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CLASSIFICATION OF TRIBES IN A CULTURAL CONTEXT: AN ANALYSIS
सांस्कृतिक संदर्भ में जनजातियों का वर्गीकरण:विश्लेषण
Aniruddha Singh Vaynraulji 1![]()
1 Assistant Professor, College of
Education, Kharod, India
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ABSTRACT |
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English: Tribal societies point towards those early stages of human history where culture possessed the distinct characteristic of being unique to each specific human group—a culture that has since evolved to reach its current state of development. The present article attempts to classify the various tribes of India based on geographical, economic, racial, and linguistic parameters. Furthermore, it examines how their culture has undergone transformation in the modern era following contact with outsiders. Hindi: गराशशातीय
समाज मानव
इतिहास में
संस्कृति के
उन आरंभिक
चरणों की ओर
संकेत करते
हैं, जहाँ
संस्कृति
में
विशिष्टता
का यह गुण
पाया जाता
प्रत्येक
मानव-समूह की
संस्कृ से वह
विकास की
वर्तमान
प्रस्तुत
लेख में भारत
के विभिन
अवस्था तक
पहुंची है।
तियों के
भौगोलिक,
आर्थिक,
प्रजातिय
तथा भाषा के
आधार पर
दर्शाने का
प्रयत्न
किया गया है।
साथ ही
वर्तमान युग
में इनकी
संस्कृति
बाहरी लोगों
से सम्पर्क
में आने के
बाद
परिवर्तित
हुआ है। |
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Received 28 April 2025 Accepted 29 May 2025 Published 30 June 2025 Corresponding Author Aniruddha
Singh Vaynraulji, rauljianirudhdhasinh@gmail.com DOI 10.29121/ShodhSamajik.v2.i1.2025.98 Funding: This research
received no specific grant from any funding agency in the public, commercial,
or not-for-profit sectors. Copyright: © 2025 The
Author(s). This work is licensed under a Creative Commons
Attribution 4.0 International License. With the
license CC-BY, authors retain the copyright, allowing anyone to download,
reuse, re-print, modify, distribute, and/or copy their contribution. The work
must be properly attributed to its author.
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Keywords: Tribe, Culture, Language,
Tribal, Ethnic, जनजाति,
संस्कृति, भाषा,
आदिवासी,
नृवृतीय। |
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आदिवासी
शब्द अपने में
असीम,
अनुपम और
अदभुत इतिहास
सैंजोये हुए
है। इसका उच्चारण
करते ही
पुरातन, सुग्तप्रायः
