रों में निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। 2018–19 के 96.79 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर से आगे बढ़ते हुए 2025 तक द्विपक्षीय व्यापार को 300 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य व्यक्त किया गया है, जो दोनों पक्षों की आर्थिक संभावनाओं को प्रतिबिंबित करता है। 2019 में बैंकॉक (थाईलैंड) में आयोजित 16वीं आसियान आर्थिक मंत्रियों की परामर्श बैठक में भारत के केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने भाग लिया, जहाँ भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौते की समीक्षा पर सहमति बनी। यह समीक्षा प्रक्रिया व्यापार असंतुलन, बाजार पहुँच, गैर-शुल्क बाधाओं तथा निवेश सहयोग जैसे मुद्दों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जाती है। 2025 में ‘एटिगा’ (ASEAN Trade in Goods Agreement) से संबंधित बैठकों के उपरांत व्यापार असंतुलन में कमी आने की अपेक्षा व्यक्त की जा रही है। भारत -आसियान आर्थिक संबंधों को अधिक संतुलित एवं स्थायी बनाने के लिए उन क्षेत्रों की पहचान आवश्यक है, जिनमें भारत तुलनात्मक लाभ प्राप्त कर सकता है। कृषि, पर्यटन, शिक्षा, आधारभूत अवसंरचना, खाद्य प्रसंस्करण, औषधि उद्योग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र सहयोग की व्यापक संभावनाएँ प्रस्तुत करते हैं। विशेषकर डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्ट-अप पारितंत्र और आपूर्ति शृंखला विविधीकरण में साझेदारी दोनों पक्षों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है। अतः यह आवश्यक है कि निरंतर संवाद, नीतिगत समन्वय तथा मुक्त व्यापार समझौते की प्रभावी समीक्षा के माध्यम से भारत और आसियान के मध्य व्यापारिक संबंधों को अधिक संतुलित, पारदर्शी एवं परस्पर लाभकारी बनाया जाए। इससे न केवल आर्थिक सहयोग को नई दिशा मिलेगी, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापक इंडो-पैसिफिक परिदृश्य में भारत-आसियान साझेदारी को भी सुदृढ़ आधार प्राप्त होगा।

  

ACKNOWLEDGMENTS

None.

 

REFERENCES

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