जातियों की एक
झलक सामने आ
जाती है।
आदिवासी देश
के गडे हुए या
छिपे हुए
खजाने है।
वैज्ञानिक
युग के
चकाचौंध से
दूर आधुनिकता
की कृत्रिम और
जटिल व्यवहार
शैली से अलग
और आज के
भौतिक वैभव
एवं भोगवादी
जीवन से
अपरिचित, एकान
और शान्त
प्रकृति को
गोद में रहने
वाली इस जाति
के लोग आज भी
अपनी
परम्पराओं और
रूढियों से
ग्रसित अपनी
मर्यादा और
संस्कारों से
संबंधित
सामाजिकता का
परिचय देते
है।
मानव
मात्र का
सर्वांगीण
अध्ययन ही
मानव विज्ञान
का
विषयक्षेत्र
कहा जाता है।
किन्तु मानव
विज्ञान का
जन्म लगभग १५०
वर्ष पूर्व
जिन परिस्थितियों
में हुआ, उनमें
यूरोपियन
मनोवैज्ञानिक
अधिकांशतः ऐसे
अन्य
महादेशों के
वासियों का
अध्ययन करते थे।
जो सास्कृतिक
दृष्टि से
यूरोप की
तुलना में अति
पिछड़े हुए
थे। इस प्रकार,
एशिया, अफ्रीका,
अमेरिका, आस्ट्रेलिया
और द्वीप
समूहो के
आदिवासियों के
सांस्कृतिक
अध्ययन ही
सांस्कृतिक, सामाजिक
मानव विज्ञान
की परम्परा
में जुड गये।
इसके कई कारण
थे। इन आदिम
जातियों अथवा
आदिवासी
कबीलों की संस्कृति
यूरोपिय
संस्कृति की
तुलना में
अत्यधिक
रंगीन और रोचक
थी, इन
कविलां को
सामाजिक जीवन
छोटे पैमाने
पर संगठित और
सरल था. और
प्रशासकों के
लिए शासित लोगों
को संस्कृति
और सामाजिक
रचना का ज्ञान
आवश्यक था, ताकि शासन
अच्छा, सुगम
और अर्थपूर्ण
हो सके।
इन्हों
उद्देश्यों
से प्रेरित
होकर अंग्रेज
अधिकारियों
और प्रशासकों
ने अपनी
भारतीय साम्राज्य
में बिखरी
आदिवासी
संस्कृति का
अध्ययन
प्रारंभ
किया।
औपचारिक रूप
से भारतीय विश्वविद्यालयों
में मानव
विज्ञान को
स्थान बाद में
मिला,
परन्तु
उसके पूर्व ही
देश को
आदिवासी
संस्कृतियों
और उनके
सामाजिक जीवन
पर विभिन्न
दृष्टिकोण से
पुस्तकें लेख
और रिपॉट लिखी
जा रही थी।
जहाँ एक और
भारतीय
विश्वविद्यालयों
में मानव
विज्ञान हो
पाठ्यक्रम
में स्वीकार
करने के साथ
जनजाति विषयक
नृवृतीय और
नुक्ताशास्त्रीय
अध्ययन
वैज्ञानिक
विधि से होना
प्रारंभ हुआ,
वहीं
स्वतंत्र
भारत के
संविधान ने यह
घोषणा की कि
आदिवासी
हितों की
रक्षा शासन का
परम कर्तव्य
है, और इस
दिशा में शासन
को क्या करना
है, इसकी
विस्तृत
रूप-रेखा
निर्धारित की
गई है। इसक
अनुसार, आदिवासी
को अनुसूचित
जनजातियों के
रूप में संवैधानिक
सुविधाएँ भी
प्रदान की गई,
जिससे
उनका सवागिण
विकास किया जा
सके। इनके विकास
के लिए
सामाजिक
समुदायों के
वैज्ञानिक अध्ययन
को आवश्यक
माना गया और
इस प्रकार का
अध्ययनों को
बल मिला।
इस
प्रकार,
आज देश में
आदिवासी अथवा
अनुसूचित
जनजातियों के
सांस्कृतिक
सामाजिक
अध्ययन का
महत्व सैद्धांतिक
वैज्ञानिक भी
है और
व्यावहारिक
भी। भारतीय
संविधान
जनजातियों को
अनुसूचित जनजाति
का नाम दिया
है, लेकिन
नृतत्वशास्त्रियों
ने जनजातियों
को आ-अलग दमों
से संबंधित
किया है। जिले
के सोनक्षी०
धक्कर ने
उन्हें
आदिवासी (एम)
है। वे ने इन्हें
प्रतीय
जनजातियाँ
(हिला) की
संज्ञा दी है।
प्रसिद्धये
इन्तथाकथित
आदिवासी (को
काराजिन) अथवा
'पिछड़े
हुए हिन्दू' नाम दिया
है।
निर्शित
किया के लिए
अनुषिकान्त
के अनुसार विधियों
में अलग-अलग
नामों से जानी
गयी है. जैसे
अरण्याला इस
प्रकार भारत
में आदिवासी
कई नामों से
जाने जाते है-
वनवासी,
वन्यजाति,
गिरिजन, आदिम जाति
इत्यादि
नामों की
विविधता को
देखते हुए
जनजातियों की
विशेषताएँ
क्षेत्र के अनुसार
एक समान नहीं
होती है।
गिलिन और
गिलिन ने अपनी
पुस्तक
(कल्चरल
एन्यांतजी
में जनजाति की
परिभाषित
करते हुए कहाँ
कि "स्थानीय
जनजातीय का
ऐसा समवाय
जनजाति कहाँ
जाता है जो एक
सामान्य
क्षेत्र में
निवास करता है,
एक
सामान्य भाषा
का प्रयोगम
करता है, तथा
जिसकी एक
सामान्य
संस्कृति है।
डी० एन०
मजूमदार ने पुस्तक
(रेसेज एण्ड
कल्चर्स ऑफ
इण्डिया) में
बतलाया कि"
कोई जनजाति
परिवारों तथा
पारिवारिक
वर्षों का एक
ऐसा समूह है, जिसका एक
सामान्य नाम
है, जिसके
सदस्य एक
निश्चित
भू-भाग पर
निवास करते है,
एक
सामान्य भाषा
का प्रयोग
करते है, जिन्होने
एक
आरान-प्रदान
संबंधि तथा
पारस्परिक
कर्तव्य विषय
एक निश्चित
व्यवस्था का
विकास कर लिया
है।
साधारणतया एक
जनजाति
अन्तविवाह के
सिद्धान्त का
समर्थन करती
है, और
उसके सभी
सदस्य अपनी ही
जनजाति में
विवाह करते
है। इस प्रकार,
एक
सर्वसम्मत
तथ्य है कि एक
आदिवासी
समुदाय की
अपनी विशिष्ट
भाषा, संस्कृति,
सामाजिक
और आर्थिक
व्यवस्था, एक सामान्य
निवास व
प्रजाति आदि
होती है, इस
देश के
प्राचीनतम
लोगों में से
माना बाता है।
प्रोफेसर
ए०आर० देसाई
ने उन जनजातिय
समूहो जो कि
अभी तक
संस्कृतिकरण
एवं
आत्मरखत्मीकरण
का विरोध करते
आये ई. के
सामान्य
लक्षण निम्नोक्त
है।
1) चे
आदिम धर्म को
मानते है जो
कि
सर्वजीववाद
के
सिद्धान्तों
का प्रतिपादन
करता है।
जिसमें भूत-प्रेत
या आत्माओं की
पूजा का विशेष
स्थान होता
है।
2) वे
जनजातीय भाषा
का प्रयोग
करते है।
3) वे
जनजातीय
व्यवसायों को
अपनाते है, जैसे
प्राकृतिक
उपयोगी
वस्तुओं का
संग्रह, शिकार,
पन में
उत्पन्न
मस्तुओं का
संग्रह करना
आदि।
4) वे
अधिकांशतया
माँस-माझी है।
5) उनकी
खानाबदोशी
आदते है तथा
मद्यपान एवं
नृत्य के
प्रति उनकी
विशेष रूची
है।
6) वे
सभ्य जगत से
दूर पर्वतों
तथा जंगलों
में दुर्गम
स्थानों में
निवास करते
है। देसाई के
अनुमार,
कुल
जनजातीय
जनसंख्य का
कंवल 1/5 भाग में
उपरोक्त
सामान्य
लक्षण पाये जा
सकते है।
भारत
में पैडले
जनजातीय
समूहों को
भौगोलिक, प्रजातीय
सत्यों, भाषा
एवं आर्थिक
आधार पर
जनजातियों के
विभिन्न
प्रकार से
वर्णकृत किया
जा सकता है-
(१)
भौगोलिक आधार
पर जनजातियों
का वितरण
डी०
ए१० मजूमदार
ने भौगांतिक
आधार पर
जनजातियों को
उत्तर तथा
उत्तर पूर्व, मध्यवर्ती
तम दक्षिण भाग
में विभाजित
किया। यावरण
दुबे ने
पुस्तक (मानव
और संस्कृति)
में जनजाति-प्रधान
क्षेत्रों को
चार भागों में
बाँटा है-
1) उत्तर
तथा
उत्तर-पूर्वी
क्षेत्र-इस
क्षेत्र के
अन्तर्गत
जम्मू व
कश्मीर,
हिमाचल
प्रदेश, उत्तर
प्रदेश, मणिपुर-त्रिपुरा
का तराई
क्षेत्र, असम,
उत्तरी
बंगाल, मेघालय,
नागालैण्ड
रथात्रिपुरा
आते है। इस
क्षेत्र को 'हिमालयी
क्षेत्र' भी
कहाँ जाता है।
इस क्षेत्र
में निवास
करने वाली कुछ
मुख्य
जनजाति-गही
गुन्जर, भोट,
कोबरा, चारु,
भोटिया, रियाना, माओ
मित्रो, गारो,
रवासी, आपातानी
आदि है। देश
की सपूर्ण
जनजातीय जनसंख्या
का 2% इस
क्षेत्र में
वितरित है।
(७)
मध्य
क्षेत्र-इस
क्षेत्र के
अन्र्तगत
पश्चिम बंगाल
बिहार
क्षारखण्ड
उडीसा तथा तथा
मध्यप्रदेश
आता है। इस
क्षेत्र में
निवास करने वाली
प्रमुख
जनजातियाँ
संथाल मुंडा
उराँव हो. भूमित्र, गोण्ड,
कमार, बैगा,
भूमिका, कोया आदि
है। सम्पूर्ण
जन संख्या का
लगभग 49% इस क्षेत्र
में निवास
करते है।
मार्च-अप्रैल, 2020 (211)
दृष्टिकोण
किती
प्रजातियाँ-मीना, भील,
कोली, कोकना,
घोदिया, उमता आदि
है। संपूर्ण
जनजातीय का
लगभग 27% यहाँ निवास
करते हैं।
(२०)
दक्षिणी
क्षेत्र- इस
क्षेत्र में
आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक,
तमिलनाडू,
केरल, अण्डमान
निकोबार
द्वीपसमूह और
सध्धार विचारी
घाट के
दक्षिणी
भागों में
रहने वाले
जनजातियों को
देश की अति
प्राचीन
जनजातियों के
रूप में मान
है। इस
क्षेत्र में
निवास करने
वाले प्रमुख
जनजातियाँ
चेरु, टोडा,
कोटा, बहरागा,
चेट्टी, कंनी, कुरिचिया,
निकोबारी,
जराणा आदि
पायी जाती है।
संपूर्ण
जनजातीय आबादी
का लगभग 12% इस
क्षेत्र में
पाया जाता है।
2) प्रजातीय
तत्वों के
आधार पर
जनजातियों का
वितरण
भारत
की जनजातियों
के अन्तर्गत
प्रजातीय तत्वें
का विशेष
अध्ययन नहीं
हुआ है,
तथापि अब
तक के किए गए
अध्ययन्हें
का ध्यान में
रखने पर यह
स्पष्ट है कि
यदि दक्षिण
क्षेत्र में 'नीधीटों' का मिश्रण
है तो कंद्रिय
क्षेत्र में 'आस्ट्रेलियाई'
की विष और
उत्तर-पूर्वी
क्षेत्र में
मंगोलॉयड' प्रजाति का
लक्षण स्पष्ट
रूप से
परिलक्षित होता
है।
शारीरिक
लक्षण
(प्रजाती
तत्वों के
आधार पर)-
नीचणेो
प्रजाति
पुंपराले बाल, चिपकी
नाक
प्रोटो-
आस्ट्रेलायड
चेहरे का आकार, शरीर
की त्वचा का
रंग तथा सिर
का बाल एक
जैसा (काला)
होता है।
मंगोलॉयड
चिपटे मुँह, गाल
की चौडी
हड्डियों, चिपटा नाक
तथा पीलापन
लिए शरीर का
रंग
3) भाषा
के आधार पर
जनजातियों का
वर्गीकरण
एक
बोली बोलने
वालो को एक 'भाषा-परिवार'
में रखा
जाता है। भारत
की जनजातियाँ
विभिन्न भाषा
परिवारों की
है में है 1.
आग्नेय-
आग्नेय, आस्ट्रिक
का ही दुसरा
नाम है इस
परिवार की दो शाखाएँ
है-
1) मानखमेर
इस उपशाखा चा
वर्ग
है, मानखमेर, पालोगवा, खासी और
निकोबारी।
जैसा की नाम
से स्पष्ट है
कि 'निकोबारी'
निकोबार
द्वको के खासी
मेघालय के
खासी लोगों को
भाषा है। भारत
की दृष्टि से
आग्नेय
परिवार को
सबसे प्रधान
भाषा 'मुण्डारी'
है। मुद्र
हो, संगाल,
भील आदि
केन्द्रिय
वर्ग की
जनजातियाँ
इसी परिवार की
भाषा, जिसे
"मुंडारी" भी
कहते है, व्यवहार
में स है।
भारत में 'मुंडारी
भाषा का
प्रसार बहुत
ज्यादा था। यह
प्रत्यय-प्रधान
भाषा है।
इसमें
स्त्रीलिंग और
पुलिंग
प्याका में
आधार पर नहीं,
सजीव और
निर्जीव के
भेद के अनुसार
होता है। इस
भाषा की सबसे
बड़ी विशेषता
उसकी
वाक्य-रक् है।
यह भाषा
झारखंड, म०प्र०,
उडीसा और
तमिलनाडु के
कुछ भागों में
बोली जाती है।
2) धाविड-प्राविड
परिवार की
मध्यवर्ती
बोली में गोडी
सर्वप्रमुख
है। द्राविड
परिवार की अन्य
बोलियों
कुरूरव माल्ट, कोला
तथा कुई विशेष
रूप से
उल्लेखनीय
है। कांगुरव
छोटानागपुर
(क्षारखण्ड), म०प्र० और
उडीसा के कुछ
जिलों में
बोले जाती है।
इसका तमिल तथा
कन्नड़ से
निकट का साम्य
है। केंद्रख
की एक शाखा
माल्तो है. जो
राजमहल पहरों
में रहने वाले
मौरिया या
मालेर लोगों
की भाषा है।
कई उडीसा की
भाषा है, इसका
तेलगु से अधिक
साम्प है।
3) विम्बती-वर्मी
उत्तर-पूर्वी
क्षेत्र या
हिमायल
क्षेत्र में
रहने वाली
आदिवासी
जनजातियों की
भाषा के
स्वरुप के
आधार प
तिम्बती-बर्मी
भाषा है, और कही
न कहीं इस पर 'आस्ट्रिक
भाषा का
प्रभाव भी है।
आधुनिक
समय में
जनजातियों, गैर
जनजातियों के
प्रभाव में
आकार उनकी
बोली भी जान
गई है। जैसे
छोटासपुर को
जनजातियाँ अपनी
भाषा के अलावा
अन्य को भाषा
समझना बोलना
सीख गई है. पथा
हिन्दी। उसी
तरह, उड़ीसा
भाषा का कि थे
तिमियों पर
प्रभाव दिखाई
देता है। यही
स्थिति
दक्षिणी और
पश्चिमी प्रदेशों
के साथ भी है।
4) आर्थिक
विकास के आधार
पर जनजातियों
का वर्गीकरण
हमारे
रंग की
जनजातीय
आबादी का बहुत
बड़ा भाग जंगलियों
की तरह जीवन
यापन करता था।
में लोग शिकार
पकडने या
पशुपतन या एक
प्रकार की
खेती के
द्वारा भोजन
आदि प्राप्त
करने का
प्रयाल करते
थे। देश की
प्रामीण जनता
के प में आकर
इनमें से
अधिकात ने
अपनी जंगली
रीति-रिवाजो
को त्यागकर
सभ्यता के पथ
पर आगे बढ़ते
चले जा रहे
हैं।
2. दृष्टिकोण
जस्वातिय
अर्थव्यवस्था
अपने आप में
एक विशिष्टता
को लिए हुए
है। ये
अर्थव्यवस्था
के विभिन्न
अवस्थाओं
जैसे
भोजन-संग्रह
काले को अवस्था
से लेकर
स्थानान्तरण
कृषि,
स्थायी
कृषि अवस्था
तथा वर्तमान
समय में स्थित
औद्योगिका
देता है।
मजूमदार
तथा मदन ने
आर्थिक
दृष्टि से
भारतीय जनजातियों
को निम्न
प्रकार से
विभाजित किया है।।
1) जो
जातियाँ
जंगलों और
पहाड़ों में
रहकर अपनी आदिम
अर्थव्यवस्था
को निभाये हुए
है। मभोजन संग्रह
करना ही इनकी (
अर्थव्यवस्था
की प्रमुख
विशेषता है।
उनमें से
उत्तर प्रदेश
के राजी, प०
बिहार के
खडिया, बिरहोर,
और
पहाडिया, असम
की कुकी, मध्यप्रदेश
की पहाडी व
मडिया, उडीसा
का जुआंग आदि
उल्लेखनीय
है। ये जातियाँ
ग्रामीण लोग
से संपर्क में
आने के पूर्व
जंगलों और
पहाड़ों में
रहती थी और
शिकार तथा
जंगलों में
अपनी काम
चलाते थे।
2) दुसरी
श्रेणी के
अन्तर्गत वे
जनजातियाँ
आती है जिनकी
अर्थव्यवस्था
भोजन
संग्रहीता
तथा आदिम कृषि
व्यवस्था के
प्रकारो के
बीच की है। कमार, बैगा,
रेड्डो
जनजाति के लोग
इस व्यवस्था
के अंतर्गत
आते है।
3) तीसरी
श्रेणी में
जनसंख्या का
वह बहुत बडा
भाग आता है।
जो कि किसी न
किसी प्रकार
की कृषि पर आश्रित
होने के साथ
निकट के
जंगलों में
वन्य उत्पादकों
वस्तुओं का
संचय भी करता
है। उत्तर-पूर्व
भारत की
जनजातियाँ
अधिकांशतः इस
श्रेणी में
आती है। इस
श्रेणी को दो
उप-श्रेणियों में
विभाजित किया
जा सकता है-
स्थानान्तरण
कृषि- मुठिया, माडिया,
कोरवा, साबडा,
गोरो आदि
-
स्थायी कृषि
गोंड,
उराँव, थारु,
मुण्डा, भील, कोटा,
परजा, इत्यादि
4) चुतर्थ
श्रेणी में उन
जनजातियों को
रखा गया जो
उद्योगोंकी
ओर आकर्षित
हुए। बिहार, बंगाल
तथा असम की
जनजातियों
अपने
परम्परागत व्यवसायों
को छोडकर
औद्योगिक
प्रतिष्ठानों
में कार्य की
तलाशा में आने
लगी है।
सन्याल, हो,
मुण्डा, असुर, भुईया
आदि
जनजातियों के
लोग श्रमिक के
रूप में शहरी
क्षेत्रों की
ओर जाते है।
वर्तमान
युग में संचार
और आवागमन के
साधनों के
विकास होने के
साथ-साथ
जनजातियों का
अन्य लोगों के
साथ सम्पर्वड
स्थापित हो
गया है,
और वे अपने
परम्परागत
व्यवस्था पर
आश्रित न होकर
अन्य नये
व्यवस्था
अपनाने लगे
है। इस प्रकार
व्यवसायिक
वर्गीकरण अब
कठोर रूप में
नहीं रह गया
है। वस्तु
विनमंच की
व्यवस्था का
अब धीरे-धीरे
खास होता जा
रहा है. फिर भी,
उपरोक्त
वर्गीकरण को
मोटे तौर पर
स्वीकार किया
जा सकता है।
3. निष्कर्ष
इस
प्रकार,
जनजाति, भारत के
विभिन्न
क्षेत्रों
में विविध
आधार को समेटे
हुए अपनी एक
अलग
विशिष्टता को
संजोये हुए
है। आज भारतीय
जनजातीय समाज
के अध्ययनकर्ता
वर्तमान समय
में
जनजातियों के
बदलते परिवेश
जैसे जनजातीय
संस्कृति, राजनीतिक
स्थिति, भाषा,
व्यवसाय, सामाजिक
स्थिति का
अध्ययन तथा
मूल्यांकन अपने-अपने
ढंग से करने
में लगे हुए
है। इस अध्ययन
का बाधार
भौगोलिक
प्रजातीय, भाषा, व्यवस्थाय
आदि पर निर्भर
करता है, जिसे
इस शोध-लेख
में स्पष्ट
ढंग से वर्णित
करने का
प्रयास किया
गया है।
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